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करीमनगर के पास एक मीनार हिलाओ तो दूसरी में भी कंपन, जानिए इस मस्जिद का रहस्ययात्रा
6 जुल॰ 2026, 6:35 am (45 दिन पहले)· 2

करीमनगर के पास एक मीनार हिलाओ तो दूसरी में भी कंपन, जानिए इस मस्जिद का रहस्य

तेलंगाना के करीमनगर जिले में एलगंदल किले के पास बनी दो मीनार मस्जिद की मीनारें ऐसी बनी हैं कि एक को हिलाने पर दूसरी में भी कंपन महसूस होता है, जबकि बीच का ढांचा पूरी तरह स्थिर रहता है।

तेलंगाना के करीमनगर जिले में एलगंदल किले के पास सदियों पुरानी एक ऐसी मस्जिद खड़ी है, जिसकी दो मीनारें आज भी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को हैरान करती हैं। यहां अगर कोई एक मीनार को हल्के से हिलाए, तो कुछ ही पलों में दूसरी मीनार में भी साफ कंपन महसूस होने लगता है, जबकि दोनों मीनारों को आपस में जोड़ने वाला मुख्य ढांचा पूरी तरह स्थिर बना रहता है। यही अनोखी खासियत इस मस्जिद को देश की सबसे रहस्यमयी ऐतिहासिक इमारतों में शामिल करती है।

कुतुब शाही और आसफ जाही दौर की गवाह

यह दो मीनार मस्जिद प्रसिद्ध एलगंदल किले से महज एक किलोमीटर की दूरी पर बनी है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI के संरक्षण में आती है। इसका निर्माण कुतुब शाही और आसफ जाही शासकों के दौर में हुआ था, इसलिए इसकी दीवारों में उस दौर की राजनीतिक और सांस्कृतिक झलक साफ नजर आती है। स्थापत्य शैली के लिहाज से यह इमारत हैदराबाद की मशहूर चारमीनार से काफी मिलती जुलती है और अपने दौर की बेहतरीन कारीगरी का जीवंत नमूना पेश करती है। यही वजह है कि देश विदेश से पर्यटक, इतिहासकार और शोधकर्ता इसे देखने पहुंचते हैं।

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संकरी और घुमावदार सीढ़ियों वाली मीनारें

मस्जिद की सबसे बड़ी पहचान इसकी दो भव्य और काफी ऊंची मीनारें हैं। मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला के अनुरूप बनाई गई इन मीनारों के भीतर का रास्ता बेहद संकरा और कलात्मक ढंग से तैयार किया गया है। मीनार के शीर्ष तक पहुंचने के लिए पत्थरों को बेहद सटीकता से तराशकर चक्राकार यानी घुमावदार सीढ़ियां बनाई गई हैं। इन तंग रास्तों से गुजरते हुए जब कोई ऊपर पहुंचता है, तो वहां बने खूबसूरत झरोखों से सामने की पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक एलगंदल किला और आसपास का विहंगम प्राकृतिक नजारा साफ दिखाई देता है।

झूलती मीनारें और भूकंपरोधी तकनीक का रहस्य

स्थानीय लोग इन मीनारों को झूलती मीनारें कहकर बुलाते हैं, क्योंकि इनकी सबसे बड़ी खासियत यही है। जब कोई व्यक्ति एक मीनार के ऊपरी हिस्से पर जाकर उसे हल्के से हिलाता है, तो कुछ ही पलों में दूसरी मीनार में भी साफ तौर पर कंपन महसूस होने लगता है। सबसे हैरानी की बात यह है कि दोनों मीनारों को आपस में जोड़ने वाला मुख्य ढांचा इस दौरान पूरी तरह स्थिर बना रहता है और उसमें कोई हलचल नहीं दिखती। माना जाता है कि मध्यकाल में शिल्पकारों ने इसे भूकंपरोधी तकनीक के तौर पर तैयार किया था, ताकि भूकंप जैसी आपदा के दौरान इमारत को नुकसान से बचाया जा सके। यह वैज्ञानिक समझ उस दौर के कारीगरों और इंजीनियरों की असाधारण बुद्धिमत्ता को बखूबी दर्शाती है और आधुनिक विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देती है।

काकतीय राजाओं से निजामों तक का इतिहास

इस मस्जिद ने काकतीय राजाओं से लेकर कुतुब शाही सुल्तानों और हैदराबाद के निजामों तक, कई सत्ताओं का उतार चढ़ाव भरा लंबा इतिहास अपनी आंखों से देखा है। यही वजह है कि यह इमारत आज भी शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए गहरी दिलचस्पी और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। प्रशासन ने इसे एक संरक्षित स्मारक घोषित कर रखा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की इस बेमिसाल ऐतिहासिक विरासत, समृद्ध संस्कृति और प्राचीन वैज्ञानिक सूझबूझ से अच्छी तरह रूबरू हो सकें।

सवाल-जवाब

यह दो मीनार मस्जिद कहां स्थित है?
यह तेलंगाना के करीमनगर जिले में एलगंदल किले से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
इस मस्जिद की मीनारों को झूलती मीनारें क्यों कहा जाता है?
क्योंकि एक मीनार को हिलाने पर कुछ ही पलों में दूसरी मीनार में भी कंपन महसूस होने लगता है।
क्या दोनों मीनारों के बीच का ढांचा भी हिलता है?
नहीं, दोनों मीनारों को जोड़ने वाला मुख्य ढांचा हिलाने के दौरान पूरी तरह स्थिर बना रहता है।
यह मस्जिद किस दौर में बनाई गई थी?
इसका निर्माण कुतुब शाही और आसफ जाही शासकों के दौर में हुआ था।
क्या यह मस्जिद संरक्षित है?
हां, इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI द्वारा संरक्षित किया गया है और प्रशासन ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
मीनारों के भीतर की बनावट कैसी है?
मीनारों के भीतर का रास्ता बेहद संकरा है और पत्थरों को तराशकर घुमावदार यानी चक्राकार सीढ़ियां बनाई गई हैं।
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