अमेरिका के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक नई हलचल है। एक सरकारी पायलट प्रोग्राम में शामिल कई स्टार्टअप कंपनियों ने अपने प्रायोगिक रिएक्टरों को क्रिटिकलिटी तक पहुंचा दिया है, यानी वह चरण जहां रिएक्टर के भीतर परमाणु चेन रिएक्शन खुद को बनाए रखने लगती है। यह बिजली उत्पादन की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है। यह सब उस समयसीमा से ठीक पहले हो रहा है जो डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल एक कार्यकारी आदेश के जरिए तय की थी, जिसके तहत 4 जुलाई तक कम से कम तीन रिएक्टरों को क्रिटिकल करना था। मगर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह उपलब्धि उद्योग के लिए भले ही अच्छी पब्लिसिटी हो, नए डिजाइन वाले रिएक्टरों को असली कमर्शियल प्रोडक्ट बनने में अभी लंबा वक्त लगेगा।
ब्रेकथ्रू इंस्टीट्यूट के न्यूक्लियर एनर्जी इनोवेशन प्रोग्राम के डायरेक्टर एडम स्टेन कहते हैं, ये प्रोटोटाइप सब कुछ भी हैं और कुछ भी नहीं। उनके मुताबिक ये कंपनियों के लिए बहुत मायने रखते हैं, लेकिन इन कंपनियों के लिए भी ये अभी कमर्शियल प्रोडक्ट नहीं बल्कि टेस्ट रिएक्टर ही हैं।
दशकों से एक जैसी तकनीक पर टिका उद्योग
पिछले कई दशकों से अमेरिका का परमाणु ऊर्जा उद्योग बड़े लाइट वाटर रिएक्टरों पर टिका रहा है, जिनमें गर्मी को स्थानांतरित करने और चेन रिएक्शन बनाए रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है। छोटे और अलग डिजाइन वाले रिएक्टर बनाने का सपना लंबे समय से अधूरा रहा, क्योंकि रेगुलेशन की प्रक्रिया बेहद धीमी रही और नई डिजाइन विकसित करने के लिए छोटी कंपनियों को भारी शुरुआती लागत उठानी पड़ती थी।
एडम स्टेन कहते हैं कि उद्योग को हमेशा से अटका हुआ माना जाता रहा है, यानी परमाणु रिएक्टर हमेशा दस साल दूर ही लगता था। उनके मुताबिक यह पायलट प्रोग्राम दिखाता है कि अगर जानबूझकर तेजी लाई जाए तो यह धारणा गलत साबित हो सकती है। इससे पूरी नैरेटिव और सोच बदल जाती है, और निवेशकों की दुनिया के लिए इसके बड़े मायने हैं।
सिलिकॉन वैली की दिलचस्पी और सरकार की सक्रियता
अमेरिका में निवेशकों और तकनीकी जगत के कई बड़े नाम छोटे परमाणु रिएक्टरों को तकनीक के एक नए स्वर्णिम युग का हिस्सा मानने लगे हैं, क्योंकि ये डेटा सेंटरों और अन्य कामों के लिए चौबीसों घंटे कार्बन मुक्त बिजली दे सकते हैं। टेक जगत ने ट्रंप प्रशासन पर लगातार दबाव बनाया है कि नियम कायदे ढीले किए जाएं और छोटे रिएक्टर डिजाइनों के विकास में तेजी लाई जाए। प्रशासन ने भी इस पर कई कदम उठाए हैं, जिनमें पिछले साल के कार्यकारी आदेश के जरिए यह पायलट प्रोग्राम शुरू करना भी शामिल है। मई 2025 में जारी इस आदेश में एक बेहद आक्रामक समयसीमा तय की गई, ताकि कम से कम तीन रिएक्टर देश की 250वीं वर्षगांठ के जश्न के साथ यानी 4 जुलाई तक क्रिटिकल हो जाएं।
नियमों में ढील और नेशनल लैब्स की मदद
फरवरी में अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने चुपचाप उन रिएक्टरों के लिए कई पर्यावरण और सुरक्षा नियमों में कटौती कर दी जो उसके दायरे में आते हैं, जिनमें इसी पायलट प्रोग्राम के तहत बनाए जा रहे रिएक्टर भी शामिल हैं। इसी तरह की नियामकीय कटौती अब न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमीशन (NRC) में भी की जा रही है, जो उन रिएक्टरों को मंजूरी देता है जिन्हें कमर्शियल तौर पर बेचा जाना है। एडम स्टेन का कहना है कि एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट स्टेटमेंट जैसी प्रक्रियाओं को छोटा करने से, जिनमें आमतौर पर सालों लग जाते हैं, प्रोग्राम में शामिल कंपनियों का काफी वक्त बच गया।
इन कंपनियों को सिर्फ कागजी नियमों में ढील से ही फायदा नहीं मिला, बल्कि सरकारी फंडिंग वाली नेशनल लैब्स से भी मदद मिली। वालर एटॉमिक्स ने पिछले साल के आखिर में लॉस अलामोस नेशनल लेबोरेटरी में क्रिटिकलिटी हासिल की, जहां लैब ने कंपनी के फ्यूल और अहम स्ट्रक्चरल पुर्जों वाला कोर मुहैया कराया था। इसी महीने की शुरुआत में कंपनी ने यूटा में एक राज्य-वित्त पोषित लैब साइट पर दूसरे रिएक्टर के साथ फिर से क्रिटिकलिटी हासिल की। इस पायलट प्रोग्राम में शामिल दो अन्य कंपनियां, अंतारेस न्यूक्लियर और डिप्लॉएबल एनर्जी, जिन्होंने कार्यकारी आदेश की 4 जुलाई की समयसीमा भी पूरी की, उन्होंने भी नेशनल लैब्स में ही क्रिटिकलिटी हासिल की।
आलो एटॉमिक्स को अभी इंतजार
आलो एटॉमिक्स के सह संस्थापक और सीईओ मैट लोज़ैक कहते हैं कि उनकी कंपनी जिस रफ्तार से आगे बढ़ पाई है, उसका श्रेय सरकार द्वारा नए रिएक्टर विकास को प्राथमिकता देने को जाता है। उनकी कंपनी भी इसी पायलट प्रोग्राम का हिस्सा है, हालांकि अभी उसने क्रिटिकलिटी हासिल नहीं की है, पर उसे उम्मीद है कि यह जल्द ही हो जाएगा।
मैट लोज़ैक बताते हैं कि पहले किसी दस्तखत के लिए इंतजार करना पड़ता था और कई बार फाइल किसी अफसर की मेज पर पांच हफ्तों तक पड़ी रहती थी। अब हालात यह हैं कि काम अगले ही दिन हो जाता है, क्योंकि यह अब पूरे देश के लिए एक प्राथमिकता बन चुका है।
क्रिटिकलिटी का मतलब बिजली उत्पादन नहीं
यह ध्यान रखना जरूरी है कि क्रिटिकलिटी हासिल करने का मतलब यह नहीं कि ये रिएक्टर बिजली भी बना रहे हैं। जैसे आलो एटॉमिक्स के रिएक्टर में अभी वह सोडियम वाला हिस्सा नहीं लगा है, जो कंपनी के अंतिम कमर्शियल रिएक्टर में होगा। हालांकि गुरुवार को वालर एटॉमिक्स के रिएक्टर डिजाइन ने एक छोटे प्रदर्शन के दौरान एक एनवीडिया चिप को बिजली देकर एक नया इतिहास रच दिया, यह अमेरिका में बिजली देने वाला पहला एडवांस्ड रिएक्टर बन गया। सिर्फ यह साबित करना कि लैब जैसी सेटिंग में क्रिटिकलिटी संभव है, जो कि देश भर के कई कॉलेज कैंपस भी करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि कोई छोटा रिएक्टर ग्रिड से जुड़ने या किसी डेटा सेंटर को बिजली देने के लिए तैयार है।
लाइसेंसिंग और फ्यूल सप्लाई चेन की चुनौती
किसी भी कमर्शियल प्रोडक्ट को अभी भी न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमीशन से लाइसेंस लेना होगा, जिसमें परंपरागत रूप से सालों लग जाते हैं। ट्रंप प्रशासन की नियामकीय कटौतियां इस प्रक्रिया को काफी छोटा कर सकती हैं। राइट ने सीएनबीसी को बताया कि NRC, उनके विभाग के साथ मिलकर इस पायलट प्रोग्राम में शामिल रिएक्टरों के कमर्शियलाइजेशन के लिए एक तेज समयसीमा तैयार करने पर काम कर रहा है। एडम स्टेन का कहना है कि सप्लाई चेन, खासकर फ्यूल की सप्लाई, इस पायलट प्रोग्राम की कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंचने में एक बड़ी बाधा बन सकती है। यह बात खासतौर पर उन कंपनियों पर लागू होती है जिन्हें फ्यूल जुटाने में अमेरिकी ऊर्जा विभाग से मदद मिली है।
अति उत्साह से बचने की सलाह
वेरिटेन में न्यूक्लियर और पावर स्ट्रैटेजी के सीनियर डायरेक्टर ब्रेट रैम्पल कहते हैं कि 2026 में नए रिएक्टर क्रिटिकल कराना और नई रिएक्टर तकनीक तैनात करना वाकई एक शानदार उपलब्धि है। वेरिटेन एक निवेश और रणनीति फर्म है, और आलो एटॉमिक्स उसकी क्लाइंट है। लेकिन ब्रेट रैम्पल आगाह करते हैं कि उद्योग का एक हिस्सा परमाणु ऊर्जा के नए स्वर्णिम युग वाले विचार को जरूरत से ज्यादा रोमांटिक बना रहा है, बिना इस वित्तीय हकीकत को पूरी तरह स्वीकार किए कि परमाणु प्लांट बनाना अब भी महंगा और वक्त लेने वाला काम है।
ब्रेट रैम्पल कहते हैं कि अगर पीछे मुड़कर देश भर में बने सभी परमाणु पावर प्लांट्स पर नजर डाली जाए, तो औसतन ये सभी तय लागत और बजट से ज्यादा में ही बने हैं।













