सनातन परंपरा में पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए बिहार में स्थित गयाजी को सर्वोच्च तीर्थ स्थल का दर्जा दिया गया है। पितृपक्ष के पावन दिनों में यह प्राचीन धार्मिक नगरी देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बन जाती है। धर्मग्रंथों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि गयाजी की पवित्र भूमि पर नियम और विधि-विधान से किया गया श्राद्ध कर्म सीधे पूर्वजों तक पहुंचता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां श्रद्धापूर्वक तर्पण और पिंडदान करने से सात पीढ़ियों के पितरों का उद्धार होता है और वंशजों को पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है।
अधिकतर लोग गयाजी के महात्म्य को केवल प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर या फल्गु नदी तक ही सीमित मानते हैं, जबकि इस संपूर्ण तीर्थ क्षेत्र में 45 से अधिक ऐसे विशिष्ट और पवित्र स्थान मौजूद हैं जहां सदियों से पिंडदान करने की सुदृढ़ परंपरा चली आ रही है। इनमें से प्रत्येक वेदी और तीर्थ स्थल का अपना एक अलग आध्यात्मिक महत्व है। श्रद्धालु अपने कुल की अलग-अलग समस्याओं, विभिन्न प्रकार के पितृ दोषों और पारिवारिक बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए इन तय स्थानों पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न करते हैं।
विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी तट का आध्यात्मिक महात्म्य
गयाजी में श्राद्ध अनुष्ठान की यात्रा में विष्णुपद मंदिर को सबसे प्रमुख केंद्र माना गया है। इस भव्य और ऐतिहासिक मंदिर परिसर में साक्षात भगवान विष्णु के पदचिह्न विद्यमान हैं। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि इस पावन वेदी पर श्रद्धापूर्वक पिंड अर्पित करने से पितरों को सीधे बैकुंठ धाम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण तीर्थयात्री यहां सबसे पहले माथा टेककर अपने पूर्वजों के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
इसी क्रम में पवित्र फल्गु नदी के किनारे तर्पण और पिंडदान का विधान सदियों पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ के निमित्त इसी नदी के पावन तट पर बालू का पिंड बनाकर तर्पण किया था। इस घटना के बाद से ही फल्गु नदी के किनारे जल और तिल का अर्पण करने से पितरों की आत्मा को परम तृप्ति मिलने का अटूट विश्वास जनमानस में रचा-बसा है।
अक्षयवट, प्रेतशिला और रामशिला का विशेष प्रभाव
तीर्थ क्षेत्र का अक्षयवट एक ऐसा अमर वटवृक्ष माना जाता है, जो कभी नष्ट नहीं होता। इस पौराणिक वृक्ष की छाया में पिंडदान संपन्न करने पर पूर्वजों को अक्षय यानी स्थायी शांति प्राप्त होती है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस स्थान पर पूजा करने से आने वाली पीढ़ियों पर कुल के बुजुर्गों का शुभ आशीर्वाद सदैव बना रहता है, जिसके चलते इसे प्रमुख पिंडदान वेदियों में अत्यंत आदरणीय दर्जा प्राप्त है।
इसके अलावा प्रेतशिला पर्वत उन पूर्वजों की शांति के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है, जिनका देहावसान किसी असामान्य स्थिति या अकाल परिस्थितियों में हुआ हो। दुर्घटना या असमय मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की आत्मा की शांति के लिए यहां श्राद्ध करने का नियम है। माना जाता है कि इस पर्वत पर पिंडदान करने से परिवार पर से प्रेत बाधा, अशांति और गंभीर पितृ दोष पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।
वहीं दूसरी ओर रामशिला पर्वत का सीधा संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के श्राद्ध अनुष्ठान से जुड़ा है। धार्मिक विवरण के अनुसार भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के निमित्त इसी पर्वत पर विधिवत श्राद्ध कर्म किया था। इस पवित्र शिला के पास तर्पण करने से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं, घर में सुख-समृद्धि आती है और पूर्वजों की असीम कृपा बरसती है।
सीता कुंड सहित अन्य प्रमुख वेदियों पर श्राद्ध विधान
गयाजी के प्रमुख आस्था केंद्रों में सीता कुंड का स्थान भी अत्यंत विशेष है। मान्यता है कि माता सीता ने इसी पावन कुंड के समीप पितृ कर्म को पूर्ण किया था। श्रद्धालु इस कुंड के तट पर पहुंचकर भावपूर्ण मन से पिंडदान करते हैं और अपने पूर्वजों के प्रति आदर व श्रद्धा निवेदित करते हैं।
इन मुख्य वेदियों के अलावा गयाजी के धार्मिक भूगोल में ब्रह्मयोनि पर्वत, धर्मारण्य, मंगला गौरी, उत्तरमानस, सूर्यकुंड और वैतरणी जैसे अनेक अत्यंत पवित्र स्थल शामिल हैं। इन सभी स्थलों पर अलग-अलग दोषों के निवारण हेतु श्राद्ध और तर्पण करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माना जाता है कि इन स्थानों पर अनुष्ठान संपन्न करने से ग्रहों से जुड़ी बाधाएं शांत होती हैं, पारिवारिक संकट दूर होते हैं और अटके हुए कार्य सिद्ध होने लगते हैं। पितृपक्ष के पूरे 16 दिनों तक गयाजी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि शास्त्रों का मत है कि यहां किए गए पिंडदान का पुण्य फल कभी क्षीण नहीं होता।



















