नैनीताल जिले में भवाली-अल्मोड़ा मार्ग पर दो पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा आश्रम पिछले छह दशकों में देश के सबसे ज्यादा घूमे जाने वाले आध्यात्मिक ठिकानों में शुमार हो चुका है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु इस भरोसे के साथ पहुंचते हैं कि यहां से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता.
कैंची यानी घुमावदार मोड़ों वाली घाटी
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस जगह का नाम इसकी बनावट से ही निकला है. आश्रम दो पहाड़ियों के बीच एक ऐसी घाटी में बसा है, जहां रास्ता कैंची के दो पत्तों की तरह मुड़ता और खुलता है. इसी घुमाव की वजह से लोगों ने इसे कैंची धाम कहना शुरू किया, और यह नाम आज तक चला आ रहा है, भले ही आश्रम की पहचान अब आसपास के पहाड़ी गांवों से कहीं आगे तक फैल चुकी है.
घने जंगल से पवित्र आश्रम तक का सफर
तीर्थस्थल बनने से पहले यह पूरा इलाका घने जंगल से ढका था. कहा जाता है कि संत सोमवारी महाराज और प्रेमी बाबा यहां अकेले में, किसी भीड़भाड़ से दूर, अपनी साधना किया करते थे. असली बदलाव तब आया जब संत नीम करोली बाबा, जिन्हें भक्त प्यार से महाराजजी कहते हैं, इस जगह पर पहुंचे. उन्हें यहां एक अलग तरह की आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस हुई, और स्थानीय निवासी पूर्णानंद ने वह जमीन दान में दे दी जिस पर आज आश्रम खड़ा है. आश्रम की नींव 1960 के दशक में, यानी 1964 में रखी गई, और 15 जून 1964 को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच इसका विधिवत उद्घाटन हुआ. बीसवीं सदी के बीचोंबीच पड़ी यह तारीख कुमाऊं की पहाड़ियों के सबसे व्यस्त आस्था केंद्रों में से एक की शुरुआत बनी.
हनुमान मंदिर और जून का मेला
आश्रम का मुख्य मंदिर हनुमान जी को समर्पित है, और साल भर यहां आने वाली भीड़ की आस्था का केंद्र यही मंदिर है. हर साल 15 जून को, यानी आश्रम की स्थापना की सालगिरह पर, यहां एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी श्रद्धालु खासतौर पर इसी दिन पहुंचते हैं. कई परिवारों के लिए यह तारीख मंदिर जितनी ही अहम बन चुकी है, साल का वह एक दिन जब यह शांत घाटी अचानक श्रद्धालुओं, मंत्रोच्चार और चढ़ावे के सैलाब में बदल जाती है.
सादगी और सेवा की विरासत
बाबा नीम करोली सादगी, प्रेम और इंसान की सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे, और यही संदेश वे अपने पास मार्गदर्शन के लिए आने वाले लोगों को बार-बार दोहराते थे. उनसे जुड़े चमत्कारों की कहानियां और उनकी शिक्षाएं आज भी कई भक्तों की जिंदगी बदलने का श्रेय पाती हैं, और यही वजह है कि दशकों बाद भी कैंची धाम लोगों को अपनी ओर खींचता है. रोजमर्रा के शोरगुल से दूर बसा यह धाम आने वालों को एक अलग तरह की शांति और पॉजिटिव एनर्जी का एहसास कराता है, वही खूबियां जो आश्रम बनने से भी पहले साधु-संतों को इन पहाड़ों की ओर खींच लाई थीं. जो कोई भी नैनीताल की तरफ इसी सुकून की तलाश में निकलता है, भवाली-अल्मोड़ा मार्ग पर बसी यह कैंची के आकार वाली घाटी हर बार उसकी मंजिल बन जाती है.



















