दुनिया भर में मूक और बधिर समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा और उनकी सामाजिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए सांकेतिक भाषा एक जीवन रेखा की तरह काम करती है। इसी महत्व को रेखांकित करने के लिए हर साल 23 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में सांकेतिक भाषा की पहचान को मजबूत करना, मूक-बधिर लोगों के भाषाई अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें बिना किसी भेदभाव के समान अवसर दिलाना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा साल 2017 में इस दिवस को आधिकारिक मान्यता दी गई थी, जिसके बाद वैश्विक स्तर पर पहली बार साल 2018 में इसका आयोजन शुरू हुआ।
आखिर 23 सितंबर की तारीख ही क्यों चुनी गई?
इस विशेष दिन के चयन के पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रम जुड़ा हुआ है। 23 सितंबर 1951 को इटली के रोम शहर में वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ (WFD) की स्थापना की गई थी। यह अंतरराष्ट्रीय संस्था दुनिया भर में मूक-बधिर लोगों के कल्याण, उनके अधिकारों और उनकी सांकेतिक भाषाओं के संरक्षण के लिए काम करने वाला शीर्ष संगठन है। इसी ऐतिहासिक स्थापना दिवस को सम्मान देने और याद रखने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र ने 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांकेतिक भाषा दिवस के रूप में निर्धारित किया।
सांकेतिक भाषा से जुड़े जरूरी और दिलचस्प पहलू
सांकेतिक भाषा को लेकर अक्सर समाज में कई भ्रांतियां रहती हैं। इसके वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए कई अहम तथ्यों को समझना जरूरी है
- पूरी तरह विकसित और स्वतंत्र व्याकरण वाली भाषा: सांकेतिक भाषा केवल हाथों की सामान्य हलचल या इशारों का जमावड़ा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह पूरी तरह से परिपक्व, प्राकृतिक और व्यवस्थित भाषाएं हैं। इनका अपना स्वतंत्र व्याकरण, वाक्य विन्यास और भाषाई नियम होते हैं, जो किसी भी मौखिक भाषा से पूरी तरह अलग और संपन्न हैं।
- दुनिया भर में 300 से अधिक सांकेतिक भाषाएं: यह धारणा पूरी तरह गलत है कि पूरी दुनिया में केवल एक ही तरह की सांकेतिक भाषा चलती है। अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और क्षेत्रों में वहां के समुदायों के अनुसार अपनी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सांकेतिक भाषाएं विकसित हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, विश्व भर में 300 से अधिक विभिन्न सांकेतिक भाषाओं का उपयोग दैनिक जीवन में किया जा रहा है।
- बुनियादी मानवाधिकारों और शिक्षा से सीधा जुड़ाव: सांकेतिक भाषा मूक-बधिर व्यक्तियों के लिए केवल बातचीत का जरिया नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। यह उनकी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सटीक सूचनाओं तक पहुंच और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती है। दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन में भी सांकेतिक भाषाओं के प्रयोग, मान्यता और उनके भाषाई अधिकारों की स्पष्ट वकालत की गई है।
- साल 2018 में पहली बार आधिकारिक रूप से मनाया गया: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 2017 को एक आधिकारिक प्रस्ताव पारित करते हुए 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस घोषित किया था। इस घोषणा के बाद पहली बार वैश्विक स्तर पर 23 सितंबर 2018 को यह दिवस मनाया गया था।
- 75वीं वर्षगांठ और 2026 की विशेष थीम: साल 2026 वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ का ऐतिहासिक वर्ष है। इसी उपलक्ष्य में 2026 के लिए इस दिवस का विषय 'बहरे लोगों के लिए मानवाधिकारों की घोषणा' तय किया गया है। यह वर्ष दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर बने संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के सफर के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।



















