घर हो या मंदिर, पूजा करते वक्त अक्सर यह सवाल उठता है कि भगवान की आराधना बैठकर करनी चाहिए या खड़े होकर। दरअसल पूजा-पाठ की पूरी प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती, इसके अलग-अलग चरणों के लिए शास्त्रों में अलग-अलग मुद्रा बताई गई है। मंत्र जाप और ध्यान के दौरान आसन पर बैठना उचित माना जाता है, जबकि आरती और परिक्रमा खड़े होकर करने की परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा दिशा, आसन और पूजा में इस्तेमाल होने वाली पवित्र वस्तुओं से जुड़े भी कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका ध्यान रखने की सलाह दी जाती है ताकि पूजा विधि-विधान से पूरी हो सके।
बैठकर पूजा करने की परंपरा क्यों है
रोजाना की पूजा में मंत्र जाप, ध्यान और साधना जैसे कर्म आसन पर बैठकर करने की सलाह दी जाती है। इसके पीछे तर्क यह है कि बैठी हुई अवस्था में शरीर स्थिर रहता है और सांसों पर नियंत्रण बना रहता है, जिससे मन आसानी से एकाग्र हो पाता है। लंबे समय तक खड़े रहकर पूजा करने पर शरीर में हलचल और थकान बनी रहती है, जिससे ध्यान भटकने की आशंका रहती है। यही वजह है कि नियमित पूजा-अर्चना, मंत्र जाप और ध्यान जैसे कर्मों में आसन पर बैठने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसे विधिपूर्वक पूजा का हिस्सा माना जाता है।
आरती के वक्त खड़े होना क्यों जरूरी
पूजा और आरती को एक जैसा नहीं समझना चाहिए, दोनों की विधि और नियम अलग हैं। जब भगवान की आरती उतारी जाती है, तब भक्त अपनी जगह खड़े होकर पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव से आराधना करते हैं। खड़े होकर आरती करना सतर्कता और सम्मान जताने का तरीका माना जाता है। इसके उलट पूजा के दौरान मंत्र जाप, ध्यान और साधना से जुड़े काम आसन पर बैठकर ही किए जाते हैं। इस तरह एक ही पूजा प्रक्रिया में बैठने और खड़े होने, दोनों मुद्राओं का इस्तेमाल होता है, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि पूजा का कौन सा चरण चल रहा है।
परिक्रमा में भी खड़े रहने की मान्यता
पूजा पूरी होने के बाद देवी-देवता या स्थापित मूर्ति की परिक्रमा करने की भी परंपरा है, और यह भी खड़े होकर ही पूरी की जाती है। परिक्रमा करते समय मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव बनाए रखना जरूरी माना गया है, ताकि यह क्रिया केवल औपचारिकता न रहकर आराधना का हिस्सा बने। धार्मिक मान्यताओं में परिक्रमा को पूजा का उतना ही अहम हिस्सा माना जाता है जितना मंत्र जाप या आरती को, इसलिए इसे जल्दबाजी में नहीं बल्कि ठहरकर पूरा करना चाहिए।
पूजा में दिशा का रखें खास ख्याल
पूजा करते समय व्यक्ति का चेहरा किस दिशा में हो, इसका भी खास महत्व बताया गया है। मान्यता है कि पूजा के दौरान मुख पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ रखना शुभ होता है। हालांकि हर घर की बनावट और पूजा स्थल की जगह एक जैसी नहीं होती, इसलिए व्यावहारिक तौर पर इसमें कुछ फेरबदल भी देखने को मिल सकता है। ऐसी स्थिति में जितना संभव हो, शुभ दिशा के करीब बैठने की कोशिश करनी चाहिए।
बिना आसन जमीन पर बैठकर पूजा करने से बचें
पूजा के लिए हमेशा साफ और तय आसन का इस्तेमाल करना चाहिए। सीधे जमीन पर बैठकर पूजा करने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि इससे पूजा की पवित्रता और शरीर की स्थिरता, दोनों प्रभावित मानी जाती हैं। मान्यता यह भी है कि पूजा खत्म होने के बाद आसन के नीचे मौजूद भूमि को प्रणाम करना चाहिए, इसे धरती के प्रति सम्मान जताने का तरीका माना गया है।
शालिग्राम, शिवलिंग जैसी पवित्र वस्तुओं का सम्मान जरूरी
शालिग्राम, शिवलिंग, शंख, जनेऊ और देवी-देवताओं की मूर्तियों को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। इन्हें साफ कपड़े, आसन या उपयुक्त बर्तन में रखने की सलाह दी जाती है, ताकि इनकी पवित्रता बनी रहे। पूजा और आरती के समय स्वच्छता बनाए रखना और सिर ढककर रखना भी जरूरी बताया गया है, इसे भगवान के प्रति आदर, विनम्रता और समर्पण जताने का प्रतीक माना जाता है।
यहां बताई गई बातें धार्मिक आस्था और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं, इनकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है, इसलिए इन्हें उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।


















