देवभूमि उत्तराखंड में भगवान शिव के अनेक पौराणिक और पवित्र धाम मौजूद हैं, जहां भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सुंदरता का समागम देखने को मिलता है। ऐसा ही एक पावन स्थल हरिद्वार जिले के नजीबाबाद रोड पर स्थित है। राजाजी टाइगर रिजर्व के घने जंगलों, श्यामपुर क्षेत्र और सज्जनपुर पीली के पास बसा श्री कुंडी सोटेश्वर महादेव मंदिर न केवल अपनी प्राकृतिक आभा के लिए जाना जाता है, बल्कि इसका सीधा संबंध देवों के देव महादेव के जीवन के एक बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग से जुड़ा हुआ है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, जब भगवान शिव माता पार्वती से विवाह रचाने के लिए अपनी बारात लेकर निकले थे, तब उनका पड़ाव इसी स्थान पर हुआ था।
कैलाश से उतरी बारात का विश्राम स्थल और स्वयंभू शिवलिंग
उत्तराखंड की पावन भूमि पर स्थित दक्ष नगरी कनखल को भगवान शिव की ससुराल माना जाता है। इसी कारण संपूर्ण हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में भोलेनाथ से जुड़े कई ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल स्थित हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी बारात के साथ कैलाश पर्वत से नीचे उतरे, तो उन्होंने माता पार्वती के धाम पहुंचने से पूर्व इस शांत वन क्षेत्र में विश्राम किया था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है, जिसे जमीन की खुदाई के दौरान प्राप्त किया गया था। माना जाता है कि सच्चे मन से यहां की जाने वाली हर प्रार्थना को भगवान शिव अवश्य स्वीकार करते हैं।
कुंडी-सोटा से जुड़ा इतिहास और भक्तों की अटूट आस्था
श्री कुंडी सोटेश्वर महादेव मंदिर का नाम भी इस स्थान पर घटी पौराणिक घटनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। भगवान शिव की बारात कोई साधारण बारात नहीं थी, उसमें देवताओं के साथ-साथ उनके प्रिय गण, भूत-प्रेत और विभिन्न दिव्य शक्तियां भी शामिल थीं। यही कारण है कि शिवजी को 'भूतनाथ' भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, विश्राम के दौरान भगवान शिव के गणों ने इसी स्थान पर कुंडी और सोटा का उपयोग करके भांग घोटने का कार्य किया था। इस घटना के ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य आज भी समय-समय पर इस स्थान पर होने वाली खुदाई के दौरान प्राप्त होते रहते हैं। मंदिर का शांत वातावरण और वहां मौजूद आध्यात्मिक ऊर्जा दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देती है।
रहस्यमयी पेड़ और बारात से बिछड़े गणों का वास
इस पवित्र मंदिर क्षेत्र में एक अत्यंत रहस्यमयी पेड़ भी मौजूद है, जिससे जुड़ी परंपराएं आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती हैं। कहा जाता है कि बारात के दौरान भांग के अत्यधिक सेवन के कारण भगवान शिव के कुछ गण नशे में मस्त हो गए थे और मुख्य बारात से बिछड़ गए। इसके बाद वे इसी विशाल पेड़ पर रुक गए और वहीं निवास करने लगे। आज भी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पेड़ के आसपास आम लोगों के जाने पर सख्त पाबंदी रहती है। परंपरा के तहत रोजाना इस पेड़ पर रहने वाले भूतों और गणों के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। स्थानीय निवासियों का दृढ़ विश्वास है कि वे दिव्य आत्माएं आज भी उस भोजन को नियमित रूप से ग्रहण करती हैं।



















