दक्षिण कोरिया के चांगवोन शहर में आयोजित पैरा विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में राजस्थान की राजधानी जयपुर की प्रतिभावान शूटर मोना अग्रवाल ने अपने अचूक निशाने के दम पर नया इतिहास लिख दिया है। उन्होंने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग व्यक्तिगत स्पर्धा में 250.0 का स्कोर खड़ा करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। इस शानदार उपलब्धि के साथ ही उन्होंने 2028 में अमेरिका के लॉस एंजिलिस में होने वाले पैरालिंपिक खेलों के लिए भारतीय दल का पहला निशानेबाजी कोटा पक्का कर लिया है। पेरिस पैरालिंपिक के बाद यह लगातार दूसरा अवसर होगा जब वह दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर तिरंगे का मान बढ़ाएंगी।
टीम स्पर्धा में अवनी और मिली के साथ मिलकर जीता स्वर्ण
चांगवोन की इस विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में भारतीय निशानेबाजों का दबदबा देखने को मिला। मोना ने R2 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग SH1 वर्ग में व्यक्तिगत रजत जीतने के अलावा टीम इवेंट में भी स्वर्णिम सफलता हासिल की। उन्होंने हमवतन स्टार शूटर अवनी लेखारा और साथी निशानेबाज मिली शाह के साथ मिलकर कुल 1878.6 अंकों का विशाल स्कोर बनाया और भारत की झोली में चमचमाता स्वर्ण पदक डाल दिया। व्यक्तिगत फाइनल राउंड में सर्बिया की अनुभवी निशानेबाज क्रिस्टीना ट्रिफुनोविक ने पहला स्थान हासिल कर स्वर्ण पदक जीता, जबकि मोना बेहद करीबी मुकाबले में दूसरे स्थान पर रहीं और देश के लिए ऐतिहासिक पैरालिंपिक टिकट हासिल करने में सफल रहीं।
टीवी स्क्रीन से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय शूटर बनने का सफर
मोना के खेल जीवन की दास्तान किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है। कुछ साल पहले तक वह अपने कमरे में बैठकर टीवी स्क्रीन पर अन्य एथलीटों को पदक जीतते देखती थीं और सोचती थीं कि क्या वह भी कभी इस मुकाम पर पहुंच पाएंगी। टोक्यो पैरालिंपिक के दौरान जब जयपुर की ही अवनी लेखरा ने स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया, तब मोना घर पर बैठी टीवी देख रही थीं। अवनी की उस ऐतिहासिक जीत ने मोना के भीतर एक नई चिंगारी सुलगा दी। उन्होंने तय किया कि शारीरिक चुनौतियों और व्हीलचेयर को अपनी कमजोरी नहीं बनने देंगी, बल्कि इसी के सहारे खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करेंगी। अवनी की प्रेरणा को अपना हथियार बनाकर उन्होंने पहली बार राइफल थामने का फैसला किया।
वॉलीबॉल कोर्ट से शूटिंग रेंज तक का कठिन संघर्ष
निशानेबाजी की दुनिया में कदम रखने से पहले मोना वॉलीबॉल के खेल में हाथ आजमाती थीं। इसके बाद उन्होंने जयपुर की एकलव्य शूटिंग अकादमी में जाकर विधिवत अभ्यास शुरू किया। शुरुआती दौर काफी तकलीफदेह और अभावों से भरा रहा। उनके पास शूटिंग के आधुनिक उपकरण तक मौजूद नहीं थे और खेल से जुड़े साजो-सामान का इंतजाम करना एक बड़ी चुनौती थी। जब तक उन्होंने पेरिस पैरालिंपिक में अपनी छाप नहीं छोड़ी, तब तक खेल जगत में उनकी कोई खास पहचान नहीं थी। इस पूरे कठिन सफर में उनके कोच योगेश शेखावत ढाल बनकर उनके साथ खड़े रहे, जिन्हें मोना अपनी सफलता की सबसे मजबूत रीढ़ मानती हैं।
लगातार सटीक निशाने और पदकों की झड़ी
अपनी क्षमता को निखारने के बाद मोना ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में लगातार मेडल जीतकर अपनी योग्यता सिद्ध की। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित पहले पैरा विश्व कप में उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया था और अवनी लेखरा को पछाड़ते हुए पेरिस पैरालिंपिक के लिए पहला प्रवेश पत्र पाया था। पेरिस पैरालिंपिक 2024 में उन्होंने व्यक्तिगत कांस्य पदक जीतकर दुनिया में अपनी पहचान पक्की की। इसके अतिरिक्त सर्बिया के नोवी सैड में खेली गई WSPS विश्व कप प्रतियोगिता में उन्होंने कांस्य पदक जीता था और पैरा शूटिंग विश्व कप 2023 में भी वह कांस्य पदक अपने नाम कर चुकी हैं।
अड़चनों को पार कर देश की पहली निशानेबाज बनने का गौरव
लॉस एंजिलिस खेलों का टिकट हासिल करने से पहले एक मौके पर मोना केवल 0.3 अंक के मामूली फासले से क्वालिफिकेशन पाने से चूक गई थीं। उस दर्दनाक झटके से उबरते हुए उन्होंने अपने फोकस को और मजबूत किया और सीधे दक्षिण कोरिया की धरती पर पोडियम फिनिश करके लॉस एंजिलिस का टिकट कटाने वाली पहली भारतीय शूटर बन गईं। खेल जगत में उनके इसी असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से अलंकृत कर चुकी है। इसके साथ ही उन्हें महाराजा अग्रसेन ग्लोबल आइकॉन अवॉर्ड समेत राज्य और केंद्र स्तर पर कई अन्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। भारत के प्रधानमंत्री भी सार्वजनिक मंच से उनकी खेल प्रतिभा की मुक्तकंठ से सराहना कर चुके हैं।

















