तिरुवनंतपुरम में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) आने वाले समय में देश के नागरिकों को चंद्रमा पर भेजने की दिशा में बड़े कदम उठा रहा है। इसके लिए गगनयान कार्यक्रम के तहत युद्धस्तर पर तैयारियां चल रही हैं, जिसका मुख्य मकसद इंसानों को सुरक्षित अंतरिक्ष तक ले जाने वाले यान को विकसित करना है। इसरो के वैज्ञानिक सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इससे आगे की भविष्य की योजनाओं पर भी काम कर रहे हैं। इन दीर्घकालिक प्रोजेक्ट्स के तहत देश का अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। इसके अलावा भारत की विजन 2047 योजना के तहत मानव अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में कई बड़े और दूरदर्शी लक्ष्य तय किए गए हैं, जो देश की आत्मनिर्भर और आधुनिक अंतरिक्ष ताकतों को पूरी दुनिया के सामने रखते हैं।
थुंबा में कलाम कॉर्नर और लेजर शो
तिरुवनंतपुरम के थुम्बा स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में उस ऐतिहासिक जगह पर लेजर शो का आयोजन किया जा रहा है जहां कभी डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम बैठकर काम किया करते थे। इस विशेष व्यवस्था को कलाम कॉर्नर का नाम दिया गया है, जहां लेजर शो के जरिए डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के शुरुआती वैज्ञानिक जीवन और उनके अमूल्य योगदान को बहुत ही खूबसूरती से दिखाया जाता है। यह लेजर शो उनके पुराने दफ्तर के ठीक बाहर दिखाया जाता है ताकि वहां आने वाले हर व्यक्ति को उनके जीवन से प्रेरणा मिल सके। डॉ. कलाम ने थुंबा की धरती पर ही भारत के शुरुआती अंतरिक्ष सफर को मजबूती देने में एक बेहद अहम भूमिका निभाई थी, और यही कारण है कि देशवासी आज भी उनके योगदान को बेहद सम्मान के साथ याद करते हैं।
पत्रकारों का थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन दौरा
झारखंड से तिरुवनंतपुरम पहुंचे पत्रकारों के एक दल ने ऐतिहासिक थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS) का दौरा किया। इस दौरे के दौरान मीडियाकर्मियों को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अब तक के शानदार इतिहास, उसकी बड़ी सफलताओं और आने वाले समय की महत्वाकांक्षी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया गया। इस दौरान उन्हें बताया गया कि किस तरह से थुंबा ने देश के स्पेस प्रोग्राम की नींव रखने में एक मील का पत्थर साबित होने का काम किया है और कैसे आज भी यहां से वैज्ञानिक गतिविधियां सुचारू रूप से चलाई जा रही हैं।
चर्च से म्यूजियम तक का सफर
तिरुवनंतपुरम के थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन की स्थापना साल 1962 में डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. होमी जहांगीर भाभा के मजबूत नेतृत्व में की गई थी। रॉकेट लॉन्चिंग के लिए थुंबा की लोकेशन को इसलिए चुना गया क्योंकि पृथ्वी की चुंबकीय भूमध्य रेखा इस खास जगह से होकर गुजरती है, जो वायुमंडल और आयनमंडल से जुड़े वैज्ञानिक रिसर्च के लिए इसे सबसे सही जगह बनाती है। उस शुरुआती दौर में इस इलाके की इकलौती बड़ी इमारत सेंट मैरी मैग्डलीन चर्च हुआ करती थी, जिसे स्थानीय मछुआरा समुदाय ने बड़े दिल से देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए सौंप दिया था। भारतीय वैज्ञानिकों ने शुरुआत में इसी चर्च के परिसर का इस्तेमाल अपने दफ्तर और लैब के रूप में किया था, और आज यही ऐतिहासिक जगह एक म्यूजियम बन चुकी है जहां भारत के अंतरिक्ष सफर की पूरी कहानी को संजोकर रखा गया है।
पहला साउंडिंग रॉकेट और आज की गतिविधियां
भारत के अंतरिक्ष इतिहास में 21 नवंबर 1963 का दिन एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है, जब थुंबा की धरती से देश का पहला साउंडिंग रॉकेट नाइक-अपाचे (Nike-Apache) अंतरिक्ष की तरफ सफलतापूर्वक छोड़ा गया था। थुंबा से आज भी लगातार नियमित रूप से साउंडिंग रॉकेटों का प्रक्षेपण और अन्य वैज्ञानिक परीक्षण किए जाते हैं। इसके साथ ही इसरो के तमाम वैज्ञानिक भविष्य के कई चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण स्पेस मिशनों की तैयारियों में दिन-रात जुटे हुए हैं, जिससे देश की अंतरिक्ष ताकत लगातार मजबूत हो रही है।



















