सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय पूर्वजों की आराधना के लिए सबसे खास माना जाता है। इस बार यह विशेष अवधि शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ प्रारंभ हो रही है और 10 अक्टूबर तक जारी रहेगी। इन सोलह दिनों में लोग अपने पुरखों की दिवंगत आत्माओं की शांति और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के वास्ते पिंडदान तथा तर्पण जैसे अनुष्ठान करते हैं। इस समूचे कालखंड को महालय पक्ष या श्राद्ध पक्ष के रूप में भी पुकारा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों में विधि-विधान से तर्पण करने पर व्यक्ति को पितृ दोष और पूर्वजों के कर्ज से छुटकारा मिल जाता है। इससे घर-परिवार में हमेशा सुख-शांति और समृद्धि का वास बना रहता है।
घर से दूर रहने वालों के लिए विशेष नियम
आधुनिक जीवनशैली और व्यस्त दिनचर्या के चलते बहुत से लोग नौकरी या अन्य कारणों से अपने मूल निवास या पैतृक स्थान पर नहीं जा पाते हैं। हालांकि, वे अपने पुरखों के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं और उनकी मुक्ति के लिए अनुष्ठान करना चाहते हैं। ऐसे लोग अपनी क्षमता और सुविधानुसार कुछ खास उपाय अपनाकर पितरों को प्रसन्न कर सकते हैं। शास्त्रों के मुताबिक, यदि कोई अपने पैतृक स्थल से दूर भी है, तो भी वह अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने से वंचित नहीं रहता है। इन सोलह दिनों के दौरान इंसान का पूरा फोकस पुरखों का आशीर्वाद पाने और पितृ-ऋण उतारने पर होना चाहिए।
पशु-पक्षियों और जीवों की सेवा
जो लोग अपने घर से दूर रह रहे हैं, वे इन पूरे सोलह दिनों तक नियमित रूप से पशु-पक्षियों को भोजन कराकर पितरों को संतुष्ट कर सकते हैं। इसके लिए अपनी छत या बालकनी में पक्षियों के वास्ते दाना और पीने के पानी का प्रबंध किया जा सकता है। इसके अलावा गाय, कुत्ते या अन्य जरूरतमंद मवेशियों को रोटी और फल खिलाना भी बेहद फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोसेवा का इस काल में विशेष महत्व बताया गया है, इसलिए पास की किसी गोशाला में जाकर गायों को हरा चारा खिलाना चाहिए। इसके साथ ही पुरखों की याद को चिरस्थायी बनाने के लिए पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना भी बहुत उत्तम कर्म माना गया है।
जल अर्पण और दीपदान के नियम
इन सोलह दिनों के दौरान हर रोज दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल और जल अर्पित करने का विधान है। इसे घर के बाहर किसी गमले या खुले स्थान पर किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, गरीबों की मदद करना, उन्हें भोजन कराना और जरूरतमंदों को उनकी आवश्यकता की वस्तुएं भेंट करना बहुत शुभ फल देता है। शाम के समय घर में दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके तेल का दीपक जलाना चाहिए। दिन या संध्या के समय पीपल के पेड़ के पास जाकर उसकी जड़ में पानी, कच्चा दूध और काले तिल का मिश्रण चढ़ाना चाहिए। पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीया प्रज्वलित करके अपने पुरखों का स्मरण करने से उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।



















