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पलामू का अनोखा शिव धाम, जहां एक ही छत के नीचे होते हैं 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शनधर्म
10 अग॰ 2026, 8:40 pm (51 दिन पहले)· 1

पलामू का अनोखा शिव धाम, जहां एक ही छत के नीचे होते हैं 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन

पलामू के मेदिनीनगर में स्थित भगवती भवन मंदिर में भगवान शिव के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमूर्तियां एक ही परिसर में स्थापित हैं, जहां सावन के महीने में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

झारखंड के पलामू जिले में स्थित एक खास धार्मिक स्थल इन दिनों भक्तों के बीच भारी आस्था का केंद्र बना हुआ है। आमतौर पर देश के अलग-अलग कोनों में स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को लंबी और कठिन यात्राएं करनी पड़ती हैं, लेकिन पलामू में एक ऐसा अनूठा मंदिर मौजूद है जहां एक ही परिसर के भीतर द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई है। सावन के इस पवित्र महीने में इस स्थल का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यहां भगवान शिव की आराधना के लिए दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और जलाभिषेक कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।

रेड़मा चौक पर स्थित है भगवती भवन मंदिर

यह अनोखा धार्मिक स्थल पलामू के मेदिनीनगर में रेड़मा चौक के समीप स्थित है, जिसे भगवती भवन मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर परिसर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां दक्षिणेश्वर मां काली की प्रतिमा के साथ-साथ भगवान शिव के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की सुंदर प्रतिमूर्तियां एक ही स्थान पर विराजमान हैं। सावन के पूरे महीने इस प्रांगण में शिव भक्तों का तांता लगा रहता है और सुबह से ही लोग कतारबद्ध होकर भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजन करते नजर आते हैं।

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उज्जैन के महाकाल की मिट्टी से जुड़ी है खास मान्यता

इस मंदिर से जुड़ी कई ऐसी धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो भक्तों को अपनी ओर खींचती हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी शिबुल पंडित के अनुसार, इस परिसर में स्थापित महाकाल ज्योतिर्लिंग की प्रतिमूर्ति को तैयार करने के लिए विशेष रूप से उज्जैन से महाकाल की मिट्टी लाई गई थी। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता है कि भगवान महाकाल अपने भक्तों की अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं। इसी अटूट विश्वास के कारण तमाम श्रद्धालु यहां आकर महाकाल की प्रतिमूर्ति पर जल अर्पित करते हैं और अपने परिवार के लिए लंबी आयु के साथ सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

साठ साल पुरानी है ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की परंपरा

भगवती भवन मंदिर में इन सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के विराजमान होने का इतिहास काफी पुराना है। मुख्य पुजारी शिबुल पंडित ने जानकारी दी कि इस मंदिर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना करीब साठ साल पहले की गई थी। इस पावन स्थापना के पीछे एक खास अनुष्ठानिक परंपरा का पालन किया गया था, जिसके तहत देश के उन सभी संबंधित ज्योतिर्लिंग स्थलों से पवित्र मिट्टी और जल लाया गया था तथा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ इनकी स्थापना संपन्न हुई थी। यही कारण है कि इस मंदिर की ख्याति केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले भक्तों के बीच भी फैली हुई है।

वर्ष 1978 से सेवा दे रहे हैं मुख्य पुजारी

इस मंदिर की परंपरा और पवित्रता को सहेजने में इसके मुख्य पुजारी शिबुल पंडित का भी लंबा योगदान रहा है। वे वर्ष 1978 से लगातार इस मंदिर की सेवा में पूरी निष्ठा के साथ जुटे हुए हैं और नियमित रूप से पूजा-अर्चना संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि हिंदू शास्त्रों में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की महिमा का बहुत विस्तार से वर्णन मिलता है। उसी प्राचीन आस्था और धार्मिक परंपरा को जीवित रखते हुए आज यह मंदिर भक्तों को एक ही प्रांगण में सभी स्वरूपों के दर्शन का दुर्लभ अवसर प्रदान कर रहा है, जिससे लोगों को अलग-अलग जगहों की यात्रा किए बिना ही सभी ज्योतिर्लिंगों का आशीर्वाद मिल जाता है।

सावन माह में उमड़ती है भारी भीड़

हिंदू पंचांग के अनुसार सावन का महीना देवों के देव महादेव को समर्पित होता है और इस दौरान शिव साधना का विशेष महत्व माना जाता है। इसी वजह से सावन के दिनों में भगवती भवन मंदिर में भक्तों की आवाजाही कई गुना बढ़ जाती है। लोग अपने घरों से निकलकर इस प्रांगण में पहुंचते हैं, द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करते हैं और विधि-विधान से जलाभिषेक कर भगवान शिव से अपनी हर मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। बरसों पुरानी इस परंपरा और गहरी आस्था ने पलामू के इस मंदिर को इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख और खास आध्यात्मिक केंद्र बना दिया है।

सवाल-जवाब

पलामू का यह विशेष मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर पलामू के मेदिनीनगर में रेड़मा चौक के पास स्थित है, जिसे भगवती भवन मंदिर कहा जाता है।
इस मंदिर की मुख्य विशेषता क्या है?
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमूर्तियां एक ही परिसर में स्थापित हैं।
महाकाल ज्योतिर्लिंग की प्रतिमूर्ति से क्या मान्यता जुड़ी है?
मान्यता है कि उज्जैन की मिट्टी से स्थापित महाकाल की प्रतिमूर्ति पर जल चढ़ाने से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
मंदिर में इन ज्योतिर्लिंगों की स्थापना कब हुई थी?
मुख्य पुजारी के अनुसार इस मंदिर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना करीब साठ वर्ष पुरानी परंपरा है।
मंदिर के मुख्य पुजारी कौन हैं?
शिबुल पंडित इस मंदिर के मुख्य पुजारी हैं जो वर्ष 1978 से यहां पूजा-अर्चना और सेवा दे रहे हैं।
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