एशियाई खेलों के 20वें संस्करण में भारतीय दल के खाते में मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स स्पर्धा का पहला ऐतिहासिक पदक आ गया है। महिलाओं के पारंपरिक 60 किलोग्राम भार वर्ग में देश की अनुभवी फाइटर सुचिका तारियाल ने कांस्य पदक अपने नाम किया। हालांकि, इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद रिंग और मैट का माहौल बेहद भावुक नजर आया, क्योंकि मुकाबला बराबरी पर छूटने के बावजूद एक तकनीकी नियम की वजह से सुचिका फाइनल की होड़ से बाहर हो गईं और उन्हें ब्रॉन्ज मेडल से संतोष करना पड़ा। इस नए पदक के साथ ही इन खेलों में भारत की कुल पदकों की संख्या बढ़कर छह हो गई है, जिसमें निशानेबाजी दल के चार रजत और एक कांस्य पदक पहले से शामिल हैं।
सेमीफाइनल में हुआ कड़ा मुकाबला और स्कोरिंग विवाद
सेमीफाइनल मुकाबले में सुचिका का सामना सिंगापुर की फाइटर हुई हून टीओ से हुआ। दोनों ही खिलाड़ियों के बीच मैट पर बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिली। शुरुआत में जजों ने सिंगापुर की टीओ के पक्ष में फैसला सुनाया था। इस निर्णय पर भारतीय खेमे ने तुरंत कड़ा ऐतराज जताया और चुनौती पेश की। भारतीय दल द्वारा आधिकारिक चुनौती दिए जाने के बाद छह जजों के पैनल ने बाउट की दोबारा समीक्षा की। जजों के बंटे हुए निर्णय के आधार पर आखिरकार मुकाबला आधिकारिक रूप से ड्रॉ यानी बराबरी पर समाप्त घोषित किया गया।
700 ग्राम के अंतर से सिंगापुरियन फाइटर को मिला फाइनल का टिकट
मुकाबला ड्रॉ रहने के बाद विजेता का फैसला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों का सहारा लिया गया। इंटरनेशनल मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स फेडरेशन (आईएमएमएएफ) की नियमावली के मुताबिक, अगर नॉकआउट या स्कोर के आधार पर मुकाबला अनिर्णित रहता है, तो दोनों फाइटर्स के सुबह दर्ज किए गए आधिकारिक वजन की तुलना की जाती है। सुबह के वजन माप में सिंगापुर की टीओ का वजन सुचिका के मुकाबले ठीक 700 ग्राम कम दर्ज किया गया था। केवल इसी 700 ग्राम के अंतर के चलते टीओ को विजेता घोषित कर सीधे फाइनल में जगह दे दी गई, जबकि सुचिका के खाते में कांस्य पदक आया।
चुनौती प्रक्रिया और फेडरेशन का आधिकारिक पक्ष
एमएमए स्पोर्ट्स फेडरेशन के अध्यक्ष निखिल कुंदर ने इस पूरे घटनाक्रम पर नियम और प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय पक्ष ने 1000 अमेरिकी डॉलर का आवश्यक मध्यस्थता शुल्क अदा करके फैसले को औपचारिक रूप से चुनौती दी थी। इसके बाद मध्यस्थता के लिए मूल तीन जजों के अतिरिक्त तीन नए जजों को शामिल किया गया। इन सभी छह जजों द्वारा दोबारा स्कोरिंग किए जाने पर परिणाम ड्रॉ निकला। इसके बाद सिंगापुर की टीम के पास दो रास्ते थे या तो वे जवाबी मध्यस्थता चुनते, जिसमें तीन अन्य जज मुकाबले को फिर से आंकते, या फिर सुबह दर्ज वजन के नियम को लागू होने देते। सिंगापुर टीम ने वजन नियम के तहत आगे बढ़ना चुना, जिससे उनकी खिलाड़ी आगे बढ़ गई।
मैट पर छलके आंसू और तिरंगे के साथ सम्मान
जैसे ही इलेक्ट्रॉनिक स्कोरबोर्ड पर आधिकारिक नतीजे की घोषणा हुई, सुचिका अविश्वास में सिर हिलाते हुए स्तब्ध रह गईं। उन्होंने रिंग में रेफरी द्वारा विजेता का हाथ उठाए जाने के समय भी दूरी बनाए रखी। अंतिम ऐलान होते ही 36 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी घुटनों के बल बैठ गईं और उनके आंसू छलक पड़े। उनके कोचों ने मैट पर आकर उन्हें संभाला और ढांढस बंधाया। गहरे दुख के बावजूद, सुचिका ने खुद को भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लपेटा और दर्शकों के सामने सम्मान का एक संक्षिप्त चक्कर लगाकर अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की।
परिणाम पर सुचिका की प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद सुचिका ने कहा कि मुकाबले के परिणाम से काफी निराशा हुई क्योंकि उन्हें पूरा यकीन था कि बाउट उन्होंने जीती है। उन्होंने बताया कि एक खिलाड़ी हर जगह अपना 100 प्रतिशत झोंकता है, इसलिए जब निर्णय अनुचित लगे तो आवाज उठाना उनका हक है। इसके साथ ही उन्होंने एशियाई खेलों में एमएमए का पहला पदक जीतने पर संतोष जताया और कहा कि कड़ी मेहनत के दम पर देश के लिए कांस्य जीतना गर्व की बात है।
सड़क पर उत्पीड़न के खिलाफ उठाई आवाज से चैंपियन बनने तक का सफर
हरियाणा के रोहतक जिले के गांव किलोई की रहने वाली 36 वर्षीय सुचिका तारियाल बहु-विधा कॉम्बैट खेलों की मंझी हुई एथलीट हैं। उन्होंने महज 12 साल की उम्र में सड़क पर होने वाले उत्पीड़न का सामना करने के बाद खुद को मजबूत बनाने के इरादे से कॉम्बैट स्पोर्ट्स की राह चुनी थी। वह 2024 की जियू-जित्सु विश्व चैंपियन रह चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने 2022 के राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो स्पर्धा में और 2022 के एशियाई खेलों में कुराश खिलाड़ी के तौर पर भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है।



















