भारत की सामरिक सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देश के रक्षा तंत्र को मजबूत रखना सबसे अहम प्राथमिकता माना जाता है। भौगोलिक स्थिति के लिहाज से देश की सीमाएं एक तरफ चीन और दूसरी तरफ पाकिस्तान से मिलती हैं, जिसके कारण हमेशा दो मोर्चों पर युद्ध की स्थिति से निपटने की तैयारी रखनी पड़ती है। इस रणनीतिक समीकरण में एक बड़ा बदलाव यह है कि चीन ने पहले ही पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित कर लिया है। ऐसी भी चर्चाएं सामने आ रही हैं कि बीजिंग इस आधुनिक तकनीक को अपने पड़ोसी और मित्र देश पाकिस्तान को भी सौंप सकता है। यदि ऐसा होता है, तो भारत के दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देश पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक विमानों से लैस हो जाएंगे। इस संभावित खतरे का मुकाबला करने के लिए भारतीय वायुसेना को भी अत्याधुनिक एयरोस्पेस तकनीक की सख्त जरूरत महसूस हो रही है। हालांकि हाल ही में फ्रांस से राफेल विमानों की खरीद को मंजूरी मिली है, लेकिन वे विमान चौथी या साढ़े चौथी पीढ़ी की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में रूस ने भारत को सीधे पांचवीं पीढ़ी का Su-57 फाइटर जेट और R-77M मिसाइल हासिल करने का बड़ा विकल्प पेश किया है।
तुरंत डिलीवरी और अंतरिम बढ़त का प्रस्ताव
मास्कॉ की तरफ से नई दिल्ली को अपने सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी के Su-57E लड़ाकू विमानों की एक सीमित खेप जल्द से जल्द उपलब्ध कराने की पेशकश की गई है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, इस नए रक्षा प्रस्ताव के तहत करीब 8 से 10 Su-57E विमानों के साथ-साथ लंबी दूरी तक मार करने वाली R-77M बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी BVR मिसाइलें भी मुहैया कराने का विकल्प रखा गया है। यदि भारतीय पक्ष इस डील पर अपनी मुहर लगाता है, तो इससे वायुसेना को अपने महत्वाकांक्षी स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट के पूरी तरह चालू होने से पहले ही पांचवीं पीढ़ी की मारक क्षमता का प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। रक्षा सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, यह 8 से 10 विमानों की शुरुआती संख्या वायुसेना की लगभग आधी स्क्वाड्रन के बराबर बैठती है। इस सीमित संख्या के जरिए देश के पायलट और तकनीकी अमला इस विमान के शुरुआती संचालन का अनुभव ले सकेंगे और इसकी वास्तविक क्षमताओं का बारीकी से आकलन भी कर पाएंगे। हालांकि, इस रक्षा सौदे पर अभी तक भारत सरकार या रक्षा मंत्रालय की तरफ से कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
रूस के आधुनिक फाइटर जेट की तकनीकी खूबियां
रूस के बेड़े में Su-57 को उसका सबसे उन्नत और ऑपरेशनल फाइटर जेट माना जाता है, जिसे पांचवीं पीढ़ी के विमानों की तमाम खासियतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इन खूबियों में कम रडार विजिबिलिटी यानी स्टील्थ क्षमता, विमान के भीतर हथियार छिपाकर ले जाने की आंतरिक व्यवस्था, अत्याधुनिक सेंसर और नेटवर्क सेंट्रिक कॉम्बैट कैपेबिलिटी जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं। यदि भारत सीमित संख्या में ही सही, लेकिन इन विमानों को अपने बेड़े में शामिल करता है, तो इससे रक्षा कर्मियों को इस अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म को उड़ाने, उसके रख-रखाव और तकनीक को समझने का अमूल्य अनुभव प्राप्त होगा। इस पूरे प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके साथ मिलने वाली R-77M मिसाइल को माना जा रहा है। इस मिसाइल को तकनीकी रूप से Izdeliye 180 के नाम से भी जाना जाता है, जो एक सक्रिय रडार गाइडेड लंबी दूरी की BVR मिसाइल है। सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस हथियार की मारक क्षमता लगभग 200 किलोमीटर तक आंकी गई है। इस मिसाइल में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी AESA सीकर के साथ-साथ डुअल-पल्स रॉकेट मोटर जैसी एडवांस्ड तकनीकें भी जोड़ी गई हैं। डुअल-पल्स मोटर की खासियत यह है कि यह उड़ान के आखिरी चरण में मिसाइल को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे लंबी दूरी पर मौजूद लक्ष्य के खिलाफ भी इसकी गति और मारक क्षमता पूरी तरह बरकरार रहती है। रूस के Su-57 विमान के उन्नत सेंसर और कम रडार विजिबिलिटी के साथ इस शक्तिशाली R-77M मिसाइल का मेल हवाई युद्ध में भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।
चुनौतियां और स्वदेशी कार्यक्रमों पर असर
दूसरी तरफ, इतनी कम संख्या में रूसी Su-57E विमानों को अपने मौजूदा बेड़े में शामिल करने के साथ कई तरह की व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। एक बिल्कुल अलग और नए लड़ाकू बेड़े के लिए अलग से पायलटों को प्रशिक्षण देना होगा, रख-रखाव की नई व्यवस्था बनानी होगी, भारी मात्रा में अलग स्पेयर पार्ट्स मंगवाने होंगे, हथियारों का अलग भंडार तैयार करना होगा और एक अलग साजो-सामान का ढांचा खड़ा करना पड़ेगा। इसके अलावा विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस रूसी खरीद का असर भारत के अपने स्वदेशी AMCA कार्यक्रम पर भी पड़ सकता है। शुरुआत में Su-57 को देश में बनने वाले AMCA के आने तक के एक अस्थायी या अंतरिम समाधान के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यदि घरेलू स्तर पर चल रहे AMCA प्रोजेक्ट में किसी प्रकार की देरी होती है, तो इन विमानों की शुरुआती सीमित खरीद को आगे चलकर बढ़ाने का दबाव भी बढ़ सकता है, जिसका असर देश की दीर्घकालिक पांचवीं पीढ़ी के युद्धक विमानों की रणनीति पर पड़ सकता है। इसके साथ ही, भारत पहले से ही अपने घरेलू स्तर पर लंबी दूरी की स्वदेशी BVR मिसाइल क्षमताओं को मजबूत कर रहा है और अस्त्र परिवार के विभिन्न संस्करणों पर काम लगातार जारी है। ऐसी स्थिति में रूस से R-77M जैसी तैयार मिसाइलें तुरंत हासिल करने से वायुसेना को फौरी तौर पर एक मजबूत बढ़त जरूर मिल सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक रणनीतिक नफा-नुकसान का आंकलन करना भी बेहद जरूरी है।


















