जमशेदपुर के निकट स्थित दलमा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी अपनी समृद्ध जैव विविधता और अनूठे प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है। हाल ही में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि यह संरक्षित वन क्षेत्र निशाचर पक्षियों, विशेषकर उल्लुओं की विभिन्न प्रजातियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल बन चुका है। लगभग 193 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैले इस अभयारण्य में साल और मिश्रित पर्णपाती जंगलों का घना आवरण, प्राकृतिक जलस्रोत और विविध प्रकार के पेड़-पौधे मौजूद हैं। दलमा में किए गए पक्षी सर्वेक्षणों में कुल 205 पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई है, जिनमें उल्लुओं की 7 प्रमुख प्रजातियां शामिल हैं।
झारखंड में पहली बार मिला ब्राउन वुड आउल का पुष्ट प्रमाण
दलमा में दर्ज की गई उल्लुओं की सात प्रजातियों में से 'ब्राउन वुड आउल' की मौजूदगी सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वर्ष 2026 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में इस प्रजाति का फोटोग्राफिक और जैव-ध्वनिक (बायो-एकौस्टिक) साक्ष्यों के साथ दस्तावेजीकरण किया गया। झारखंड राज्य में इस प्रजाति की उपस्थिति का यह पहला आधिकारिक और पुष्ट रिकॉर्ड है। इस खोज ने दलमा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी की पक्षी विविधता को वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर एक नया आयाम दिया है।
बड़े शिकारी और घने जंगलों के बाशिंदे
दलमा के जंगलों में पाया जाने वाला 'इंडियन ईगल-आउल' आकार में काफी बड़ा और शक्तिशाली शिकारी पक्षी है। पूर्व के पक्षी सर्वेक्षणों में भी इसे दलमा का एक स्थायी और सामान्य निवासी माना गया था। यह पक्षी मुख्य रूप से छोटे स्तनधारियों, अन्य पक्षियों और छोटे जीवों का शिकार करता है और जंगल के खाद्य चक्र को संतुलित बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
घने पेड़ों की शाखाओं के बीच रहने वाला 'ब्राउन बुबुक' रात में पूरी तरह सक्रिय रहता है। यह ऊंचे पेड़ों पर बैठकर छोटे पक्षियों, कीटों और अन्य जीवों पर नज़र रखता है और मौका मिलते ही उनका शिकार करता है। दलमा के पुराने पेड़, शांत परिवेश और विविधतापूर्ण माइक्रो-हैबिटैट इस तरह के दुर्लभ शिकारी पक्षियों के लिए आदर्श आवास प्रदान करते हैं।
प्राकृतिक कीट-नियंत्रक और छोटी उल्लू प्रजातियां
अपने दिल के आकार वाले चेहरे और सफेद रंग की बनावट के कारण 'बार्न आउल' को आसानी से पहचाना जा सकता है। यह मुख्य रूप से रात के समय शिकार पर निकलता है और चूहों तथा अन्य छोटे कृंतकों को अपना भोजन बनाता है। जंगल और आसपास के ग्रामीण इलाकों में चूहों की संख्या को नियंत्रित करने में यह पक्षी कुदरती मददगार साबित होता है।
'स्पॉटेड आउलेट' आकार में अपेक्षाकृत छोटा होता है और इसके शरीर पर सफेद रंग के धब्बे पाए जाते हैं। यह घने जंगलों के साथ-साथ पेड़ों वाले खुले इलाकों में भी आसानी से देखा जा सकता है। यह मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़ों और छोटे जीवों को खाता है, जिससे पता चलता है कि दलमा में कीटों और छोटे जीवों का पर्याप्त आधार उपलब्ध है।
'इंडियन स्कॉप्स-आउल' एक छोटा लेकिन बेहद निपुण शिकारी है जो दिन के समय घनी झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों के पीछे छिपा रहता है। रात होते ही यह कीड़े-मकोड़ों और छोटे जीवों का शिकार शुरू करता है। वन विभाग के अनुसार दलमा की घनी वनस्पति, लताएं और झाड़ियां इन पक्षियों को सुरक्षा और छिपने के बेहतरीन ठिकाने उपलब्ध कराती हैं।
कीटभक्षी पक्षियों की बहुलता और पारिस्थितिकी तंत्र
'जंगल आउलेट' भी घने जंगलों से जुड़ा एक छोटा उल्लू है जो कीड़े-मकोड़ों के अलावा छोटे पक्षियों का शिकार करता है। दलमा के आंतरिक जंगलों का स्वास्थ्य इस प्रजाति के जीवन के लिए अनुकूल है।
वर्ष 2025 में आयोजित वैज्ञानिक सर्वे के दौरान दलमा में कुल 205 पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई थीं। इनमें से 93 प्रजातियां कीटभक्षी (कीड़े खाने वाली) पाई गईं। कीटभक्षी पक्षियों की इतनी बड़ी संख्या इस बात का प्रमाण है कि दलमा के जंगल में भोजन की कोई कमी नहीं है और यहां का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद मजबूत है।
आमतौर पर दलमा को हाथियों और बड़े वन्यजीवों के संरक्षण क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन उल्लुओं की इतनी विविध प्रजातियों की मौजूदगी यह साबित करती है कि यह अभयारण्य रात में सक्रिय रहने वाले पक्षियों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पर्याप्त भोजन, घना जंगल, प्राकृतिक जलस्रोत और प्रदूषण मुक्त वातावरण दलमा को जैव विविधता का अनूठा केंद्र बनाते हैं।



















