धार्मिक नगरी उज्जैन के आसपास कई ऐसे अनूठे आस्था केंद्र मौजूद हैं, जिनकी रहस्यमयी परंपराएं और मान्यताएं हर किसी को अचंभित कर देती हैं। ऐसा ही एक पावन और चमत्कारी धाम जलेश्वर महादेव का है, जो मां चंबल नदी के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है। इस स्थान पर चंबल नदी की जलधारा त्रिशूल के आकार में प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है। बरसात के दिनों में जब नदी अपने चरम पर होती है और उफान मारती है, तब यहां एक ऐसा अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। इंगोरिया के नजदीक स्थित यह प्राचीन मंदिर भक्तों की अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, और ऐसी दृढ़ मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
चंबल के जलप्रवाह में सुरक्षित रहती है मंदिर की हर चीज
जलेश्वर महादेव की महिमा से जुड़ी बातें आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं। चंबल नदी के मध्य विराजमान इस स्वयंभू शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि कितनी भी भयंकर बाढ़ आ जाए और जलप्रवाह कितना भी प्रचंड क्यों न हो, वह इस धाम की दिव्यता को खंडित नहीं कर पाता। स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, नदी के बहाव में आने वाली देवी-देवताओं की तमाम प्राचीन प्रतिमाएं यहां आकर अपने आप रुक जाती हैं। यही वजह है कि मंदिर परिसर के आसपास आपको सैकड़ों खंडित मूर्तियां देखने को मिल जाएंगी, जो इस पवित्र स्थल के रहस्य और यहां के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती हैं।
क्यों कहा जाता है मालवा का केदारनाथ
जलेश्वर महादेव की महिमा की तुलना उत्तराखंड के प्रसिद्ध धाम से की जाती है। जिस प्रकार बाबा केदारनाथ के कपाट वर्ष में केवल छह महीने ही खुलते हैं और छह महीने दर्शन बंद रहते हैं, ठीक उसी प्रकार जलेश्वर महादेव के दर्शन भी साल में केवल छह महीने ही हो पाते हैं। वर्ष के बाकी के छह महीनों में यह स्वयंभू शिवलिंग पूरी तरह से पानी के भीतर समाहित रहता है। इसी अनूठी परंपरा और भौगोलिक स्थिति के कारण भक्त इन्हें मालवा के केदारनाथ के रूप में पूजते और पुकारते हैं।
बाढ़ के बीच भी सुरक्षित रहती हैं मंदिर की घंटी और ध्वज
मानसून के मौसम में जब चंबल नदी अपने विकराल रूप में होती है, तब जलेश्वर धाम पर एक अनोखा और अविश्वसनीय चमत्कार नजर आता है। बाढ़ के उस तेज बहाव में बड़े-बड़े पेड़ और चट्टानें तक तिनके की तरह बह जाती हैं, लेकिन स्वयंभू शिवलिंग जलधारा की दिशा को मात देते हुए उसके विपरीत जाकर मंदिर से कुछ दूरी पर स्थापित हो जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस भयंकर जलप्रलय के बीच भी मंदिर की घंटी और ऊपर लहराता ध्वज पूरी तरह सुरक्षित बने रहते हैं। इसके बाद, जब बारिश थमने पर नदी का जलस्तर कम होता है, तब श्रद्धालु वापस जाकर शिवलिंग को ससम्मान पुनः उसकी जलाधारी पर स्थापित करते हैं।



















