उत्तराखंड की हसीन और शांत वादियों में प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कई अलौकिक धार्मिक स्थल मौजूद हैं। इन्हीं में से एक बेहद खास स्थान अल्मोड़ा जिले में शीतलाखेत के पास स्थित मां स्याही देवी मंदिर है। पहाड़ों की गोद में बसा यह प्राचीन शक्तिपीठ अपने शांत परिवेश और अनोखी लोककथाओं के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। इस पावन स्थल के बारे में प्रचलित मान्यताएं हर किसी को हैरान कर देती हैं। ऐतिहासिक संदर्भों के मुताबिक इस दिव्य मंदिर का निर्माण कत्युरी शासनकाल के दौरान हुआ था। इतिहासकार और स्थानीय विद्वान इसकी प्राचीनता का अनुमान 900 वर्ष से 1700 वर्ष के बीच लगाते हैं। अल्मोड़ा के राजवंशों में इस पीठ का बहुत ऊंचा स्थान रहा है और मां स्याही देवी को वहां के राजाओं की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता था।
रातों-रात हुए अद्भुत निर्माण और बेल-गुड़ के मसाले का रहस्य
इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथा यह है कि इसका पूरा ढांचा महज एक ही रात में बनकर तैयार हो गया था। स्थानीय बुजुर्गों और कथाओं के अनुसार, मंदिर निर्माण के लिए गांव के लोगों ने कच्ची ईंटें तैयार करके रखी थीं। संयोगवश उसी रात क्षेत्र में भीषण बारिश शुरू हो गई। अगले दिन सुबह जब ग्रामीण निर्माण स्थल पर पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर चकित रह गए। सभी ईंटें अपने आप पकी हुई अवस्था में मिलीं। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि पत्थरों और ईंटों को जोड़ने के लिए पारंपरिक चूने या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बजाय बेल के फल और गुड़ के विशेष मिश्रण का प्रयोग किया गया था। सदियों बीत जाने के बाद भी यह देसी मसाला मंदिर को मजबूती से जोड़े हुए है, जो कत्युरी काल के अनूठे स्थापत्य ज्ञान को दर्शाता है। कहा जाता है कि कत्युरी शासक महान शिल्पकार थे और वे अपने सभी निर्माण कार्य केवल रात के समय ही संपन्न करते थे।
नेपाल से आए पुजारियों का वंश और पुरानी पहाड़ी से स्थानांतरण
स्याही देवी मंदिर के वर्तमान स्थान पर स्थापित होने से पहले का इतिहास भी काफी रोचक है। मान्यताओं के अनुसार, माता की मूल मूर्ति वर्तमान मंदिर स्थल से लगभग आधा किलोमीटर दूर एक अन्य पहाड़ी की चोटी पर विराजमान थी। चूंकि अल्मोड़ा के कत्युरी राजा मां स्याही देवी को अपनी कुलदेवी मानते थे, इसलिए उन्होंने अपनी ईष्ट देवी के लिए अधिक भव्य और विशाल मंदिर बनवाने का निर्णय लिया। नया मंदिर पूर्ण होने के बाद वहां नियमित पूजा-अर्चना और देखभाल के लिए विशेष प्रबंध किए गए। राजाओं ने नेपाल से गुरु गोरखनाथ के वंशजों को यहां आमंत्रित किया और उन्हें मंदिर की सेवा का प्रभार सौंपा। आज भी उसी पौराणिक वंश के अनुयायी और वंशज मंदिर की सभी धार्मिक परंपराओं, नित्य पूजा और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी निष्ठा के साथ संभालते आ रहे हैं।
दिन में 3 बार रंग बदलती मूर्ति और 52 गांवों की आस्था
मां स्याही देवी मंदिर की सबसे विस्मयकारी और रहस्यमयी बात यहां स्थापित माता की प्रतिमा से जुड़ी है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु बताते हैं कि स्थापित मूर्ति का रंग और रूप दिन में तीन बार बदलता है। प्रात:काल, दोपहर और संध्या आरती के समय प्रतिमा का स्वरूप अलग-अलग आभा में नजर आता है। भक्त इसे माता की प्रत्यक्ष उपस्थिति और दिव्य सामर्थ्य का चमत्कार मानते हैं। आसपास के 52 गांवों में मां स्याही देवी को मुख्य इष्ट देवी का स्थान प्राप्त है। इसके अलावा उत्तराखंड के कई परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन्हें अपनी कुलदेवी मानकर पूजते हैं। लोक मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे हृदय से माता के दरबार में अपनी अर्जी लगाता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। इसी अटूट विश्वास के कारण वर्ष भर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां शीश नवाते आते हैं।
स्वामी विवेकानंद की साधना स्थली और तीर्थयात्रियों की अटूट श्रद्धा
धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह स्थान महान आध्यात्मिक विभूतियों की साधना स्थली भी रहा है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 1898 में स्वामी विवेकानंद ने उत्तराखंड भ्रमण के दौरान इस पवित्र पहाड़ी पर समय बिताया था। उन्होंने मंदिर परिसर के शांत वातावरण में गहन ध्यान और साधना की थी। स्वामी विवेकानंद के आगमन और तपस्या के बाद से इस स्थल का आध्यात्मिक प्रभाव और अधिक बढ़ गया। आज यह शक्तिपीठ न केवल आम भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि अनेक साधुओं, संतों और योगियों की ध्यान साधना के लिए भी एक प्रमुख तपोभूमि माना जाता है।



















