वाराणसी में गंगा किनारे बसा प्रभु जगन्नाथ का धाम देश का दूसरा सबसे प्राचीन जगन्नाथ मंदिर माना जाता है। इस धाम की सबसे अनोखी परंपरा है वह चमत्कारी काढ़ा, जो हर साल प्रभु जगन्नाथ को बीमारी के दौरान चढ़ाया जाता है। मंदिर के गर्भगृह में पुजारी बेहद गोपनीय तरीके से इस काढ़े को तैयार करते हैं और इसी से बीमार पड़े प्रभु का इलाज किया जाता है।
14 दिन की बीमारी और एकांतवास
आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा से चतुर्दशी तिथि तक, यानी पूरे 14 दिनों तक प्रभु जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ बीमार रहते हैं। इस दौरान तीनों को स्वस्थ्य करने के लिए रोज आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। प्रभु इन 14 दिनों तक पूरी तरह एकांतवास में रहते हैं और मंदिर का कपाट भी बंद कर दिया जाता है। इसके बावजूद भक्त इस काढ़े वाले प्रसाद को पाने के लिए मंदिर पहुंचना नहीं छोड़ते।
चमत्कारी काढ़े का राज
मंदिर के प्रधान पुजारी राधेश्याम के मुताबिक, मान्यता है कि जो भक्त पूरे 14 दिनों तक लगातार यह काढ़ा पीता है, उसे हर तरह के शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती है और वह पूरे साल निरोग यानी बीमारियों से दूर रहता है। यही कारण है कि हर शाम काढ़े का प्रसाद लेने के लिए मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। पुजारी बताते हैं कि प्रभु जगन्नाथ का यह काढ़ा औषधीय गुणों से भरपूर होता है और इसे लौंग, इलायची, काली मिर्च, तेजपत्ता, गुड़, तुलसी और मुलेठी सहित कई अन्य चीजों से तैयार किया जाता है। इसे बनाते समय पवित्रता का खास ध्यान रखा जाता है और सिर्फ पुजारी ही इसे गुपचुप तरीके से बनाकर प्रभु जगन्नाथ को भोग लगाते हैं।
परवल के जूस से स्वस्थ्य होकर निकलती है रथयात्रा
14 दिनों तक लगातार काढ़ा पीने के बाद आखिरी दिन प्रभु जगन्नाथ परवल का जूस पीकर पूरी तरह स्वस्थ्य हो जाते हैं। इसके बाद मनफेर की रस्म के तहत वो डोली में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। नगर भ्रमण के अगले ही दिन रथयात्रा निकाली जाती है। इसके बाद तीन दिनों तक प्रभु जगन्नाथ भक्तों के बीच ही रहते हैं और उनकी मुरादें सुनते हैं।













