भौतिकी की दुनिया में कुछ ऐसे कण मौजूद हैं जो हर सेकंड हमारे शरीर, पृथ्वी और पूरे ब्रह्मांड के आर-पार बिना किसी रुकावट के गुजर रहे हैं। इन्हें न्यूट्रिनो कहा जाता है। लगभग न के बराबर द्रव्यमान और शून्य विद्युत आवेश वाले इन कणों को पकड़ना विज्ञान के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा है। इन्हें पकड़ने के लिए वैज्ञानिकों को जमीन के 1.5 किलोमीटर नीचे, समुद्र की गहराइयों में और विशालकाय टैंकों के अंदर दुनिया के सबसे अनोखे प्रयोग स्थापित करने पड़े। सत्तर साल पहले शुरू हुआ यह सफर आज ब्रह्मांड के निर्माण और तारों के भीतर चल रही परमाणु भट्ठियों के रहस्य खोल रहा है।
बीटा क्षय की गुत्थी और वोल्फगैंग पाउली की ऐतिहासिक भविष्यवाणी
न्यूट्रिनो की खोज की कहानी 1920 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुई थी, जब दुनिया भर के भौतिक विज्ञानी रेडियोधर्मी प्रक्रिया के दौरान होने वाले बीटा क्षय (बीटा डेके) को लेकर उलझन में थे। इस प्रक्रिया में ऊर्जा का कुछ हिस्सा रहस्यमयी तरीके से गायब होता हुआ प्रतीत होता था। स्थापित भौतिकी के नियमों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। फिर वर्ष 1930 में ऑस्ट्रिया के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी वोल्फगैंग पाउली ने एक क्रांतिकारी विचार प्रस्तावित किया। उन्होंने सुझाव दिया कि एक अत्यंत सूक्ष्म और लगभग अदृश्य कण इस बची हुई ऊर्जा को चुपचाप अपने साथ ले जा रहा है।
उस समय वोल्फगैंग पाउली खुद इस विचार को लेकर संशय में थे। उन्होंने अपने एक मित्र से बातचीत के दौरान कहा था कि उन्होंने एक ऐसा कण प्रस्तावित करके बहुत बड़ी गलती कर दी है जिसे कभी खोजा ही नहीं जा सकता। बाद में इसी अदृश्य कण का नाम न्यूट्रिनो पड़ा। क्योंकि इस कण पर कोई इलेक्ट्रिक चार्ज नहीं होता और इसका द्रव्यमान लगभग शून्य के बराबर होता है, इसलिए यह सामान्य पदार्थ के साथ बहुत ही दुर्लभ मामलों में संपर्क करता है। सूर्य और तारों के केंद्र में होने वाली नाभिकीय प्रतिक्रियाओं से खरबों की संख्या में न्यूट्रिनो उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मांड में प्रकाश की गति के करीब की चाल से दौड़ते रहते हैं।
प्रोजेक्ट पोलटरगाइस्ट: सवाना रिवर प्लांट में पहला सफल जाल
पाउली की भविष्यवाणी के लगभग 26 साल बाद, वर्ष 1956 में वैज्ञानिकों ने इस 'भूतिया कण' को पकड़ने का पहला वास्तविक प्रयास किया। अमरीका के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक राइन्स ने साउथ कैरोलिना स्थित सवाना रिवर प्लांट में एक शक्तिशाली परमाणु रिएक्टर के पास अपना प्रयोग स्थापित किया। इस ऐतिहासिक प्रयोग का नाम 'प्रोजेक्ट पोलटरगाइस्ट' रखा गया था, क्योंकि इसका उद्देश्य एक ऐसे कण को पकड़ना था जो किसी भूत की तरह पदार्थों के आर-पार निकल जाता है।
क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक राइन्स ने 10 टन वजनी एक कस्टम-निर्मित डिटेक्टर तैयार किया। इस डिटेक्टर को बाहरी रेडिएशन और शोर से बचाने के लिए भारी सीसे (लेड) की दीवारों और गीले रेत के बोरों से चारों तरफ से ढका गया था। जब परमाणु रिएक्टर से न्यूट्रिनो निकले, तो उनमें से कुछ दुर्लभ कण डिटेक्टर के भीतर मौजूद पदार्थ से टकराए। इस प्रयोग ने पहली बार दुनिया को साबित करके दिखाया कि न्यूट्रिनो केवल कागजी सिद्धांत नहीं, बल्कि एक वास्तविक भौतिक कण हैं। इस अभूतपूर्व सफलता ने कण भौतिकी के नए युग का द्वार खोल दिया।
होमस्टेक खदान का प्रयोग और सौर न्यूट्रिनो की पहेली
एक बार जब यह साबित हो गया कि न्यूट्रिनो का अस्तित्व है, तो वैज्ञानिकों का ध्यान एक बड़े प्रश्न पर केंद्रित हुआ। यदि तारों के भीतर परमाणु संलयन (न्यूक्लियर फ्यूजन) से न्यूट्रिनो उत्पन्न होते हैं, तो क्या हम उनका अध्ययन करके सूर्य के अंदरूनी हिस्से को देख सकते हैं? समस्या यह थी कि जो कण पूरी पृथ्वी को बिना छुए पार कर सकता है, उसे अंतरिक्ष से आते हुए कैसे पकड़ा जाए? वैज्ञानिकों ने गणित लगाया कि दुर्लभ टकराव वाले कणों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में पदार्थ की आवश्यकता होगी और उस पदार्थ को कॉस्मिक किरणों से बचाने के लिए जमीन के काफी नीचे रखना होगा।
इसी सोच के साथ 1960 के दशक में ब्रूकहावेन नेशनल लेबोरेटरी के वैज्ञानिक रेमंड डेविस जूनियर और उनके साथियों ने अमरीका के साउथ डकोटा स्थित होमस्टेक खदान में 1.5 किलोमीटर की गहराई पर एक विशाल टैंक स्थापित किया। इस टैंक में लगभग 400,000 लीटर परक्लोरोएथिलीन भरा गया, जो आमतौर पर कपड़ों की ड्राई क्लीनिंग में इस्तेमाल होने वाला क्लोरीन-आधारित तरल पदार्थ है। जब सूर्य से आने वाला न्यूट्रिनो इस टैंक में मौजूद क्लोरीन के नाभिक से टकराता था, तो वह रेडियोधर्मी आर्गन में बदल जाता था, जिसे वैज्ञानिक गिन सकते थे। यह प्रयोग 25 वर्षों तक चला, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या सामने आई। सिद्धांत के अनुसार सूर्य से जितने न्यूट्रिनो आने चाहिए थे, प्रयोग में केवल उसका एक-तिहाई हिस्सा ही दर्ज हुआ। इसे विज्ञान जगत में 'सोलर न्यूट्रिनो प्रॉब्लम' कहा जाने लगा।
पानी और चेरेनकोव प्रकाश: कामिओकांडे तथा न्यूट्रिनो दोलन की खोज
सौर न्यूट्रिनो की इस पहेली को सुलझाने में कई दशक लग गए। इसका समाधान जापान के कामिओका खदान में बने एक नए प्रकार के डिटेक्टर से मिला। वैज्ञानिक मासातोशी कोशिबा ने कामिओकांडे नामक डिटेक्टर बनाया, जिसमें 30 लाख लीटर अत्यंत शुद्ध (अल्ट्राप्योर) पानी का उपयोग किया गया था। जब न्यूट्रिनो पानी के परमाणु नाभिक से टकराते हैं, तो एक अत्यधिक तेज गति वाला इलेक्ट्रॉन उत्पन्न होता है। यह इलेक्ट्रॉन पानी में प्रकाश की गति से भी तेज चलता है (उस माध्यम में), जिससे नीले रंग की एक विशेष चमक पैदा होती है जिसे चेरेनकोव लाइट कहा जाता है। संवेदनशील डिटेक्टर्स ने इस रोशनी को रिकॉर्ड किया।
कामिओकांडे के बाद जापान में इससे भी बड़ा 'सुपर-कामिओकांडे' और कनाडा में 'सडबरी न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी' (एसएनओ) बनाई गई। इन डिटेक्टर्स ने साबित किया कि न्यूट्रिनो तीन अलग-अलग रूपों या 'फ्लेवर्स' में पाए जाते हैं: इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो, म्यून न्यूट्रिनो और टाउ न्यूट्रिनो। जब ये कण अंतरिक्ष या वायुमंडल से गुजरते हैं, तो वे अपना रूप बदलते रहते हैं, जिसे न्यूट्रिनो ऑसिलेशन (दोलन) कहा जाता है। रूप बदलने की इस क्षमता का सीधा अर्थ यह था कि न्यूट्रिनो के पास द्रव्यमान (मास) होना चाहिए। यह एक ऐसी खोज थी जिसे भौतिकी के मानक मॉडल (स्टैंडर्ड मॉडल) में शामिल नहीं किया गया था।
एसएनओ+, बोरेक्सिनो, केएम3नेट और डीयूएनई: न्यूट्रिनो अनुसंधान का भविष्य
न्यूट्रिनो के रहस्यों को गहराई से समझने के लिए दुनिया भर में अत्याधुनिक प्रयोग चल रहे हैं। कनाडा की क्राइटन खदान में स्थित एसएनओ+ प्रयोग में भारी पानी की जगह लीनियर अल्काइलबेंजीन (एलएबी) का उपयोग किया जा रहा है, जो बर्तन धोने वाले डिटर्जेंट साबुन में इस्तेमाल होता है। यह तरल भारी पानी की तुलना में 50 गुना अधिक चमकदार सिग्नल पैदा करता है। इस परियोजना के निदेशक आर्ट मैकडोनाल्ड के नेतृत्व में यह तकनीक न्यूट्रिनो के नए गुणों का अध्ययन कर रही है।
इटली के एब्रूज़ो में स्थित ग्रैन सैसो नेशनल लेबोरेटरी के 'बोरेक्सिनो' डिटेक्टर ने पहली बार प्रत्यक्ष प्रमाण दिया कि सूर्य हाइड्रोजन को हीलियम में बदलने के लिए एक से अधिक तरीकों का उपयोग करता है। वहीं, भूमध्य सागर के भीतर सिसिली के तट पर 3,500 मीटर की गहराई में और फ्रांस के टूलॉन के पास 'केएम3नेट' (KM3NeT) नामक अंडरवॉटर डिटेक्टर बनाया जा रहा है, जिसमें 200,000 ऑप्टिकल सेंसर्स समुद्र के तल में एंकर किए जा रहे हैं।
भविष्य का सबसे बड़ा प्रयोग अमरीका में बन रहा 'डीयूएनई' (डीप अंडरग्राउंड न्यूट्रिनो एक्सपेरिमेंट) है। इसमें फर्मी नेशनल एक्सीलेटर लेबोरेटरी से खरबों न्यूट्रिनो उत्पन्न करके उन्हें पृथ्वी के भीतर से 1,300 किलोमीटर दूर साउथ डकोटा की सैनफोर्ड फैसिलिटी में भेजा जाएगा। इसके प्रोटोटाइप 'प्रोटोडीयूएनई' का परीक्षण स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित सर्न (CERN) प्रयोगशाला में किया जा रहा है। सत्तर वर्षों के शोध ने यह साबित कर दिया है कि ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों को खोजने के लिए धैर्य, गहरी खदानों और विशाल प्रयोगों की आवश्यकता होती है।



















