पाचन स्वास्थ्य से जुड़े वैश्विक बाजार के वर्ष 2029 तक लगभग $106 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसे देखते हुए टेक कंपनियां अब रोज़मर्रा की टॉयलेट आदतों पर नज़र रखने वाले उपकरण बना रही हैं। स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ऐसे कैमरे पेश कर रही हैं जो मल की जांच करके शरीर में पानी की मात्रा, पाचन क्रिया और भोजन के असर की व्यक्तिगत रिपोर्ट देते हैं। ये उपकरण टॉयलेट के रिम पर सीधे फिट हो जाते हैं और मल-मूत्र का विश्लेषण करके उपयोगकर्ताओं को लंबी अवधि के स्वास्थ्य पैटर्न समझने तथा संभावित समस्याओं की समय रहते पहचान करने में मदद करते हैं। हालांकि, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट इस बात पर संदेह जता रहे हैं कि क्या आम उपभोक्ताओं के लिए ये टॉयलेट स्कैनर वाकई चिकित्सकीय रूप से उपयोगी हैं। वहीं, प्राइवेसी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि संवेदनशील जैविक डेटा को वाणिज्यिक क्लाउड प्लेटफॉर्म पर जमा करने से गंभीर प्राइवेसी जोखिम और लंबे समय तक वित्तीय सब्सक्रिप्शन का बोझ बढ़ सकता है।
स्मार्ट टॉयलेट की बनावट और काम करने की तकनीक
AI आधारित टॉयलेट निगरानी के इस बाजार में सेनेटरी उपकरण बनाने वाली जानी-मानी कंपनी की शाखा कोहलर हेल्थ और बायोटेक्नोलॉजी स्टार्टअप थ्रोन प्रमुख रूप से सामने आई हैं। कोहलर कंपनी से जुड़ी कोहलर हेल्थ अपने ट्रैकिंग डिवाइस को $449 में बेच रही है, जिसके साथ $130 का सालाना फैमिली मेंबरशिप शुल्क अनिवार्य है। दूसरी ओर, जुलाई में $10 मिलियन की फंडिंग जुटाने वाला स्टार्टअप थ्रोन अपने उपकरण को $399 में बेच रहा है और इसके साथ $70 का सालाना सब्सक्रिप्शन शुल्क ले रहा है। दोनों कंपनियों के उपकरण सफेद रंग के स्लीक डिजाइन वाले इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल हैं, जिन्हें टॉयलेट बाउल के अंदरूनी किनारे पर आसानी से लगाया जा सकता है।
इन दोनों उपकरणों में नीचे की तरफ मुंह किए हुए ऑप्टिकल कैमरे लगे होते हैं। कोहलर हेल्थ और थ्रोन दोनों कंपनियों का कहना है कि उपकरणों की बनावट इस तरह रखी गई है कि कैमरे ऊपर की ओर नहीं घूम सकते और न ही टॉयलेट बाउल के बाहर की कोई तस्वीर ले सकते हैं। जब कोई व्यक्ति टॉयलेट पर बैठता है, तो उसमें लगे लाइट सेंसर खुद-ब-खुद सक्रिय होकर वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू कर देते हैं। इस विजुअल डेटा को तुरंत मशीन लर्निंग एल्गोरिदम में भेजा जाता है, जो मल के रंग, बनावट, मूत्र के गाढ़ेपन और मात्रा जैसे मानकों का आकलन करता है। टॉयलेट इस्तेमाल करने के कुछ ही मिनटों बाद, उपयोगकर्ता के मोबाइल ऐप पर एक विस्तृत डिजिटल रिपोर्ट कार्ड आ जाता है, जिसमें AI की मदद से तैयार हाइड्रेशन स्तर और पाचन स्कोर दर्शाया जाता है।
इन उपकरणों को बनाने वाले संस्थापकों का जोर इस बात पर है कि उनके स्वचालित टॉयलेट स्कैनर बाजार में मिलने वाली पारंपरिक होम गट माइक्रोबायोम किट से बिल्कुल अलग हैं। पारंपरिक किट में उपयोगकर्ताओं को मल का नमूना लैब में डाक से भेजना पड़ता है, जिसके बारे में दावे किए जाते हैं कि वे भोजन की संवेदनशीलता और डाइट प्लान की जानकारी देंगे। हालांकि, चिकित्सा शोधकर्ताओं ने हमेशा ऐसी किट के वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी पर सवाल उठाए हैं। किसी व्यक्ति का पेट स्वस्थ है या नहीं, इसका सीधा फैसला सुनाने के बजाय ये AI टॉयलेट स्कैनर लंबी अवधि में व्यक्ति के सामान्य पाचन तंत्र का एक व्यक्तिगत आधार तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
डॉक्टरों का संदेह और व्यावहारिक उपयोग की बहस
इतनी आधुनिक तकनीक के बावजूद, पेट के रोगों के विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या आम लोगों के लिए रोज टॉयलेट की AI निगरानी करना जरूरी या फायदेमंद है। न्यू यॉर्क में कार्यरत गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट और अमेरिकन गैस्ट्रोएंट्रोलजिकल एसोसिएशन के प्रवक्ता डैनियल फ्रीडबर्ग का कहना है कि जिन स्वस्थ लोगों का पेट नियमित रूप से साफ होता है, उनके लिए इस तरह के कैमरों की उपयोगिता बेहद सीमित है। डैनियल फ्रीडबर्ग के अनुसार, जब इंसान खुद अपने मल को देखकर सामान्य बदलाव समझ सकता है, तो टॉयलेट में कैमरे लगाना एक तरह से बहुत ज्यादा और अनावश्यक कदम लगता है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अभी तक सामान्य पाचन जांच के मामले में कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी वैज्ञानिक बदलाव प्रस्तुत नहीं किया है।
डॉक्टरों के इन संशयों के जवाब में कोहलर हेल्थ की मैनेजिंग डायरेक्टर नोरा टोफॉफ का तर्क है कि हर व्यक्ति का पाचन पैटर्न एक-दूसरे से काफी अलग होता है। वह कहती हैं कि स्वचालित ट्रैकिंग का असली फायदा लंबी अवधि के डेटा संग्रह में है, जिससे लोग उन खास वजहों की पहचान कर सकते हैं जो उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, लगातार रिकॉर्ड रखने से उपयोगकर्ताओं को यह पता चल सकता है कि वे सप्ताहांत पर पानी कम पीते हैं, या फिर कोई खास भोजन या दवा उनके पेट को खराब करती है। नोरा टोफॉफ का मानना है कि यह बारीक और दीर्घकालिक डेटा लोगों को अपनी जीवनशैली में समय रहते सुधार करने का अवसर देता है।
वहीं, थ्रोन के सह-संस्थापक और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर स्कॉट हिकल का कहना है कि यह तकनीक पेट की गंभीर और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए बेहद उपयोगी है। इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज या पुरानी पाचन समस्याओं से पीड़ित मरीजों को डॉक्टर अक्सर रोजाना मल का रिकॉर्ड रखने की सलाह देते हैं। हालांकि, मरीज आमतौर पर इस निर्देश का पालन नहीं करते क्योंकि कोई भी व्यक्ति रोज मल के बारे में नोट्स लिखना पसंद नहीं करता। स्कॉट हिकल बताते हैं कि हाथ से डायरी लिखने की जगह ऑटोमेटेड कंप्यूटर विजन तकनीक लाने से मरीजों की हिचकिचाहट खत्म होती है और डॉक्टरों को बिना किसी बाधा के लगातार सटीक डेटा मिल जाता है।
कैंसर की शुरुआती पहचान और खून के निशानों की जांच
रोजमर्रा के पाचन के अलावा, ये कंपनियां टॉयलेट स्कैनर को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआती चेतावनी देने वाले साधन के रूप में विकसित कर रही हैं। पिछले दशक में 50 वर्ष से कम उम्र के वयस्कों में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले तेजी से बढ़े हैं, और अब यह इस उम्र वर्ग में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। चिकित्सा विशेषज्ञों को संदेह है कि भोजन में माइक्रोप्लास्टिक, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक इस्तेमाल इसके मुख्य कारण हो सकते हैं, हालांकि सटीक कारणों की जांच अभी जारी है। वर्तमान में कोलन कैंसर की जांच के लिए मुख्य रूप से कोलोनोस्कोपी या लैब में मल की जांच की जाती है।
थ्रोन कंपनी अपने अगले मॉडल में और अधिक उन्नत जांच सुविधाएं जोड़ने की योजना बना रही है। स्कॉट हिकल ने बताया कि उनकी कंपनी एक नए उपकरण पर काम कर रही है जो मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक का उपयोग करके मल में मौजूद खून के सूक्ष्म निशानों की पहचान इंसानी आंखों की तुलना में कहीं अधिक बारीकी से कर सकेगा। शुरुआती प्रोटोटाइप परीक्षणों के परिणाम उम्मीद जगाने वाले रहे हैं और कंपनी अगले दो वर्षों के भीतर इसे बाजार में उतारने की तैयारी कर रही है। यद्यपि इस नए मॉडल की कीमत अभी तय नहीं हुई है, स्कॉट हिकल का कहना है कि उनका लक्ष्य इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टॉयलेट स्कैनर की इमेजिंग तकनीक लैब टेस्ट जितनी सटीक होगी या नहीं, लेकिन स्कॉट हिकल का कहना है कि हफ्तों या महीनों तक खून के निशानों का रिकॉर्ड मिलने से मरीज समय रहते डॉक्टर के पास जा सकेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि थ्रोन बीमारी का इलाज या आधिकारिक निदान करने का दावा नहीं करता, बल्कि यह केवल चेतावनी देने वाला एक साधन है।
दूसरी ओर, कोहलर हेल्थ का कहना है कि उसका मौजूदा टॉयलेट स्कैनर पहले से ही बाउल में खून के निशान मिलने पर उपयोगकर्ता को अलर्ट भेजने में सक्षम है। यद्यपि मल में खून का आना कई बार बवासीर या पीरियड्स जैसी सामान्य वजहों से हो सकता है, लेकिन यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। नोरा टोफॉफ जोर देकर कहती हैं कि उनकी कंपनी का मुख्य उद्देश्य लोगों की मदद करना और समय पर चेतावनी देकर उनकी जान बचाना है।
इसके बावजूद, चिकित्सा विशेषज्ञ इन स्मार्ट टॉयलेट को कैंसर स्क्रीनिंग के व्यापक साधन के रूप में देखने से मना करते हैं। कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ रोम में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर जियानलुका इयानिरो का कहना है कि किसी भी बीमारी की शुरुआती जांच के लिए उपकरण का गैर-आक्रामक होने के साथ-साथ सस्ता होना भी बेहद जरूरी है। वर्तमान स्मार्ट टॉयलेट कैमरों की महंगी कीमत और सालाना सब्सक्रिप्शन शुल्क को देखते हुए जियानलुका इयानिरो का मानना है कि यह तकनीक आम जनता के लिए कैंसर स्क्रीनिंग का किफायती जरिया नहीं बन सकती।
डेटा प्राइवेसी के खतरे, लोकेशन ट्रैकिंग और सब्सक्रिप्शन मॉडल
घर के निजी बाथरूम में इंटरनेट से जुड़े कैमरे लगाने की इस तकनीक ने प्राइवेसी और डिजिटल अधिकारों के विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। मोज़िला फाउंडेशन में डिजिटल अधिकार विशेषज्ञ लॉरेन हेन्ड्रिक्स पार्सन्स ने उपभोक्ताओं को अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य जानकारी निजी कंपनियों को देने से पहले इसके परिणामों पर विचार करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि जो लोग अपने ही स्वास्थ्य डेटा को देखने के लिए बार-बार सब्सक्रिप्शन शुल्क देते हैं, वे समय के साथ कंपनियों के इकोसिस्टम में उलझकर रह जाते हैं। जब किसी ऐप में कई सालों का स्वास्थ्य डेटा जमा हो जाता है, तो उपयोगकर्ता के लिए उस सेवा को छोड़ना मुश्किल हो जाता है और उसे मजबूरन सब्सक्रिप्शन जारी रखना पड़ता है।
इन स्मार्ट टॉयलेट ऐप द्वारा एकत्र किया जाने वाला डेटा केवल मल की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। टॉयलेट बाउल की तस्वीरों, भोजन, लक्षणों और दवाओं की जानकारी के अलावा कोहलर हेल्थ और थ्रोन उपयोगकर्ताओं के नाम, ईमेल और जनसांख्यिकीय डेटा भी एकत्र करती हैं। विशेष रूप से, कोहलर हेल्थ की प्राइवेसी नीति यह दर्शाती है कि वह उपयोगकर्ता की सटीक भौगोलिक लोकेशन भी ट्रैक करती है, जबकि थ्रोन लोकेशन डेटा एकत्र नहीं करती। दोनों कंपनियों का दावा है कि वे विज्ञापनों के लिए स्वास्थ्य डेटा तीसरे पक्षों से साझा नहीं करती हैं।
हालांकि, प्राइवेसी नीतियों में कई ऐसे अपवाद शामिल हैं जहां डेटा बाहरी संस्थाओं को दिया जा सकता है। कानूनी मांग आने पर पुलिस या जांच एजेंसियों को डेटा सौंपा जा सकता है, कंपनी के बिकने या विलय होने की स्थिति में नई कंपनी को डेटा दिया जा सकता है, और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर, कस्टमर केयर या यूजर एंगेजमेंट संभालने वाली बाहरी कंपनियों को भी डेटा भेजा जा सकता है। नोरा टोफॉफ का कहना है कि कोहलर हेल्थ उपयोगकर्ता डेटा बेचने की योजना नहीं बनाती है, जबकि स्कॉट हिकल का कहना है कि थ्रोन बिना अनुमति के कभी डेटा नहीं बेचेगी। स्कॉट हिकल ने यह भी जोड़ा कि थ्रोन उपयोगकर्ताओं को यूनिवर्सिटी रिसर्च के लिए गुमनाम डेटा साझा करने का विकल्प देगी, और मना करने पर भी ऐप की सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
डिजिटल अधिकार विशेषज्ञ मानते हैं कि उपभोक्ताओं को तकनीक के फायदों और प्राइवेसी के नुकसान के बीच संतुलन बनाना होगा। लॉरेन हेन्ड्रिक्स पार्सन्स का कहना है कि क्रोन बीमारी जैसे गंभीर पेट के रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए यह स्वचालित निगरानी जीवन को आसान बनाने वाला उपकरण हो सकती है। लेकिन केवल यह देखने के लिए कि घर में बना पेय उनके पेट पर क्या असर डालता है, आम लोगों द्वारा इतनी महंगी कीमत चुकाना और प्राइवेसी को दांव पर लगाना बुद्धिमानी नहीं होगी।



















