स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में भारतीय एथलीट यशवीर सिंह ने अद्भुत जुझारूपन का प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम कर लिया है। जयपुर में भारतीय रेलवे के टिकट क्लर्क (टीसी) के पद पर तैनात यशवीर ने प्रतियोगिता के बिल्कुल अंतिम क्षणों में पासा पलट दिया। शुरुआती पांच प्रयासों तक पदक की दौड़ से बाहर चल रहे इस युवा खिलाड़ी ने अपने छठे और आखिरी प्रयास में 85.41 मीटर की दूरी तय कर हर किसी को हैरान कर दिया। इस व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ उन्होंने न सिर्फ भारत के लिए पदक पक्का किया, बल्कि लंबे समय से राजस्थान के एथलेटिक्स क्षेत्र में बने पदक के सूखे को भी खत्म कर दिया। ग्लासगो से विजय पताका फहराकर जब यशवीर जयपुर हवाई अड्डे पर पहुंचे, तो खेल प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने उनका ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य स्वागत किया।
ग्लासगो में छठे प्रयास का चमत्कार और दिग्गजों को पछाड़ने की दास्तान
ग्लासगो के मैदान पर जैवलिन थ्रो का मुकाबला बेहद कड़ा और दबाव भरा था। स्पर्धा की शुरुआत यशवीर सिंह के लिए अनुकूल नहीं रही थी। पहले पांच प्रयासों तक वे संघर्ष करते नजर आ रहे थे और लीडरबोर्ड में पीछे छूट चुके थे। हालांकि, हिम्मत हारने के बजाय उन्होंने अपने अंतिम थ्रो में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उनका भाला 85.41 मीटर की दूरी पर जाकर गिरा, जो उनके करियर का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बन गया। इससे पहले उनका पर्सनल बेस्ट थ्रो 83.72 मीटर था, जिसे उन्होंने एक झटके में ध्वस्त कर दिया।
यशवीर के इस थ्रो का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने विश्व एथलेटिक्स के कई दिग्गज हस्ताक्षरों को पीछे छोड़ते हुए पोडियम पर स्थान हासिल किया। उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स और मौजूदा ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता पाकिस्तान के अरशद नदीम जैसे स्टार खिलाड़ियों को मात दी। यद्यपि भारत के स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा इस प्रतियोगिता में यशवीर से आगे रहे, लेकिन पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम पर यशवीर की बढ़त ने भारतीय खेल प्रशंसकों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
कंधे की सर्जरी, चोटों का दर्द और 2028 ओलंपिक का नया लक्ष्य
यशवीर सिंह की यह सफलता केवल एक दिन के प्रदर्शन की कहानी नहीं है, बल्कि सालों के दर्द और संघर्ष का प्रतिफल है। एक समय ऐसा भी आया था जब पीठ के भीषण दर्द और कंधे की गंभीर चोट ने उनके करियर पर संकट के बादल मंडरा दिए थे। कंधे के ऑपरेशन के कारण वे लंबे समय तक मैदान से बाहर रहे और इसी वजह से 2024 के पेरिस ओलंपिक क्वालिफिकेशन से भी चूक गए थे। कई मौकों पर निराशा हाथ लगने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और एसएमएस स्टेडियम में नियमित रिहैब और अभ्यास जारी रखा।
ग्लासगो में मिला यह कांस्य पदक यशवीर के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है। इस ऐतिहासिक थ्रो के साथ ही उनके लिए 2028 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई करने के रास्ते खुल गए हैं। यशवीर का मानना है कि कॉमनवेल्थ गेम्स का पदक उनकी यात्रा का एक पड़ाव मात्र है और उनका असली सपना ओलंपिक के मंच पर देश का तिरंगा लहराना है, जिसकी तैयारियों में वे अभी से जुट गए हैं।
हरियाणा की मिट्टी से जयपुर का एसएमएस स्टेडियम: पारिवारिक पृष्ठभूमि
यशवीर सिंह मूल रूप से हरियाणा के भिवानी जिले के देवसर गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और जयपुर में रेलवे कंप्लेंट इंचार्ज के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पिता के स्थानांतरण के कारण यशवीर का पूरा परिवार हरियाणा से राजस्थान आ गया और यशवीर की प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा जयपुर में ही पूरी हुई। खेल के प्रति लगाव यशवीर को विरासत में मिला है, क्योंकि उनके पिता खुद अपने समय में जैवलिन थ्रो के उत्कृष्ट खिलाड़ी रहे हैं।
शुरुआती दिनों में यशवीर को भाला फेंकने की बुनियादी बारीकियां उनके पिता ने ही सिखाईं। पिछले 7 वर्षों से लगातार इस खेल में पसीना बहा रहे यशवीर ने जयपुर के रेलवे ग्राउंड और एसएमएस स्टेडियम में अपने पिता के मार्गदर्शन में अनगिनत घंटे अभ्यास किया है। खेल का यह जज्बा उनके परिवार की रगों में दौड़ता है। उनका छोटा भाई उत्सव सिंह भी जैवलिन थ्रोअर है और जूनियर नेशनल लेवल पर पदक जीत चुका है, हालांकि फिलहाल वह भी चोट की वजह से मैदान से दूर है। दोनों भाइयों ने जयपुर के मैदानों पर एक साथ अभ्यास कर अपनी पहचान बनाई है।
रेलवे टीसी की ड्यूटी के साथ खेल का अनुशासन और नीरज चोपड़ा से प्रेरणा
लगभग दो वर्ष पूर्व यशवीर सिंह का चयन भारतीय रेलवे में टिकट क्लर्क (टीसी) के रूप में हुआ था और जयपुर जंक्शन उनकी कर्मभूमि बन गया। स्टेशन पर लंबी और व्यस्त ड्यूटी के बावजूद यशवीर ने अपने खेल के प्रति समर्पण में कोई कमी नहीं आने दी। सुबह और शाम के सत्रों में अभ्यास करना तथा दिन में रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की टिकट जांचना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। कठिन कामकाजी परिस्थितियों के बीच भी उन्होंने अपनी फिटनेस और तकनीक पर लगातार काम किया।
भाला फेंकने की कला में वे भारत के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा को अपना आदर्श मानते हैं। जयपुर लौटने के बाद अपने अनुभव साझा करते हुए यशवीर ने कहा कि जैवलिन थ्रो एक ऐसा अनिश्चितता भरा खेल है, जिसमें किसी भी दिन कोई भी खिलाड़ी किसी को भी पीछे छोड़ सकता है। उनके अनुसार, प्रतियोगिता के दिन खिलाड़ी की तकनीक और मौसम का साथ मिलना सबसे महत्वपूर्ण होता है। सही तकनीक और अनुकूल परिस्थितियों के बल पर ही उन्होंने ग्लासगो में विश्व स्तर के खिलाड़ियों के बीच अपनी श्रेष्ठता साबित की।
एशियन एथलेटिक्स से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक का सफर
कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक पदक जीतने से पहले भी यशवीर सिंह राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अपनी धाक जमा चुके हैं। वे राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं और नेशनल चैंपियनशिप में कई स्वर्ण और रजत पदक अपने नाम कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2025 में आयोजित एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हालांकि वे पदक तालिका में जगह बनाने से थोड़ा चूक गए थे और उन्हें 5वें स्थान से संतोष करना पड़ा था।
एशियन एथलेटिक्स की उस सीख ने यशवीर को और अधिक मजबूत बनाया, जिसका परिणाम ग्लासगो में देखने को मिला। अब राजस्थान और हरियाणा दोनों ही राज्य इस होनहार खिलाड़ी की उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं। रेलवे प्रशासन और खेल अधिकारियों ने भी उनके प्रदर्शन की सराहना की है। 2028 अमेरिका ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए Yashveer Singh अब अपनी थ्रोइंग तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण योजना पर काम कर रहे हैं।



















