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चातुर्मास में रुद्रदेव संभालेंगे ब्रह्मांड की बागडोर, 29 जुलाई को शिव शयनोत्सव से शुरू होगा विशेष प्रशासनिक कालअध्यात्म
28 जुल॰ 2026, 12:42 pm (15 दिन पहले)· 0

चातुर्मास में रुद्रदेव संभालेंगे ब्रह्मांड की बागडोर, 29 जुलाई को शिव शयनोत्सव से शुरू होगा विशेष प्रशासनिक काल

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के साथ ही शिव शयनोत्सव मनाया जाएगा। देवशयनी एकादशी के बाद महादेव के समाधिस्थ होने पर रुद्रदेव राष्ट्रपति शासन की तरह सृष्टि का संचालन करेंगे।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पावन मानी जाती है। यह दिन केवल गुरु पूर्णिमा और व्यास पूजा के पावन अवसर के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसका एक विशेष धार्मिक महत्व शिव शयनोत्सव से भी जुड़ा है। इस वर्ष 29 जुलाई, दिन बुधवार को शिव शयनोत्सव का पर्व संपूर्ण विधि-विधान के साथ मनाया जाएगा। सनातन मान्यताओं के अनुसार, जहां देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, वहीं आषाढ़ पूर्णिमा से महादेव भी समाधि स्वरूप विश्राम में प्रवेश करते हैं। इस कालावधि में सृष्टि के संचालन और संरक्षण का संपूर्ण दायित्व भगवान शिव के रौद्र एवं जागृत स्वरूप रुद्रदेव के हाथों में आ जाता है।

चातुर्मास में रुद्रदेव का शासन और राष्ट्रपति शासन की उपमा

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शिव शयनोत्सव के साथ ही चातुर्मास के दौरान रुद्रदेव का प्रशासनिक काल आरंभ हो जाता है, जो कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक निरंतर चलता है। देवउठनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं, तब सृष्टि के पालन और संचालन का भार पुनः श्रीहरि विष्णु को सौंप दिया जाता है। इस मध्यवर्ती अवधि में रुद्रदेव संपूर्ण ब्रह्मांड के कर्ता और भर्ता के रूप में शासन करते हैं। धर्मशास्त्रियों के अनुसार रुद्रदेव का यह शासनकाल ठीक उसी प्रकार होता है जैसे प्रशासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है।

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इस अवधि की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि रुद्रदेव की दृष्टि सूक्ष्म से सूक्ष्म और विशाल से विशाल हर वस्तु एवं कार्य पर बनी रहती है। उनका न्याय त्वरित होता है और वे कर्मों का फल भी तत्काल प्रदान करते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास के दौरान शास्त्रों में बताए गए नियमों, संयम और अनुशासन का कठोरता से पालन करने की सलाह दी जाती है। इस दौरान रुद्रदेव की नियमित आराधना और उपासना करने से साधकों के ग्रह-नक्षत्रों के दोष दूर होते हैं तथा जीवन की विभिन्न बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

मंदिरों में विशेष पूजन, रुद्राभिषेक और शयन आरती

शिव शयनोत्सव के पावन अवसर पर देशभर के प्रमुख शैव मठों और प्राचीन शिव मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इस दिन भगवान शिव की प्रतिमा अथवा शिवलिंग का विधि-विधान से महाभिषेक और रुद्राभिषेक संपन्न किया जाता है। इसके पश्चात देवाधिदेव महादेव का अलौकिक श्रृंगार कर शयन आरती की जाती है और रात्रि भर भजन-कीर्तन के आयोजन होते हैं।

श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए चंदन, भांग, धतूरा, बेलपत्र, सुगंधित पुष्प और ताजे फल अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन पवित्र सामग्रियों से शिव की आराधना करने पर परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है। शैव परंपरा में यह दृढ़ विश्वास है कि यद्यपि शिव शयनोत्सव के बाद महादेव समाधिस्थ रहते हैं, परंतु उनका जागृत रुद्र रूप पूरी मुस्तैदी से धर्म की रक्षा और दुष्ट शक्तियों के निवारण में तत्पर रहता है।

वेदों और पुराणों में रुद्रदेव का महिमामंडन

वैदिक साहित्य और पौराणिक आख्यानों में रुद्रदेव की महिमा का विशद वर्णन देखने को मिलता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा विभिन्न पुराणों में रुद्र को परम शक्तिशाली और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र माना गया है। ऋग्वेद की ऋचाओं में रुद्रदेव की स्तुति करते हुए उन्हें बलवानों में सबसे अधिक बलशाली कहा गया है। इसके अतिरिक्त, ऋग्वेद में रुद्र को अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी, समस्त रोगों का विनाश करने वाले, औषधियों के स्वामी तथा संसार के सभी प्राणियों के रक्षक के रूप में चित्रित किया गया है। ऋग्वेद के मंत्रों में उनसे यह प्रार्थना की जाती है कि वे अपने उग्र रूप को शांत कर अपने भक्तों पर दया करें और उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा सुख प्रदान करें।

यजुर्वेद के सुप्रसिद्ध अध्याय श्रीरुद्रम (जिसे नमकम-चमकम भी कहा जाता है) में रुद्र को संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त सर्वव्यापी शक्ति के रूप में दर्शाया गया है। श्रीरुद्रम के अनुसार, रुद्र पर्वतों, नदियों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों, दसों दिशाओं और प्रत्येक जीवित प्राणी में अंतर्निहित हैं। वे जहां एक ओर अधर्म का संहार करने वाले उग्र देव हैं, वहीं दूसरी ओर अत्यंत कल्याणकारी और मंगलकारी भी हैं, इसी कारण उन्हें शिव नाम से संबोधित किया जाता है।

पुराणों में एकादश रुद्र और गुरु पूर्णिमा का संगम

शिव पुराण, लिंग पुराण, वायु पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्रमुख ग्रंथों में रुद्र को भगवान शिव का धर्मरक्षक स्वरूप माना गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर अधर्म का प्रभाव बढ़ता है और आसुरी शक्तियां जनमानस को प्रताड़ित करने लगती हैं, तब रुद्रदेव लोककल्याण, धर्म की पुनर्स्थापना और दुष्टों के संहार के लिए सक्रिय भूमिका निभाते हैं। पुराणों में एकादश रुद्रों का भी विस्तृत विवरण प्राप्त होता है, जो भगवान शिव की ग्यारह भिन्न-भिन्न शक्तियों और सामर्थ्य के प्रतीक माने जाते हैं।

धर्माचार्यों के अनुसार, गुरु पूर्णिमा और शिव शयनोत्सव का यह दुर्लभ योग ज्ञान, भक्ति, तपस्या और साधना का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। इस पावन तिथि पर भगवान शिव की विशेष पूजा, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, रुद्राभिषेक, गुरु पूजन तथा अपनी सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य करने से साधक को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इसके प्रभाव से मानसिक शांति मिलती है और भगवान शिव का अक्षय आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सवाल-जवाब

वर्ष 2026 में शिव शयनोत्सव कब है?
वर्ष 2026 में शिव शयनोत्सव 29 जुलाई, दिन बुधवार को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि यानी गुरु पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा।
शिव शयनोत्सव के दौरान सृष्टि का संचालन कौन करता है?
शिव शयनोत्सव पर महादेव के समाधिस्थ होने के बाद चातुर्मास में भगवान शिव के उग्र व जागृत रूप 'रुद्रदेव' सृष्टि के संरक्षण और संचालन का दायित्व संभालते हैं।
रुद्रदेव के शासन की तुलना किससे की गई है?
धार्मिक ग्रंथों में चातुर्मास के दौरान रुद्रदेव के शासन की तुलना 'राष्ट्रपति शासन' से की गई है, क्योंकि वे हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर बारीक नजर रखते हैं और तुरंत फल प्रदान करते हैं।
वेदों में रुद्रदेव का क्या स्वरूप बताया गया है?
ऋग्वेद में रुद्रदेव को बलवानों में सबसे बलवान, रोगों का नाश करने वाले और औषधियों के स्वामी के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि यजुर्वेद के श्रीरुद्रम में उन्हें सर्वव्यापी माना गया है।
शिव शयनोत्सव पर कौन-कौन से अनुष्ठान करने चाहिए?
इस दिन रुद्राभिषेक करना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना, भगवान शिव को चंदन, भांग, बेलपत्र व धतूरा अर्पित करना और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।
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