भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के आक्रामक सलामी बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल और उनके बचपन के मेंटॉर ज्वाला सिंह के रिश्तों को लेकर खेल गलियारों में लगातार चर्चाएं चल रही हैं। हाल के समय में ज्वाला सिंह ने विभिन्न साक्षात्कारों में अपने और यशस्वी के आपसी संबंधों की सच्चाई सामने रखी है। उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र के दौरान अपने शिष्य को लेकर बेहद आत्मीय और भावुक विचार व्यक्त किए, जिससे दोनों के बीच किसी भी तरह के मनमुटाव की अटकलों पर विराम लग गया है।
अलग होने के फैसले पर कोच का नजरिया
ज्वाला सिंह ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने पूर्व शिष्य से किसी भी बात का कोई मलाल या नाराजगी नहीं है। उन्होंने जीवन के स्वाभाविक पड़ाव का उल्लेख करते हुए साझा किया कि एक निश्चित उम्र में पहुंचने के बाद बच्चे अपनी स्वतंत्रता चाहते हैं और अलग जिंदगी बसाना पसंद करते हैं, और यशस्वी ने भी ठीक वैसा ही कदम उठाया है। उनके अनुसार इसे किसी विवाद या कड़वाहट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह उम्र के साथ आने वाला एक सामान्य व्यक्तिगत फैसला है।
नौ साल की साझा तपस्या और पिता जैसा रिश्ता
यशस्वी की वर्तमान उपलब्धियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रदर्शन को देखकर ज्वाला सिंह का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंने अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि जब भी यशस्वी क्रीज पर रन जुटाते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे स्वयं मैदान पर बल्लेबाजी कर रहे हों। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे खुद गोरखपुर से एक पेशेवर क्रिकेटर बनने का ख्वाब लेकर मुंबई की मायानगरी आए थे, जहां उनका सफर बेहद मुश्किलों भरा रहा था। यशस्वी ने उसी तरह की कठिन चुनौतियों का सामना किया और अंततः उस सपने को साकार कर दिखाया जो कभी उनका अपना था।
ज्वाला सिंह ने इस गहरे जुड़ाव का ब्योरा देते हुए बताया कि यशस्वी पूरे 9 साल तक उनके अपने घर में एक सदस्य की तरह रहे। खेल के मैदान पर वे उनके सख्त मार्गदर्शक और कोच की भूमिका निभाते थे, जबकि घर की चौखट के भीतर वे एक पिता की तरह उनकी देखभाल करते थे। यशस्वी उनके लिए केवल एक साधारण शिष्य नहीं थे, बल्कि पारिवारिक सदस्य थे जिनके खान-पान के प्रबंध से लेकर सोने-जागने की दिनचर्या तक की पूरी निगरानी स्वयं ज्वाला सिंह ही तय करते थे।
टेस्ट प्रारूप की उपेक्षा और चयन प्रक्रिया पर चिंता
अपने शिष्य के व्यक्तिगत सफर के अलावा ज्वाला सिंह ने आधुनिक क्रिकेट में पारंपरिक खेल के गिरते स्तर पर भी गंभीर चिंता जाहिर की। उन्होंने विशेष रूप से रेड बॉल क्रिकेट की घटती अहमियत का मुद्दा उठाया और कहा कि आज के युवा खिलाड़ी पूरी तरह टी20 प्रारूप पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे खेल का वास्तविक स्वरूप यानी टेस्ट क्रिकेट अपनी पहचान और लोकप्रियता खो रहा है।
उन्होंने टीम के मौजूदा कार्यक्रम और चयन नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में भारतीय टीम पर्याप्त संख्या में टेस्ट मुकाबलों में हिस्सा नहीं ले रही है। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय दल में चयन के आधार पर सवाल उठाते हुए जोर दिया कि टीम इंडिया का चुनाव घरेलू प्रतियोगिताओं के प्रदर्शन को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए। ज्वाला सिंह के अनुसार रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित घरेलू टूर्नामेंटों में पसीना बहाने वाले और निरंतर रन या विकेट निकालने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रीय चयन में सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।



















