यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के वैज्ञानिकों ने बनाया बिना गर्म पानी वाला एक्सप्रेसो, ध्वनि तरंगों से होगी तैयारतकनीक
4 घंटे पहले· 4

यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के वैज्ञानिकों ने बनाया बिना गर्म पानी वाला एक्सप्रेसो, ध्वनि तरंगों से होगी तैयार

वैज्ञानिकों ने कमरे के तापमान पर हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स की मदद से कॉफी तैयार करने की नई तकनीक खोजी है, जो पारंपरिक मशीन की तुलना में 75 प्रतिशत कम बिजली की खपत करती है।

बिना गर्म पानी के बनेगा एक्सप्रेसो

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स में कोलंबियाई शोधकर्ता फ्रांसिस्को ट्रुहिलो के नेतृत्व में एक टीम ने कॉफी बनाने का एक अनोखा तरीका खोजा है, जिसे उन्होंने "अल्ट्रासोनिक एक्सप्रेसो" नाम दिया है। ट्रेंडकिया के अनुसार, यह कमरे के तापमान पर काम करने वाली एक ब्रूइंग प्रक्रिया है, जो बिना गर्म पानी के ही हाई-फ्रीक्वेंसी ध्वनि तरंगों (साउंड वेव्स) का इस्तेमाल करके पिसी हुई कॉफी से उसका स्वाद, तेल, खुशबू और कैफीन बाहर निकाल लेती है।

हालांकि, पारंपरिक तरीके से कॉफी बनाने में जहां सिर्फ 30 सेकंड का समय लगता है, वहीं इस नई प्रक्रिया में लगभग तीन मिनट का वक्त लगता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरीके में पारंपरिक मशीन के मुकाबले 75 प्रतिशत कम बिजली खर्च होती है। यह कॉफी शॉप और रेस्तरां के लिए एक बहुत बड़ी बचत साबित हो सकती है, खासकर उन उद्योगों के लिए जो बड़े पैमाने पर रेडी-टू-ड्रिंक (तुरंत पीने योग्य) कॉफी उत्पाद तैयार करते हैं।

ध्वनि तरंगों का विज्ञान और तकनीक

इस प्रायोगिक प्रणाली में गर्म पानी के बजाय अल्ट्रासोनिक तरंगों को सीधे पानी और कॉफी पाउडर से भरे फिल्टर पर डाला जाता है। यह तकनीक "अकौस्टिक कैविटेशन" (ध्वनिक गुहिकायन) नामक एक वैज्ञानिक सिद्धांत पर काम करती है। इसमें पानी के भीतर सूक्ष्म बुलबुले बनते हैं और फूटते हैं, जिससे माइक्रोकरंट्स (सूक्ष्म तरंगें) पैदा होती हैं। ये सूक्ष्म तरंगें कॉफी के कणों से घुलनशील तत्वों को आसानी से बाहर खींच लेती हैं।

इन सूक्ष्म तरंगों को पैदा करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया जो पूरे फिल्टर बास्केट में अल्ट्रासोनिक कंपन भेज सकता है। इससे यह फिल्टर एक तरह के अकौस्टिक रिएक्टर में बदल जाता है। यह डिजाइन तरंगों को एक साथ कई जगहों पर टकराने में मदद करता है, जिससे कॉफी के कणों के आसपास पानी का प्रवाह तेज हो जाता है। फ्रांसिस्को ट्रुहिलो ने बताया कि यह अल्ट्रासाउंड तकनीक उन्हें गर्मी (हीट) की जगह मैकेनिकल एनर्जी (यांत्रिक ऊर्जा) का उपयोग करने की अनुमति देती है।

जर्नल ऑफ फूड इंजीनियरिंग के इस महीने के अंक में इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से प्रकाशित किया गया है। एक्सप्रेसो जैसी गाढ़ी कॉफी तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने कॉफी के पीसने के आकार (ग्राइंड साइज), अल्ट्रासाउंड की शक्ति और ब्रूइंग के समय जैसे कई मानकों में बदलाव किए। 100 वॉट की शक्ति और बारीक पिसी हुई कॉफी का उपयोग करके उन्होंने एक ऐसा पेय तैयार किया, जिसके घुले हुए ठोस पदार्थों का स्तर और निष्कर्षण (एक्सट्रैक्शन यील्ड) स्पेशलिटी कॉफी एसोसिएशन के मानकों के बिल्कुल अनुकूल था।

स्वाद और रसायनों का कड़ा इम्तिहान

जब वैज्ञानिकों ने अल्ट्रासाउंड के बिना इसी तापमान और परिस्थितियों में कॉफी बनाने की कोशिश की, तो वे इन मानकों को हासिल नहीं कर पाए। अल्ट्रासोनिक सिस्टम ने रूम टेंपरेचर वाले पानी का उपयोग करके केवल कुछ ही मिनटों में एक्सप्रेसो जैसी कड़क कॉफी तैयार कर दी। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसके लिए ढाई से तीन मिनट का समय सबसे सही पाया गया।

टीम ने कॉफी के रासायनिक मानकों का भी बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि इसमें कैफीन और क्लोरोजेनिक एसिड की मात्रा पारंपरिक विधि से तैयार कॉफी जैसी ही थी। इसके अलावा, इसके pH स्तर या खुशबू के लिए जिम्मेदार वाष्पशील यौगिकों (वोलेटाइल कंपाउंड्स) के रासायनिक संगठन में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया।

इस नई तकनीक की जांच के लिए 100 लोगों के एक समूह को शामिल करके स्वाद परीक्षण (सेंसरी टेस्ट) कराया गया। इन लोगों को पारंपरिक एक्सप्रेसो और अल्ट्रासोनिक एक्सप्रेसो दोनों परोसी गईं। परीक्षण के नतीजों में लोगों ने किसी एक को भी विशेष प्राथमिकता नहीं दी। दोनों ही कॉफी को खुशबू, स्वाद, कड़वाहट और समग्र पसंद के मामले में लगभग बराबर अंक मिले।

इसके अलावा, दोनों तरीकों से बनी फिल्टर कॉफी की भी आपस में तुलना की गई। फ्रांसिस्को ट्रुहिलो ने बताया कि फिल्टर कॉफी के मामले में लोगों ने अल्ट्रासोनिक विधि से तैयार कॉफी को ज्यादा पसंद किया और उसकी कड़वाहट को पारंपरिक कॉफी की तुलना में अधिक सुखद बताया।

पर्यावरण को फायदा और भविष्य की राह

एक्सप्रेसो के पारंपरिक स्वाद और खूबियों को दोहराने के साथ-साथ यह नई तकनीक पर्यावरण के लिए भी बहुत फायदेमंद हो सकती है। ट्रेंडकिया के अनुसार, शोधकर्ताओं के परीक्षणों से पता चला है कि समान कड़कपन वाली कॉफी बनाने के लिए इस अल्ट्रासोनिक सिस्टम ने एक साधारण एक्सप्रेसो मशीन द्वारा खपत की जाने वाली बिजली की केवल 24 प्रतिशत ऊर्जा का ही इस्तेमाल किया।

हालांकि शोधकर्ता यह स्पष्ट करते हैं कि अल्ट्रासाउंड से बनी यह कॉफी पारंपरिक एक्सप्रेसो से पूरी तरह समान नहीं है, लेकिन परिणाम बताते हैं कि पानी को गर्म किए बिना भी समान रासायनिक और स्वाद वाली कॉफी बनाई जा सकती है। यह शोध भविष्य में ऐसे कॉफी मेकर बनाने की राह खोलता है जो एक ही तकनीक से एक्सप्रेसो, फिल्टर कॉफी और कोल्ड ब्रू सब कुछ बना सकेंगे। अगर ये मशीनें बाजार में आती हैं, तो कॉफी शॉप में भाप और मशीनों की तेज आवाज की जगह अल्ट्रासाउंड की शांत कंपन ले लेगी।

सवाल-जवाब

अल्ट्रासोनिक एक्सप्रेसो क्या है?
यह कमरे के तापमान पर कॉफी ब्रू करने की एक तकनीक है, जिसे शोधकर्ताओं ने विकसित किया है। यह गर्म पानी के बजाय हाई-फ्रीक्वेंसी ध्वनि तरंगों का उपयोग करके कॉफी पाउडर से स्वाद, तेल और कैफीन निकालती है।
पारंपरिक एक्सप्रेसो मशीन की तुलना में अल्ट्रासोनिक विधि कितनी बिजली बचाती है?
अल्ट्रासोनिक ब्रूइंग प्रक्रिया 75 प्रतिशत कम ऊर्जा की खपत करती है। यह समान कड़कपन वाली कॉफी बनाने के लिए पारंपरिक एक्सप्रेसो मशीन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बिजली का केवल 24 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करती है।
इस नई तकनीक से एक कप कॉफी बनाने में कितना समय लगता है?
जहां पारंपरिक एक्सप्रेसो में लगभग 30 सेकंड का समय लगता है, वहीं अल्ट्रासोनिक सिस्टम को सही तरीके से कॉफी तैयार करने में ढाई से तीन मिनट का समय लगता है।
क्या स्वाद परीक्षण करने वालों को पारंपरिक और अल्ट्रासोनिक एक्सप्रेसो में कोई अंतर महसूस हुआ?
100 लोगों के स्वाद परीक्षण में पारंपरिक और अल्ट्रासोनिक एक्सप्रेसो के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। दोनों को खुशबू, स्वाद, कड़वाहट और पसंद के मामले में लगभग बराबर अंक मिले।
यह तकनीक कॉफी निकालने के लिए किस भौतिक सिद्धांत का उपयोग करती है?
यह तकनीक 'अकौस्टिक कैविटेशन' (ध्वनिक गुहिकायन) का उपयोग करती है। इसमें पानी में सूक्ष्म बुलबुले बनते और फूटते हैं, जिससे उत्पन्न सूक्ष्म तरंगें बिना गर्मी के ही कॉफी से घुलनशील तत्वों को बाहर खींच लेती हैं।
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