बरसात के मौसम के बाद अक्सर मकानों की छतों, दीवारों के जोड़ों, बालकनी के कोनों अथवा पानी की टंकी के पास पीपल का नन्हा पौधा उगा दिखाई दे जाता है। शुरुआत में भले ही यह छोटा सा अंकुर एकदम हानिरहित और सामान्य नजर आए, परंतु समय बीतने के साथ यह किसी भी पक्के निर्माण के लिए गंभीर सिरदर्द साबित हो सकता है। अधिकांश घरों में लोग ऐसे पौधों को देखते ही कैंची अथवा दरांती से ऊपर से काट देते हैं और यह मान लेते हैं कि समस्या खत्म हो गई। हकीकत यह है कि कुछ ही हफ्तों में उसी स्थान से फिर से नई पत्तियां और टहनियां फूटने लगती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पौधे को ऊपर से छांटने पर उसकी मुख्य जड़ दरार के भीतर सुरक्षित बची रह जाती है, जिसे नमी मिलते ही वह दोबारा सक्रिय हो जाती है। भवन की मजबूती बनाए रखने के लिए केवल पौधे को ऊपर से साफ करना हल नहीं है, बल्कि उसकी आंतरिक जड़ों को नष्ट करना और संबंधित दरार की तकनीकी मरम्मत करना अनिवार्य है।
दीवारों और छतों की दरारों में पीपल उगने की मुख्य वजह
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर बिना बोए सीमेंट और कंक्रीट की संकरी दरारों में पीपल कैसे उग आता है। इसका सबसे बड़ा कारण पक्षी और तेज हवाएं हैं। पक्षी जब पीपल के फल खाते हैं, तो उनकी बीट के जरिए ये अत्यंत महीन बीज ऊंची छतों, छज्जों और पुरानी दीवारों की बारीक झिर्रियों तक पहुंच जाते हैं। इसके अतिरिक्त तेज आंधी और हवा के बहाव के साथ उड़कर भी बीज इन खाली जगहों में फंस जाते हैं। यदि उस स्थान पर थोड़ी सी भी धूल-मिट्टी जमी हो और बारिश या रिसते पानी से हल्की सी नमी मिल जाए, तो पीपल का बीज बड़ी सहजता से अंकुरित हो जाता है। विशेष रूप से पुरानी चिनाई वाली दीवारों, छत के जल निकासी पाइपों के मुहानों और पानी की ओवरहेड टंकी के आसपास का सीलन भरा वातावरण इनके पनपने के लिए बेहद अनुकूल होता है। प्रारंभ में जब पौधा कुछ इंच का होता है, तब मकान मालिक प्रायः लापरवाही बरतते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, पीपल की जड़ें कंक्रीट के भीतर गहराई तक जाल फैला लेती हैं, जिससे दरारें चौड़ी होने लगती हैं। अतः पौधे के विशाल रूप धारण करने की प्रतीक्षा करने के स्थान पर प्रारंभिक अवस्था में ही उसे समूल नष्ट करना बुद्धिमानी है।
नमक, चूना और पिसी फिटकरी का घरेलू उपाय
घरेलू नुस्खों और जीवनशैली से जुड़ी चर्चाओं में ऐसे अनचाहे पौधों को सुखाने के लिए रसोई तथा घर में उपलब्ध कुछ बुनियादी सामग्रियों के इस्तेमाल का सुझाव दिया जाता है। इस विधि में साधारण नमक, बुझा हुआ चूना और बारीक पिसी हुई फिटकरी का संयोजन तैयार किया जाता है। इसके लिए एक गिलास सामान्य पानी में लगभग एक बड़ा चम्मच खाने वाला नमक, एक छोटा चम्मच चूना तथा एक बड़ा चम्मच पिसी फिटकरी डालकर एक गाढ़ा घोल बना लिया जाता है। इस तरल मिश्रण को अच्छी तरह घोलने के उपरांत सीधे पौधे के तने के निचले हिस्से अथवा आधार स्थल पर डालने की सलाह दी जाती है। हालांकि, भवन विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के घरेलू घोल को कोई वैज्ञानिक रूप से शत-प्रतिशत प्रमाणित समाधान नहीं माना जाना चाहिए जो हर परिस्थिति में सबसे गहरी जड़ों को पूरी तरह समाप्त कर ही दे। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि चूना और नमक का अत्यधिक तीखा घोल आसपास के प्लास्टर, रंग-रोगन अथवा निर्माण सामग्री को नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसलिए इसका प्रयोग करते समय सतह की प्रकृति का आकलन अवश्य कर लेना चाहिए।
घोल का प्रयोग करते समय जरूरी सावधानियां और सुरक्षा
यदि पौधा बहुत छोटा है और दरार अभी उथली है, तो इस मिश्रण को डालने से पहले पौधे के तने के आसपास जमी ढीली मिट्टी, काई और कचरे को किसी पतले औजार से बेहद सावधानीपूर्वक साफ कर लें। जब जड़ का मुहाना साफ दिखाई देने लगे, तभी तरल मिश्रण को केवल पौधे के आधार वाले हिस्से में बूंद-बूंद करके डालें। ध्यान रहे कि यह रासायनिक घोल आसपास लगी टाइल्स, बालकनी की लोहे अथवा एल्युमिनियम की ग्रिल, सजावटी पेंट या पास रखे गमलों के पौधों पर बिल्कुल न गिरे। चूना और फिटकरी त्वचा के लिए दाहक हो सकते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया को करते समय हाथों में रबर के दस्ताने पहनना अत्यंत सुरक्षित रहता है। घोल बनाते और डालते समय आंखों को सुरक्षित रखें और त्वचा के सीधे संपर्क से बचें। यदि घर में छोटे बच्चे या पालतू जानवर मौजूद हैं, तो जब तक वह स्थान पूरी तरह सूख न जाए, उन्हें उस हिस्से से बिल्कुल दूर रखना चाहिए।
सिर्फ ऊपरी टहनी काटना क्यों विफल साबित होता है
मकान मालिक अक्सर पौधे को सतह के बराबर काटकर तसल्ली कर लेते हैं, लेकिन पीपल की जैविक संरचना ऐसी होती है कि उसकी कटी हुई शाखा के नीचे की जड़ जीवित बनी रहती है। दरार के अंधेरे में छिपा हुआ तने का अवशिष्ट हिस्सा कुछ ही दिनों में नई कलियां विकसित कर लेता है। इसी वजह से केवल ऊपरी हिस्से की छंटाई करना समस्या को टालना भर है, उसका समाधान नहीं। यदि घरेलू उपाय के बाद पौधा सूख जाता है, तो उस जगह की बारीकी से जांच करनी चाहिए। यदि पौधे की जड़ें दीवार के बहुत अंदर तक धंस चुकी हैं, तो उसे अपने हाथ से जबरन खींचकर निकालने का जोखिम न लें। अनगढ़ तरीके से खींचने पर पुरानी दीवार की ईंटें ढीली हो सकती हैं, प्लास्टर उखड़ सकता है अथवा छत की वॉटरप्रूफिंग परत फट सकती है। ऐसी गंभीर स्थिति में किसी अनुभवी राजमिस्त्री या भवन मरम्मत विशेषज्ञ को बुलाकर वैज्ञानिक पद्धति से दरार को खोलना और जड़ को निकालना ही उचित कदम होता है।
भविष्य में दोबारा फैलाव रोकने के लिए दरारों की पक्की मरम्मत
पौधे और उसकी जड़ों को सफलतापूर्वक हटाने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण उस खुली दरार की तकनीकी सीलिंग करना है। यदि दरार खुली रह गई, तो अगली बारिश में दोबारा कोई नया बीज वहां आकर जम जाएगा। बारीक और छोटी दरारों को भरने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले सीमेंट आधारित ग्राउट अथवा विशेष वॉटरप्रूफ रिपेयर सामग्री का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि दरार गहरी या लंबी है, तो पहले यह जांचना जरूरी है कि कहीं वहां पानी का निरंतर रिसाव तो नहीं हो रहा है। बरसात का मौसम समाप्त होते ही पूरी छत, पैरापेट वॉल और बाहरी दीवारों का नियमित निरीक्षण करें। जिन जगहों पर बरसात का पानी ठहरता हो या पानी की टंकी से बूंद-बूंद पानी टपकता हो, वहां तुरंत मरम्मत कराएं ताकि सीलन पूरी तरह समाप्त हो सके। पानी की टंकियों के किनारों और ड्रेनेज आउटलेट की लगातार साफ-सफाई रखने से पक्षियों द्वारा गिराए गए बीजों को अंकुरित होने का मौका ही नहीं मिलता।

















