राजस्थान के बीकानेर शहर की रहने वाली एक साधारण परिवार की लड़की रेशमा ने अपनी अद्भुत खेल प्रतिभा के दम पर खेल जगत में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है। आर्थिक रूप से कमजोर और सीमित संसाधनों वाले परिवार से आने वाली रेशमा ने सभी तरह की बाधाओं को पार करते हुए बास्केटबॉल कोर्ट पर अपनी कौशल क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया है। हाल ही में सीकर जिले में आयोजित की गई जूनियर स्टेट बास्केटबॉल प्रतियोगिता में इस युवा खिलाड़ी ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया है। इस बड़ी और ऐतिहासिक सफलता को हासिल करने के बाद अब उनके हौसले सातवें आसमान पर हैं। उनका अगला लक्ष्य देश के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेना और वहां मेडल जीतकर अपने माता-पिता, अपने गृह जिले बीकानेर और पूरे राजस्थान राज्य का नाम देश के खेल मानचित्र पर चमकाना है।
अभावों के बीच सफलता की अनोखी इबारत
रेशमा की यह असाधारण सफलता इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अगर किसी खिलाड़ी में कुछ करने का पक्का इरादा हो और उसे सही समय पर सही रास्ता दिखाने वाला कोच मिल जाए, तो आर्थिक तंगी भी उसके सपनों को रोकने की ताकत नहीं रखती। रेशमा का परिवार बेहद कमजोर वित्तीय पृष्ठभूमि से आता है। उनके पिता मोहम्मद सलीम सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करते हैं और घर-घर जाकर अखबार बांटने का काम करते हैं, जिससे उनके पूरे परिवार का जीवनयापन होता है। इतनी विषम परिस्थितियों के बावजूद रेशमा ने कभी भी अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उन्होंने अपनी लगन, अटूट मेहनत और अपने खेल प्रशिक्षक के बेहतरीन मार्गदर्शन की बदौलत अपनी खेल यात्रा को इस मुकाम तक पहुंचाया है। स्टेट स्तर पर पदक जीतकर अपनी ताकत का अहसास कराने वाली रेशमा की निगाहें अब पूरी तरह से आने वाली नेशनल चैंपियनशिप पर टिकी हुई हैं। उन्हें खुद पर और अपने कोच के प्रशिक्षण पर पूरा भरोसा है कि वह नियमित अभ्यास और कड़े अनुशासन के दम पर देश के स्तर पर भी पदक जीतने का अपना यह बड़ा सपना जरूर सच करेंगी।
महारानी स्कूल के बास्केटबॉल मैदान से शुरू हुआ सफर
अपनी खेल यात्रा की शुरुआत के पन्नों को पलटते हुए रेशमा ने बताया कि उनके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्होंने बीकानेर के विख्यात महारानी स्कूल में दाखिला लिया। उस समय उनके लिए स्कूल का पूरा माहौल और वहां की गतिविधियां बिल्कुल नई और अलग थीं। स्कूल के भीतर बना हुआ शानदार बास्केटबॉल कोर्ट और वहां अन्य खिलाड़ियों को अभ्यास करते देखना उनके लिए एक बेहद रोमांचक अनुभव था। वहां की उच्च स्तरीय कोचिंग सुविधाओं और खेल के प्रति सकारात्मक माहौल ने रेशमा को इस खेल की ओर बहुत गहराई से आकर्षित किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और बास्केटबॉल को ही अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया। उन्होंने रोजाना बिना थके कड़ा अभ्यास करना शुरू किया। स्कूल में नियमित प्रशिक्षण और अनुभवी खेल गुरुओं के दैनिक मार्गदर्शन ने उनके खेल कौशल को दिन-ब-दिन निखारने का काम किया। रेशमा मानती हैं कि स्कूल परिसर में खेल को लेकर मिलने वाला सकारात्मक वातावरण और उनके प्रशिक्षकों का निरंतर मिला प्रोत्साहन ही आज उनकी खेल यात्रा की सबसे मजबूत बुनियाद बन चुका है।
जब खेल के खिलाफ था परिवार, तब कोच बने मददगार
हालांकि, रेशमा के लिए खेल के इस मैदान तक पहुंचने का रास्ता बिल्कुल भी आसान और सुगम नहीं था। शुरुआत में उनके सामने पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर बड़ी चुनौतियां थीं। उनके परिवार में पहले कभी खेलकूद को लेकर कोई विशेष माहौल या जागरूकता नहीं रही थी। इसी वजह से शुरुआत के दिनों में परिवार के सदस्य उन्हें घर से बाहर जाकर इस तरह का खेल खेलने की अनुमति देने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। ऐसे नाजुक और मुश्किल दौर में उनके खेल कोच नरेंद्र कसवा उनके लिए एक बड़े मददगार बनकर सामने आए। कोच नरेंद्र कसवा ने खुद आगे बढ़कर रेशमा के माता-पिता से मुलाकात की। उन्होंने परिवार के साथ लंबी बातचीत की और उन्हें आधुनिक समय में खेलों के महत्व तथा लड़कियों के लिए इसमें मौजूद अवसरों के बारे में विस्तार से समझाया। इसके साथ ही उन्होंने माता-पिता को रेशमा के भीतर छुपी बास्केटबॉल की असाधारण प्रतिभा के बारे में भी आश्वस्त किया। कोच की इस समझाइश और प्रयासों का ही नतीजा था कि परिवार ने अपनी पुरानी रूढ़िवादिता और झिझक को पीछे छोड़कर रेशमा को मैदान पर उतरने की खुली इजाजत दे दी। आज वही परिवार रेशमा की खेल यात्रा में उनकी सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।
बोर्ड परीक्षा की तैयारी और नेशनल का सपना एक साथ
रेशमा का पूरा परिवार बेहद सीधा और मेहनती है। उनके पिता मोहम्मद सलीम जहां शहर में अखबार बांटने का कठिन काम करते हैं, वहीं उनकी माता नसीम अख्तर एक गृहिणी हैं और घर की जिम्मेदारी संभालती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति भले ही बहुत मजबूत न हो, लेकिन अपनी बेटी के बड़े सपनों को उड़ान देने के लिए पूरा परिवार एकजुट होकर काम कर रहा है। रेशमा की दो बड़ी बहनें भी हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। वर्तमान समय में रेशमा 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रही हैं। अपनी बोर्ड परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ वह रोजाना खेल के मैदान पर कई घंटे तक कड़ा पसीना बहाती हैं और नियमित रूप से बास्केटबॉल का अभ्यास करती हैं। उनका पूरा ध्यान इस समय अपनी पढ़ाई और आगामी नेशनल चैंपियनशिप दोनों पर केंद्रित है, ताकि वह देश के लिए खेलते हुए मेडल हासिल कर सकें। रेशमा की यह संघर्ष से भरी कहानी समाज की उन सभी बेटियों के लिए एक बड़ी मिसाल है जो तमाम बाधाओं के बाद भी अपने सपनों को पूरा करने का हौसला रखती हैं।













