पवित्र सावन मास के दौरान जहां देश भर में भगवान शिव के भक्त गंगाजल लेकर पैदल शिवधामों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं दो साधुओं की एक अत्यंत कठिन और अनुशासित धार्मिक यात्रा चर्चा में आ गई है। गोमुख से पवित्र गंगाजल लेकर तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम धाम के लिए निकले ये दोनों साधु हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर रहे हैं। हिमालय की ऊंचाइयों से दक्षिण भारत के तट तक फैली यह यात्रा सिर्फ लंबी दूरी के कारण ही अनोखी नहीं है, बल्कि साधुओं द्वारा अपनाए गए कठोर नियमों और दैनिक तपस्या की वजह से भी श्रद्धालुओं के बीच गहरे सम्मान का विषय बनी हुई है।
गोमुख से रामेश्वरम तक की विशाल पदयात्रा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दोनों कांवड़ियों ने अपनी इस लंबी धार्मिक यात्रा की शुरुआत इसी साल 25 मई को उत्तराखंड के गोमुख से की थी। उनका उद्देश्य गोमुख से भरा गया पवित्र गंगाजल पैदल ले जाकर रामेश्वरम मंदिर में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करना है। अपनी इस कठिन राह में ये साधु झारखंड स्थित प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ धाम से गुजरते हुए और पश्चिम बंगाल के रास्तों से होते हुए सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम तक पहुंचेंगे। पूरी यात्रा बिना किसी वाहन की सहायता के केवल पैदल ही संपन्न की जा रही है।
पैदल यात्रा के दौरान दोनों साधुओं की गति और नियम अद्भुत हैं। वे हर दिन औसतन 30 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। चाहे मौसम की स्थिति कैसी भी हो या रास्ते की चुनौतियां कितनी भी कठिन हों, उनकी दैनिक चाल और साधना के समय में कोई बदलाव नहीं आता। वे लगातार अपने गंतव्य की ओर बढ़ते रहते हैं, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता और मानसिक संकल्प दोनों का परिचय मिलता है।
वर्षों का अटूट संकल्प और अनुशासित दिनचर्या
इन दोनों यात्रियों की भक्ति की एक बड़ी विशेषता उनका कई सालों का अनुभव और संकल्प है। दोनों साधुओं में से एक पिछले 8 वर्षों से लगातार इस प्रकार की कठिन कांवड़ यात्राएं करते आ रहे हैं। वहीं दूसरे साधु के लिए इस स्तर की पदयात्रा का यह लगातार दूसरा साल है। कई वर्षों तक बिना किसी रुकावट के इतनी लंबी और कष्टदायी यात्राएं पूरा करना उनकी भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और अडिग इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
कांवड़ यात्रा की परंपरा में श्रद्धालु गंगाजल भरकर विभिन्न शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं, लेकिन गोमुख से रामेश्वरम जैसी दूरी तय करना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक का यह मार्ग विभिन्न जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और कठिन रास्तों से भरा हुआ है, फिर भी दोनों साधु बिना किसी हिचकिचाहट के अपने व्रत पर कायम हैं।
आत्मनिर्भर जीवन: खुद खाना पकाना और सड़क किनारे विश्राम
दोनों बाबाओं का दैनिक जीवन और उनकी यात्रा की व्यवस्था भी लोगों को आश्चर्यचकित कर रही है। दिनभर 30 किलोमीटर पैदल चलने के बावजूद वे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए किसी अन्य व्यक्ति या संस्था पर निर्भर नहीं रहते। वे भोजन के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। पूरा दिन सफर करने के बाद वे केवल शाम के समय एक बार ही भोजन ग्रहण करते हैं।
खास बात यह है कि भोजन तैयार करने के लिए वे किसी आश्रम या ढाबे का सहारा लेने के बजाय अपने साथ एक छोटा गैस सिलेंडर और आवश्यक बर्तन लेकर चलते हैं। शाम को यात्रा विराम के समय वे स्वयं ही सात्विक भोजन बनाते हैं और उसे ग्रहण करते हैं। इसके अलावा उनके ठहरने का भी कोई पक्का ठिकाना नहीं होता। यदि रास्ते में कोई मंदिर या धर्मशाला मिल गई तो वहां रात बिता लेते हैं, अन्यथा खुले आसमान के नीचे सड़क किनारे ही विश्राम करके अपनी रात काट लेते हैं।
शिव भक्ति और सोशल मीडिया पर सराहना
भारतीय धार्मिक मान्यताओं में गोमुख से लाए गए गंगाजल का विशेष महत्व है, और सावन के महीने में जलाभिषेक की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर इन दोनों साधुओं का एक वीडियो सामने आने के बाद लोग उनकी तपस्या और दृढ़ निश्चय की जमकर तारीफ कर रहे हैं। सोशल मीडिया यूजर उनके इस कठिन संकल्प को देखकर प्रभावित हो रहे हैं और उनकी यात्रा के सकुशल संपन्न होने की कामना कर रहे हैं। हालांकि वीडियो से जुड़ी विस्तृत जानकारियों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है, फिर भी इन साधुओं की निस्वार्थ भक्ति ने लाखों लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।


















