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ग्लास्गो में पैरा एथलीट दिलीप गावित ने रचा इतिहास, 100 मीटर स्पर्धा में नया रिकॉर्ड बनाकर जीता स्वर्ण पदकखेल
1 अग॰ 2026, 5:50 am (2 घंटे पहले)· 0

ग्लास्गो में पैरा एथलीट दिलीप गावित ने रचा इतिहास, 100 मीटर स्पर्धा में नया रिकॉर्ड बनाकर जीता स्वर्ण पदक

ग्लास्गो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स की पैरा एथलेटिक्स स्पर्धा में दिलीप महादू गावित ने पुरुषों की 100 मीटर टी47 रेस में 10.71 सेकेंड के रिकॉर्ड समय के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जबकि भारत के ही मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनकाथ ने रजत पदक जीता।

ग्लास्गो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के पैरा एथलेटिक्स ट्रैक पर भारतीय धावक दिलीप महादू गावित ने एक नया इतिहास लिख दिया है। पुरुषों की 100 मीटर टी47 स्पर्धा के फाइनल मुकाबले में दिलीप ने 10.71 सेकेंड का रिकॉर्ड समय निकालकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। इस शानदार रेस में भारत का दबदबा पूरी तरह कायम रहा, क्योंकि इसी स्पर्धा का रजत पदक भारत के ही मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनकाथ ने हासिल किया। मोहम्मद बासिल ने 10.83 सेकेंड में दौड़ पूरी कर भारत के लिए एक ही मुकाबले में पहले और दूसरे दोनों शीर्ष स्थान सुरक्षित कर दिए।

बारिश से भीगे ट्रैक पर शानदार वापसी और नया कीर्तिमान

फाइनल रेस की शुरुआत के समय मौसम की परिस्थितियां धावकों के पक्ष में नहीं थीं। प्रतियोगिता स्थल पर तेज बारिश के कारण ट्रैक पूरी तरह से गीला हो चुका था। मौसम के इस मिजाज ने एथलीटों की वार्म-अप प्रक्रिया को काफी कठिन बना दिया और ठंडे मौसम की वजह से शरीर सुस्त होने लगा था। रेस की शुरुआती मीटरों में दिलीप गावित थोड़े पीछे दिखाई दिए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जैसे ही रेस अपने मध्य चरण में पहुंची, दिलीप ने अपनी गति बढ़ानी शुरू कर दी और अंतिम रेखा तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़कर पहला स्थान प्राप्त कर लिया।

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जीत दर्ज करने के बाद दिलीप ने अपनी रणनीति और परिस्थितियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गीले ट्रैक और ठंडे मौसम के कारण सही टाइमिंग निकालना बहुत बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी एकाग्रता नहीं खोई। दिलीप ने कहा कि वर्तमान समय में वह किसी नौकरी के बारे में विचार नहीं कर रहे हैं। उनका पूरा ध्यान आगामी सितंबर और अक्टूबर के दौरान जापान में होने वाले पैरा एशियाई खेलों पर केंद्रित है। इसके साथ ही वह आने वाले पैरालंपिक खेलों में भी इससे बेहतर प्रदर्शन करने का लक्ष्य लेकर तैयारी कर रहे हैं।

बचपन के हादसे और संघर्ष से निकला स्वर्ण पदक का सफर

दिलीप महादू गावित की यह सफलता केवल एक खेल प्रतियोगिता की जीत नहीं है, बल्कि यह अदम्य इच्छाशक्ति और कठिन संघर्ष की अनूठी मिसाल है। दिलीप का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास स्थित तोरण डोंगरी नाम के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका परिवार बेहद गरीब था और उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करके अपना जीवनयापन करते थे। बचपन से ही दिलीप खेतों में काम करने के दौरान अपने माता-पिता की सहायता किया करते थे।

जब दिलीप की उम्र केवल पांच वर्ष थी, तब एक दिन पेड़ से गिर जाने के कारण उनका एक हाथ गंभीर रूप से चोटिल हो गया था। उस समय गांव और आसपास के ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। सही समय पर उचित इलाज न मिल पाने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई और अंततः डॉक्टरों को उनका एक हाथ काटना पड़ा। इतना बड़ा शारीरिक नुकसान होने के बाद भी दिलीप ने अपनी हिम्मत नहीं हारी और एक हाथ के बिना ही जीवन में आगे बढ़ने का पक्का इरादा किया।

कोच की नजर और सामान्य प्रतियोगिताओं से शुरुआत

ग्रामीण क्षेत्र में बुनियादी खेल सुविधाओं का भारी अभाव था, जिसकी वजह से एथलेटिक्स को करियर के रूप में चुनना दिलीप के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। हालांकि, उनकी छिपी हुई प्रतिभा को उनके स्कूल में खेल कोच वैजयंथ काले ने पहचान लिया। कोच वैजयंथ काले ने दिलीप की रफ्तार और क्षमता को देखने के बाद उनके माता-पिता से संपर्क किया और उन्हें दिलीप को प्रशिक्षित करने के लिए राजी किया।

सुरुआती दिनों में दिलीप को दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए आयोजित होने वाली पैरा प्रतियोगिताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह सामान्य शारीरिक क्षमता वाले एथलीटों के साथ ही प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे और वहां भी अपनी बेहतरीन दौड़ से सभी को प्रभावित करते थे। कोच वैजयंथ काले के मार्गदर्शन में सही दिशा मिलने के बाद दिलीप ने पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई।

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का पदक तालिका में बढ़ता कदम

ग्लास्गो में आयोजित इन राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए यह तीसरा स्वर्ण पदक साबित हुआ है। दिलीप गावित से पहले भारत के लिए मीराबाई चानू ने महिलाओं की 48 किग्रा भारोत्तोलन प्रतियोगिता में देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाया था। इसके अलावा, शर्मिला धनखड़ ने पैरा एथलेटिक्स की महिलाओं की गोला फेंक एफ57 स्पर्धा में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्वर्ण पदक अपने नाम किया था।

दिलीप और मोहम्मद बासिल के इस दोहरे पदक प्रदर्शन के बाद प्रतियोगिता में भारत के कुल पदकों की संख्या 15 तक पहुंच गई है। एक ही रेस में भारत के दो एथलीटों द्वारा पहला और दूसरा स्थान हासिल करना भारतीय पैरा खेलों के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

सवाल-जवाब

कॉमनवेल्थ गेम्स में दिलीप गावित ने कौन सा पदक जीता?
दिलीप गावित ने ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों की पैरा एथलेटिक्स पुरुषों की 100 मीटर टी47 स्पर्धा में 10.71 सेकेंड का नया रिकॉर्ड बनाकर स्वर्ण पदक जीता।
पुरुषों की 100 मीटर टी47 रेस में रजत पदक किसने जीता?
भारत के मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनकाथ ने 10.83 सेकेंड का समय निकालकर रजत पदक जीता।
दिलीप गावित का संबंध भारत के किस राज्य और जिले से है?
दिलीप गावित महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास तोरण डोंगरी गांव के रहने वाले हैं।
ग्लास्गो खेलों में भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या कितनी हो गई है?
दिलीप गावित की जीत के बाद भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या 3 और कुल पदकों की संख्या 15 हो गई है।
दिलीप गावित के कोच कौन हैं जिन्होंने उनकी प्रतिभा पहचानी?
दिलीप गावित के स्कूल कोच वैजयंथ काले ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया।
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