पवित्र सावन मास की शुरुआत के साथ ही शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए भक्त विधि-विधान से जलाभिषेक कर रहे हैं, बेलपत्र अर्पित कर रहे हैं और कई लोग पूरे विधि-विधान के साथ सोमवार का व्रत भी रख रहे हैं। धार्मिक दृष्टि से इस पूरे महीने को अत्यधिक फलदायी और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना गया है।
पूजा के दौरान नियमों का महत्व
भोलेनाथ की पूजा में केवल अटूट श्रद्धा ही काफी नहीं होती, बल्कि शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। करौली के जाने-माने कर्मकांड ज्योतिषी एवं भागवताचार्य पंडित मनीष उपाध्याय का कहना है कि सावन के दिनों में की जाने वाली आराधना से विशेष फल की प्राप्ति होती है। हालांकि, यदि पूजन सामग्री या खान-पान में कुछ विशेष सावधानियों को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो पूजा का अपेक्षित पुण्य फल प्राप्त होने में बाधा आ सकती है और कई बार इसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
तुलसी और सिंदूर से जुड़ी वर्जनाएं
पंडित उपाध्याय के अनुसार, भगवान शिव की उपासना में कभी भी तुलसी पत्र का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। कई बार अनजाने में श्रद्धालु बेलपत्र के साथ तुलसी के पत्ते भी शिवलिंग पर चढ़ा देते हैं, जो कि धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध है। शिवजी को केवल बेलपत्र अर्पित करना ही अत्यंत शुभ माना गया है। इसके अलावा, सावन के महीने में महादेव का श्रृंगार करते समय सिंदूर का प्रयोग करने से भी बचना चाहिए।
केतकी के फूल का निषेध
धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर केतकी का फूल चढ़ाना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। पंडित उपाध्याय का स्पष्ट निर्देश है कि न केवल केतकी का फूल, बल्कि केतकी के इत्र या केतकी युक्त जल को भी भगवान शिव को अर्पित करने से पूरी तरह बचना चाहिए। ऐसी चीजों से पूजा की पवित्रता और उसका प्रभाव प्रभावित हो सकता है।
खान-पान और सात्विकता में संयम
केवल पूजा की सामग्री ही नहीं, बल्कि सावन के दौरान शिवभक्तों के खान-पान पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। विशेष तौर पर जो श्रद्धालु व्रत और अनुष्ठान कर रहे हैं, उन्हें अपने आहार में पूरी तरह सात्विकता रखनी चाहिए और लहसुन-प्याज के सेवन से परहेज करना चाहिए। इस पावन मास में भोजन और आचार-विचार में संयम बरतना भी शिव साधना का एक अहम और अनिवार्य हिस्सा माना गया है।



















