बिहार की माटी में कई ऐसे संत और महात्मा हुए हैं जिन्होंने अपनी तपस्या और समाज सेवा के जरिए एक अलग मुकाम हासिल किया है। इसी परंपरा में पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल में स्थित सुप्रसिद्ध दसमुखी काली न्यास मंदिर के पीठाधीश्वर सेवक संजय नाथ जी महाराज का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। वे लंबे समय से मां काली की पूजा-अर्चना के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा, आवास और भोजन जैसे जरूरी क्षेत्रों में जनसेवा के कार्यों में जुटे हुए हैं। महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले इस संत की संन्यास की राह बहुत ही दिलचस्प और अनोखी रही है।
एक साधारण परिवार से संन्यास तक का सफर
सेवक संजय नाथ जी महाराज का जन्म एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता पेशे से एक होम्योपैथिक चिकित्सक थे। अन्य सामान्य युवाओं की तरह वे भी अपनी पढ़ाई-लिखाई और भविष्य की तैयारियों में व्यस्त रहते थे। हालांकि स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और उनके विचारों का उनके मन-मस्तिष्क पर बहुत गहरा असर पड़ा था। वे भी उन्हीं के बताए हुए मार्ग पर चलना चाहते थे और समाज के कल्याण के लिए कुछ करना चाहते थे। इसी आंतरिक प्रेरणा के चलते उन्होंने बहुत कम उम्र में यानी महज 17 साल की अवस्था में ही संन्यास ग्रहण करने का बड़ा फैसला कर लिया था।
ट्रेन यात्रा के दौरान आया भगवान शिव का स्वप्न
अपनी जीवन यात्रा के एक अहम मोड़ को याद करते हुए महाराज बताते हैं कि एक बार वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई में एडमिशन लेने के लिए पटना से मद्रास की यात्रा कर रहे थे। उसी सफर के दौरान उन्हें नींद में भगवान शिव के दर्शन हुए। उनका कहना है कि देवों के देव महादेव ने उन्हें संन्यास के मार्ग पर चलने और मंदिर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का स्पष्ट संकेत दिया था। उन्होंने इस तरह का स्वप्न एक बार फिर से देखा और उनका यह भी दावा है कि उन्हें उसी स्वप्न के माध्यम से भगवान शिव से एक विशेष मंत्र भी प्राप्त हुआ था। इन अलौकिक अनुभवों के बाद उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने का निश्चय किया और पूरी तरह से संन्यास का कठिन मार्ग अपना लिया।
परिवार का विरोध और कठिन शुरुआती दिन
उनके इस अचानक और बड़े फैसले का उनके परिवार के भीतर काफी विरोध भी हुआ था। महाराज बताते हैं कि उनकी माताजी को इस बात की गहरी चिंता सता रही थी कि संन्यास अपनाने के बाद उनका बेटा अपना पेट भरने के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांगेगा। हालांकि उनके अनुसार उन्होंने कभी भी किसी के सामने हाथ फैलाकर भिक्षा नहीं मांगी। वे पूरी तरह से मां देवी काली की भक्ति में लीन रहे और जो भी भोजन उन्हें सहज रूप से मिल जाता था, उसी से अपना गुजारा करते रहे। उनके जीवन का यह दौर काफी संघर्षपूर्ण रहा लेकिन उनकी निष्ठा में कोई कमी नहीं आई।
सात बीघा जमीन पर भव्य दसमुखी काली मंदिर का निर्माण
संजय नाथ जी महाराज के मुताबिक रामकिशुन राम नाम के एक बड़े और प्रतिष्ठित जमींदार ने उन्हें मंदिर निर्माण के लिए सात बीघा जमीन दान के रूप में दी थी। इसी दान में मिली भूमि पर साल 1990 में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया गया था। आगे चलकर साल 1993 में यह भव्य मंदिर बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया। आज के समय में यह दसमुखी काली मंदिर रक्सौल क्षेत्र के तमाम श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
धार्मिक साधना के साथ जरूरतमंदों की सेवा
महाराज के अनुसार इस मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा जो भी दान या चढ़ावा प्राप्त होता है, उसका उपयोग पूरी तरह से समाज कल्याण के कार्यों में किया जाता है। इस धन का उपयोग शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं, गरीबों के लिए आवास और भोजन की व्यवस्था जैसे सामाजिक कार्यों में होता है। धार्मिक साधना और पूजा-पाठ के साथ-साथ दीन-दुखियों और जरूरतमंदों की सहायता करना उनके दैनिक सेवा कार्यों का एक बेहद अहम हिस्सा बन चुका है। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले संजय नाथ जी महाराज का यह संन्यासी सफर आज भी समाज में कौतुक और चर्चा का विषय बना हुआ है।



















