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निःसंतान राजा महीजित की व्रत कथा: गणेश चतुर्थी से मिला वंश का वरदानधर्म
3 जुल॰ 2026, 9:01 am (45 दिन पहले)· 1

निःसंतान राजा महीजित की व्रत कथा: गणेश चतुर्थी से मिला वंश का वरदान

द्वापर युग के राजा महीजित की पौराणिक कथा बताती है कि कैसे मुनि लोमेश के बताए आषाढ़ संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत ने उन्हें संतान सुख दिलाया।

आषाढ़ माह की संकष्टी गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश के कृष्णपिंगल स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है, और इस दिन से जुड़ी एक पौराणिक व्रत कथा बताती है कि किस तरह श्रद्धा और सही उपाय से बड़ी से बड़ी पीड़ा भी दूर हो सकती है। यह कथा द्वापर युग के एक ऐसे राजा की है जिसके पास धन-वैभव तो भरपूर था, लेकिन संतान सुख नहीं था।

निःसंतान राजा की पीड़ा

पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में महिष्मति नगरी पर राजा महीजित राज करते थे। वे अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह मानते और उसका पालन-पोषण करते थे, लेकिन खुद उनके कोई संतान नहीं थी। इसी वजह से उन्हें अपना धन-दौलत और ऐश्वर्य भी अच्छा नहीं लगता था। शास्त्रों में निःसंतान व्यक्ति का जीवन अधूरा माना गया है, और मान्यता है कि यदि संतानहीन व्यक्ति अपने पितरों को जल अर्पित करे तो पितर उसे गरम जल के रूप में ही ग्रहण करते हैं। यही सोच राजा महीजित को हमेशा बेचैन रखती थी।

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पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने कई उपाय आजमाए, लेकिन सफलता नहीं मिली। यही सब सोचते-सोचते उनकी जवानी बीत गई और वे बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए। आखिरकार उन्होंने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा ने कहा कि उन्होंने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, फिर भी उन्हें संतान सुख नसीब नहीं हुआ, और अब उनकी आगे क्या गति होगी। यह सुनकर ब्राह्मणों ने राजा को धैर्य बंधाया और भरोसा दिलाया कि वे मिलकर इसका कोई हल जरूर निकालेंगे।

मुनि लोमेश ने बताया समाधान

राजा की पीड़ा दूर करने के लिए पूरी प्रजा ब्राह्मणों के साथ जंगल की ओर निकल पड़ी। वहां उनकी भेंट एक तेजस्वी मुनि से हुई, जो निराहार रहकर कठोर तपस्या में लीन थे। उन मुनि का नाम लोमेश था। प्रजाजनों ने उनके सामने हाथ जोड़कर अपना दुख बयां किया और कोई उपाय बताने की गुहार लगाई। मुनि लोमेश ने पूछा कि वे लोग किस उद्देश्य से यहां आए हैं। इस पर प्रजाजनों ने बताया कि उनके राजा महीजित बहुत ही उदार और नेक हैं, उन्होंने हमेशा प्रजा को अपनी संतान समझा, लेकिन इतने अच्छे राजा को आज तक अपनी कोई संतान नहीं मिली।

प्रजाजनों ने मुनि से विनती की कि वे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे राजा को पुत्र सुख मिल सके और उनका जीवन खुशियों से भर जाए। यह सुनकर मुनि लोमेश ने कहा कि वे एक ऐसे व्रत के बारे में बताने जा रहे हैं जो हर तरह के संकट का नाश कर सकता है। उन्होंने समझाया कि यह व्रत निःसंतान को संतान और निर्धन को धन देने वाला माना जाता है। मुनि लोमेश ने सुझाव दिया कि अगर राजा आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी का व्रत रखकर विधिपूर्वक भगवान गणेश की पूजा करें, ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें वस्त्र दान करें, तो गणेश जी की कृपा से उन्हें अवश्य ही पुत्र की प्राप्ति होगी। यह सुनकर सभी प्रजाजन प्रसन्न मन से वापस नगर लौट आए।

व्रत के बाद मिला पुत्र रत्न

नगर पहुंचकर प्रजाजनों ने राजा महीजित को मुनि लोमेश की पूरी बात बताई। राजा ने बिना देर किए पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत रखा। कुछ ही समय बाद रानी सुदक्षिणा गर्भवती हुईं, और भगवान गणेश की कृपा से उन्होंने एक सुंदर और संस्कारी पुत्र को जन्म दिया। इस तरह वर्षों की तपस्या और प्रतीक्षा के बाद राजा महीजित का घर संतान सुख से भर गया।

इस कथा के आधार पर मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा के साथ आषाढ़ संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत करता है, उसे जीवन में सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि इस दिन भगवान गणेश के कृष्णपिंगल स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है, और यह व्रत कथा हर साल श्रद्धालुओं के बीच पढ़ी और सुनी जाती है।

सवाल-जवाब

आषाढ़ संकष्टी गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश के किस स्वरूप की पूजा की जाती है?
इस दिन भगवान गणेश के कृष्णपिंगल स्वरूप की पूजा की जाती है।
यह व्रत कथा किस युग की बताई गई है?
यह कथा द्वापर युग की है, जब महिष्मति नगरी में राजा महीजित राज करते थे।
राजा महीजित को किस बात का दुख था?
वे निःसंतान थे, हालांकि वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण पुत्र की तरह करते थे।
राजा को व्रत का उपाय किसने बताया?
जंगल में तपस्या कर रहे मुनि लोमेश ने प्रजाजनों को यह उपाय बताया।
मुनि लोमेश ने कौन सा व्रत करने की सलाह दी?
उन्होंने आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी का व्रत रखकर विधिवत गणेश पूजा, ब्राह्मण भोजन और वस्त्र दान करने की सलाह दी।
व्रत करने के बाद राजा महीजित को क्या फल मिला?
व्रत के बाद रानी सुदक्षिणा गर्भवती हुईं और उन्हें एक सुंदर व संस्कारी पुत्र प्राप्त हुआ।
इस व्रत को करने से क्या लाभ माना जाता है?
मान्यता है कि यह व्रत निःसंतान को संतान और निर्धन को धन प्रदान करता है।
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