लाल ग्रह की सतह पर खोजबीन कर रहे नासा के परसीवरेंस रोवर ने एक अद्भुत खगोलीय घटना को अपने कैमरे में दर्ज किया है। 2 जुलाई 2026 को रोवर के 1907वें मंगल दिवस (सोल 1907) के दौरान, हमारी पृथ्वी मंगल के छोटे चंद्रमा फोबोस के पीछे पूरी तरह गायब होती दिखाई दी। यह दुर्लभ नजारा जेजेरो क्रेटर के किनारे से रिकॉर्ड किया गया, जहां 2021 में उतरने के बाद से रोवर लगातार वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है। अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी दूसरे ग्रह की सतह से पृथ्वी का इस तरह किसी चंद्रमा के पीछे छिपना देखा गया है।
मंगल के क्षितिज पर एक ऐतिहासिक खगोलीय घटना
यह पूरी घटना मंगल के स्थानीय समय के अनुसार शाम के लगभग 7 बजे घटित हुई। उस वक्त मंगल ग्रह पर सूर्यास्त हुए करीब 40 मिनट का समय बीत चुका था। इस दुर्लभ नजारे की तस्वीरें लेने के लिए रोवर में लगे उच्च तकनीक वाले मास्टकैम-जेड कैमरे का इस्तेमाल किया गया। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित इस जूम कैमरा सिस्टम ने पूरी घटना के दौरान नौ तस्वीरें लीं, जिन्हें मिलाकर एक विस्तृत कंपोजिट चित्र तैयार किया गया।
यह खगोलीय दृश्य केवल 40 सेकंड तक चला, जिसे मुख्य रूप से पांच अलग-अलग फ्रेमों में कैद किया गया। तस्वीरों के इस अनुक्रम में पृथ्वी फ्रेम के ऊपरी बाएं हिस्से से निचले दाएं हिस्से की तरफ बढ़ती दिखती है। ठीक उसी समय, फोबोस निचले बाएं हिस्से से ऊपरी दाएं हिस्से की तरफ बढ़ रहा था। तीसरे फ्रेम में दोनों खगोलीय पिंड एक-दूसरे के सामने आए, और कुछ ही पलों में पृथ्वी फोबोस के अंधेरे वाले हिस्से के पीछे ओझल हो गई।
कैसे एक छोटे से चंद्रमा ने ढक ली विशाल पृथ्वी?
इस अनूठी घटना को समझने के लिए फोबोस के आकार और उसकी कक्षा का विश्लेषण जरूरी है। फोबोस कोई गोल चंद्रमा नहीं है, बल्कि यह आलू की तरह ऊबड़-खाबड़ और अनियमित आकार वाली एक विशाल चट्टान है। इसकी कुल चौड़ाई केवल 27 किलोमीटर (17 मील) है। तुलनात्मक रूप से देखें तो हमारी पृथ्वी का अपना चंद्रमा लगभग 3,475 किलोमीटर चौड़ा है, जो फोबोस से सौ गुना से भी अधिक बड़ा है। इसके बावजूद, फोबोस मंगल की सतह से देखने पर पृथ्वी को ढकने में सक्षम रहा।
फोबोस का इतना प्रभावी दिखाई देने का मुख्य कारण उसकी मंगल ग्रह से अत्यधिक निकटता है। फोबोस मंगल की सतह से मात्र 7,800 किलोमीटर की दूरी पर परिक्रमा करता है। यह दूरी पृथ्वी और हमारे चंद्रमा के बीच की दूरी का सिर्फ पचासवां हिस्सा है। इतनी कम दूरी के कारण ही मंगल के आकाश में फोबोस का आकार बहुत बड़ा और प्रभावशाली नजर आता है, जिससे वह दूर स्थित पिंडों को आसानी से ब्लॉक कर देता है।
314 मिलियन किलोमीटर दूर से कैसा दिखा हमारा ग्रह
जब परसीवरेंस रोवर के कैमरों ने यह नजारा रिकॉर्ड किया, उस वक्त पृथ्वी और मंगल के बीच की दूरी लगभग 314 मिलियन किलोमीटर थी। यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी के दोगुने से भी अधिक है। इतनी विशाल दूरी होने के कारण, अरबों लोगों का घर यानी हमारी विशाल पृथ्वी, मंगल के आसमान में केवल एक एकल चमकते हुए पिक्सल के रूप में दिखाई दे रही थी।
मास्टकैम-जेड के डिप्टी प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर जस्टिन माकी ने जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी से इस घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। जस्टिन माकी ने कहा, "यह कंपोजिट इमेज किसी दूसरे ग्रह की सतह से ली गई एक अनोखी अर्थ सेल्फ-पोर्ट्रेट बनाती है, जिसमें फोबोस की मौजूदगी भी दर्ज हुई है।"
योजनाबद्ध तैयारी, किस्मत और वैज्ञानिक शब्दावली
बोल्डर कोलोराडो में स्थित स्पेस साइंस इंस्टीट्यूट के सह-अन्वेषक मार्क लेमन ने इस विशेष अवलोकन की योजना बनाई थी। उन्होंने बताया कि इस तरह की सटीक घटना को कैमरे में कैद करने के लिए अत्यधिक सूक्ष्म गणनाओं और थोड़े भाग्य की आवश्यकता होती है। मार्क लेमन ने कहा, "फोबोस दिन में तीन बार मंगल के आसमान से गुजरता है, लेकिन एक को दूसरे के ठीक पीछे पकड़ने के लिए सही योजना और किस्मत की जरूरत थी।"
खगोलशास्त्र में इस तरह की घटनाओं को समझने के लिए अलग-अलग परिभाषिक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। जब देखने वाले के दृष्टिकोण से कोई बड़ा दिखने वाला पिंड किसी छोटे दिखने वाले पिंड को पूरी तरह से ढक लेता है, तो उसे ऑकल्टेशन (छायादन) कहा जाता है। इसके विपरीत, ग्रहण (एक्लिप्स) तब होता है जब कोई पिंड किसी अन्य पिंड की छाया में चला जाता है। वहीं ट्रांजिट (पारगमन) उस स्थिति को कहते हैं जब एक छोटा दिखने वाला पिंड किसी बड़े पिंड के सामने से गुजरता है। परसीवरेंस रोवर ने इससे पहले फोबोस को सूर्य के सामने से गुजरते हुए भी रिकॉर्ड किया है, जिसे सामान्य भाषा में मंगल का सूर्य ग्रहण कहा जाता है। भविष्य के मंगल मिशनों से वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे ऐसी और भी ऑकल्टेशन घटनाओं को कैद कर सकेंगे।



















