भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो अपना अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 अंतरिक्ष में भेजने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस अंतरिक्ष मिशन को अंजाम देने के लिए जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह महत्वपूर्ण उड़ान आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से 4 सितंबर को रात 2:55 बजे तय समय पर भरी जाएगी। इस लॉन्चिंग प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए 27 घंटे का लंबा काउंटडाउन पहले ही शुरू किया जा चुका है, जिस पर देश भर के वैज्ञानिकों की नजरें टिकी हुई हैं।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में पहली बार स्थापित होगा इमेजिंग सैटेलाइट
यह अंतरिक्ष मिशन भारत के वैज्ञानिक इतिहास में बेहद खास स्थान रखता है क्योंकि ईओएस-05 जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित होने वाला देश का पहला एडवांस्ड इमेजिंग सैटेलाइट बनने जा रहा है। इसरो के इस विशालकाय और 51.7 मीटर ऊंचे रॉकेट पर सबकी निगाहें जमी हैं, जिसे अंतरिक्ष समुदाय और वैज्ञानिक प्यार से नॉटी बॉय के नाम से पुकारते हैं। पिछले कुछ समय में मिलेजुले परिणामों और पिछली कुछ उड़ानों में आई असफलताओं के बाद अंतरिक्ष एजेंसी इस बड़े लॉन्च के जरिए एक मजबूत और शानदार वापसी की उम्मीद कर रही है। अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह सैटेलाइट देश के आपदा प्रबंधन तंत्र और मौसम के पूर्वानुमान को पूरी तरह बदलकर रख देगा।
क्यों खास है जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का चुनाव और इस सैटेलाइट की तकनीक
सामान्य तौर पर अंतरिक्ष में छोड़े जाने वाले सैटेलाइट लगातार पृथ्वी के चक्कर काटते रहते हैं, जिसकी वजह से वे किसी एक विशेष भूभाग पर लगातार अपनी आंखें नहीं टिका पाते। इसके विपरीत जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि इसमें स्थापित होने वाला अंतरिक्ष यान पृथ्वी के एक बहुत बड़े हिस्से पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखता है। ईओएस-05 बिल्कुल इसी उन्नत तकनीक के आधार पर काम करेगा और लगातार भारत तथा इसके आसपास के पड़ोसी क्षेत्रों की हर गतिविधि पर नजर रखेगा। इससे मौसम में होने वाले अचानक बदलावों और कृषि क्षेत्र से जुड़ी बेहद सटीक तथा उपयोगी जानकारियां समय पर मिल सकेंगी।
रॉकेट के नॉटी बॉय नाम के पीछे का दिलचस्प इतिहास
इसरो के इस भरोसेमंद रॉकेट जीएसएलवी को नॉटी बॉय कहे जाने के पीछे इसका पिछला थोड़ा संघर्षपूर्ण रिकॉर्ड रहा है। शुरुआती दौर की उड़ानों में इस रॉकेट को कई मौकों पर तकनीकी बाधाओं और असफलताओं का सामना करना पड़ा था, जिसके चलते इसके शुरुआती अठारह मिशनों में से छह पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए थे। हालांकि समय के साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने इसकी तकनीक में अभूतपूर्व सुधार किए हैं और इसकी कार्यप्रणाली को बेहद भरोसेमंद बनाया है। इस बार यह शक्तिशाली रॉकेट करीब 2367 किलोग्राम वजनी भारी-भरकम सैटेलाइट को अंतरिक्ष में उसकी निर्धारित कक्षा तक सफलतापर्वक पहुँचाने का जिम्मा संभाल रहा है। इस लॉन्च से जुड़ा लाइव प्रसारण इसरो के आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर देखा जा सकता है, जबकि अधिक विवरण इसरो की वेबसाइट पर उपलब्ध कराए गए हैं।
आपदा प्रबंधन और अंतरिक्ष निगरानी में कैसे साबित होगा गेम चेंजर
यह अत्याधुनिक सैटेलाइट बिना किसी देरी के रियल टाइम डेटा भेजने की असाधारण क्षमता रखता है, जो आपातकालीन परिस्थितियों में जीवन बचाने का काम करेगा। इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ बीआर गुरुप्रसाद ने इस मिशन की विशाल महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह सैटेलाइट लगभग 30 हजार किलोमीटर की अत्यधिक ऊंचाई से हमारी धरती की निरंतर पहरेदारी करेगा। इतनी ऊंचाई से निगरानी होने के कारण देश में किसी भी संभावित बाढ़, चक्रवाती तूफान या अन्य प्राकृतिक आपदाओं की चेतावनी बहुत पहले ही मिल जाएगी, जिससे जानमाल के नुकसान को न्यूनतम करने में भारी मदद मिलेगी।
चुनौतियों से पार पाकर खोई हुई लय वापस पाने की कोशिश
हाल के महीनों में अंतरिक्ष एजेंसी के सामने कुछ तकनीकी और ऑपरेशनल मुश्किलें खड़ी हुई थीं, जिसके कारण यह मिशन इसरो के लिए अपनी साख को और मजबूत करने का एक बड़ा अवसर बन गया है। इस साल जनवरी के महीने में एक पीएसएलवी मिशन अपने निर्धारित सैटेलाइट को उसकी सही कक्षा में स्थापित करने से चूक गया था, और उससे पहले भी कुछ मिशन मोटर प्रेशर में अचानक आई गिरावट के कारण अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाए थे। अब इसरो अपने इसी नॉटी बॉय रॉकेट के कंधों पर सवार होकर अंतरिक्ष जगत में अपनी पुरानी और निर्विवाद लय को पूरी ताकत के साथ वापस हासिल करना चाहता है।
सत्रह मंजिला ऊंचे इस विशाल रॉकेट की बेजोड़ तकनीकी ताकत
यह सत्रह मंजिला इमारत जितना ऊंचा रॉकेट जीएसएलवी-एफ17 वर्तमान में भारत का सबसे ऊंचा और सबसे शक्तिशाली लॉन्च वाहन माना जाता है। इसके निर्माण में सॉलिड, लिक्विड और जटिल क्रायोजेनिक प्रोपल्शन प्रणालियों का बेहद सटीक संयोजन किया गया है, जिसे हमारे वैज्ञानिकों ने दशकों के कड़े अनुसंधान और अंतरिक्ष विज्ञान के अनुभव के बाद विकसित किया है। अपनी इस उड़ान के दौरान यह रॉकेट सबसे पहले सैटेलाइट को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट तक पहुंचाएगा, जिसके बाद यह अंतरिक्ष यान अपनी स्वदेशी प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करके खुद अपनी अंतिम और स्थाई कक्षा में स्थापित हो जाएगा।



















