उदयपुर शहर में एक ऐसी अनूठी और भावुक अंतिम विदाई देखने को मिली, जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं. आमतौर पर किसी भी इंसान की अंतिम यात्रा में लोग पूरी तरह शांत होकर चलते हैं और भजन या मौन रखते हैं, लेकिन जब यहां एक उस्ताद पहलवान की अंतिम यात्रा निकली तो उनके सभी शागिर्दों ने अर्थी के आगे-आगे पारंपरिक अखाड़े के करतब दिखाए. उन सभी के हाथों में शस्त्र थे, उनके शरीर पर पहलवानों वाला अंदाज साफ झलक रहा था और उनके द्वारा किया जाने वाला हर एक करतब अपने उस्ताद के प्रति गहरे सम्मान को बयां कर रहा था. यह उदयपुर के पहलवानों की एक ऐसी खास परंपरा है, जिसके जरिए वे अपने उस्ताद को अखाड़े की कला के माध्यम से अपनी आखिरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
भगवानलाल सेन का जीवन और योगदान
यह पूरी तरह से अनोखी अंतिम विदाई प्रसिद्ध भित्ति चित्रकार, पारंपरिक तलवारबाज और जाने-माने उस्ताद पहलवान भगवानलाल सेन की थी, जिनका 81 साल की उम्र में निधन हो गया. राव जी का हाटा और हेमराज जी पानेरी की गली के रहने वाले भगवानलाल सेन ने अपनी जिंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कला और कुश्ती को पूरी तरह से समर्पित कर दिया था. उस्ताद भगवानलाल सेन अपनी शानदार तलवारबाजी के प्रदर्शन के लिए खास तौर पर जाने जाते थे. अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी जब वे हाथ में तलवार लेकर पारंपरिक करतब दिखाते थे, तो देखने वाले उनकी कला की जमकर सराहना करते थे. उन्होंने हाल ही में जलझूलनी एकादशी के पावन अवसर पर भी अपनी इस अद्भुत कला का प्रदर्शन किया था. रामरेवाड़ी के कार्यक्रम के बाद जब वे अपने बड़े भाई को घर छोड़कर वापस लौट रहे थे, ठीक उसी दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अंततः उनका निधन हो गया और जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो उनके शागिर्दों ने फैसला किया कि वे अपने गुरु को उसी कला के जरिए विदाई देंगे जिसे उन्होंने जीवनभर सीखा था.
शिष्यों के लिए सिर्फ प्रदर्शन नहीं था
भगवानलाल सेन की अंतिम यात्रा के दौरान अर्थी के ठीक आगे पहलवानों ने जिस तरह से अखाड़े के पारंपरिक करतबों और शस्त्र संचालन का प्रदर्शन किया, वह देखने लायक था. वहां किया जाने वाला हर एक करतब ऐसा लग रहा था मानो अपने उस्ताद की दी गई सीख को आखिरी बार दोहरा रहा हो. उन सभी शिष्यों के लिए यह पल महज कोई सामान्य प्रदर्शन या दिखावा नहीं था, बल्कि उस गुरु के प्रति उनका असीम सम्मान था जिसने उन्हें अखाड़े की पुरानी परंपरा, अनुशासन और कला के हर एक बारीक पहलू को सिखाया था. शिष्यों ने अपने उस्ताद को नमन करने के लिए इस अनोखे मार्ग को चुना ताकि उनकी यादें हमेशा जीवित रहें.
गुरु और शिष्य के रिश्ते की अनूठी परंपरा
उदयपुर शहर में गुरु और शिष्य का यह पवित्र रिश्ता यहां के अखाड़ों की बहुत पुरानी और गौरवशाली परंपरा का एक अहम हिस्सा रहा है. यहां के पहलवान अपने उस्ताद को केवल कुश्ती के दांव-पेंच सिखाने वाला एक सामान्य व्यक्ति नहीं मानते, बल्कि उन्हें जीवन जीने का सही तरीका और अनुशासन सिखाने वाला एक सच्चा मार्गदर्शक मानते हैं. यही वजह है कि जब भी शहर का कोई उस्ताद इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा होता है, तो उनके शिष्य उनके सम्मान में आगे आते हैं और अखाड़े की कला को सामने लाकर अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हैं, जो इस रिश्ते की गहराई को और अधिक मजबूत करती है.
अशोक नगर श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार
शहर के अशोक नगर श्मशान घाट पर तमाम पारंपरिक रीति-रिवाजों और विधि-विधान के साथ भगवानलाल सेन का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ. चित्रकला, पारंपरिक तलवारबाजी और कुश्ती की इस अद्भुत दुनिया में अपनी एक अलग और अनूठी पहचान बनाने वाले उस्ताद भगवानलाल सेन अब भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं रहे हैं, लेकिन उनके शागिर्दों के हाथों में जिस तरह से अखाड़े के वही पुराने करतब नजर आए, वे उनकी कला, उनके अनुशासन और उनकी दी गई अमूल्य सीख को हमेशा आगे बढ़ाते रहेंगे और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे.



















