इंटरनेट की दुनिया में हर कुछ दिनों में नए शब्द और ट्रेंड्स तेजी से उभरते हैं। '6-7' और 'लुक्समैक्सिंग' जैसे वायरल ट्रेंड्स से लेकर बीते सालों में सामने आए एनएफटी और क्लबहाउस जैसे ऑडियो चैट ऐप्स तक, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लगातार नई चीजें सामने आती रहती हैं। तकनीक के पैरोकारों ने कभी एनएफटी को भविष्य का निवेश और क्लबहाउस को सोशल मीडिया का नया दौर बताया था, लेकिन ये दोनों ही ट्रेंड्स तेजी से फीके पड़ गए। न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी (एनवाईयू) के साइबर-एथ्नोग्राफर और मीडिया थ्योरी शोधकर्ता रुबी थेलॉट का मानना है कि आज इंटरनेट पर ट्रेंड्स को लेकर हमारी समझ बुनियादी तौर पर गलत हो चुकी है। उनका कहना है कि इंटरनेट कई छोटे-छोटे 'डिजिटल द्वीपों' में बंट चुका है, जहां वायरल दिख रही ज्यादातर चीजें वास्तव में यूज़र्स पर जबरन थोपी गई खपत का नतीजा होती हैं। आज वायरालिटी आम जनता के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग डिजिटल प्रांतों के बीच सिमटकर रह गई है। इस पतझड़ में अपनी किताब 'इन डिफेंस ऑफ बीइंग-ऑन-लाइन' ला रहे थेलॉट ने वायरालिटी के पैमानों, डेटिंग बर्नआउट के सच और एआई के भविष्य को लेकर गहराई से अपनी बात रखी है।
गुडहार्ट का नियम और वायरालिटी का असली सच
डिजिटल संस्कृति को समझने में सबसे बड़ी समस्या यह आ रही है कि जिस वायरालिटी को कभी जनता की पसंद का जरिया माना जाता था, अब वही खुद में एक लक्ष्य बन चुकी है। ब्रिटिश अर्थशास्त्री चार्ल्स गुडहार्ट के सिद्धांत 'गुडहार्ट्स लॉ' के अनुसार, जब कोई पैमाना खुद एक लक्ष्य बन जाता है, तो वह एक बेहतर पैमाना नहीं रह जाता। आज के समय में कंटेंट और मीडिया को सिर्फ इसलिए डिजाइन किया जा रहा है ताकि किसी तरह ज्यादा से ज्यादा व्यूज हासिल किए जा सकें। इस होड़ में कंटेंट के अंतर्निहित सांस्कृतिक मूल्य और उसकी गुणवत्ता की पूरी तरह अनदेखी कर दी जाती है। यही अंतर्निहित मूल्य किसी भी ट्रेंड को समाज में लंबे समय तक टिके रहने की ताकत देता है। क्योंकि मीडिया उद्योग गुडहार्ट के नियम के प्रभाव में बहुत गहराई तक चला गया है, इसलिए आज किसी भी कंटेंट की कृत्रिम वायरालिटी तो गढ़ी जा सकती है, लेकिन वह कभी वास्तविक लोक संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाती।
डेटिंग ऐप बर्नआउट और हेट्रोपेसिमिज्म का मिथक
पिछले कुछ सालों में डेटिंग ऐप बर्नआउट यानी यूज़र्स की थकान की खबरें लगातार चर्चा में रही हैं। इसी दबाव के चलते बम्बल जैसी कंपनियों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रीब्रांडिंग शुरू की और मई के महीने में यूज़र्स को वापस खींचने के लिए अपना मशहूर स्वाइप फीचर खत्म करने का ऐलान कर दिया। लेकिन रुबी थेलॉट के मुताबिक बर्नआउट का यह पूरा नैरेटिव एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। साल 2019 से 'हेट्रोपेसिमिज्म' यानी पुरुषों और महिलाओं के बीच डेटिंग को लेकर फैली निराशा पर बातें लिखी जा रही हैं। इस निराशा को समझने के लिए जब न्यू यॉर्क टाइम्स में 'देअर्स नथिंग रॉन्ग विद वांटिंग मेन' जैसा लेख आया, तो उससे यह साफ हुआ कि समाज में इस विषय पर एक खास तरह की बैचैनी महसूस की जा रही थी।
इस नैरेटिव की हकीकत परखने के लिए इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर 10 लाख से ज्यादा व्यूज वाले लगभग 1,000 वीडियो का गहन विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन का मकसद यह जानना था कि क्या वाकई नकारात्मकता इतनी ज्यादा है। जांच में सामने आया कि नकारात्मक विचारों वाले कंटेंट की हिस्सेदारी महज 25 प्रतिशत के आसपास ही मंडराती रही। इसके अलावा विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम में भी अंतर देखा गया, जहां X जैसे प्लेटफॉर्म्स पर थोड़ा ज्यादा नकारात्मक माहौल बनता है। इस अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृति और मीडिया के लेखकों ने हेट्रोपेसिमिज्म की समस्या को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है, जबकि वास्तविक डेटा कुछ और ही कहानी बयां करता है।
प्रेडिक्शन मार्केट्स और पुरुषों के बीच सामाजिक जुड़ाव का जरिया
इन दिनों प्रेडिक्शन मार्केट्स यानी सट्टेबाजी के डिजिटल मंचों की लोकप्रियता में भारी उछाल देखा जा रहा है। कालशी और पॉलीमार्केट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर युवा बड़े पैमाने पर सट्टा लगा रहे हैं। वे बैड बनी के सुपर बाउल हाफटाइम शो के प्रदर्शन से लेकर ओरेगॉन के जंगलों में लगी आग तक हर विषय पर दांव लगा रहे हैं। रुबी थेलॉट ने साल 2020 से 2024 के बीच मीम कॉइन्स में ट्रेडिंग करने वाले नौजवानों के समूहों का अध्ययन किया। उनका कहना है कि यह प्रवृत्ति भी काफी हद तक सट्टेबाजी जैसी ही है, लेकिन इसे सिर्फ एक व्यक्तिगत वित्तीय गतिविधि के रूप में देखना गलत होगा।
यह सट्टेबाजी ग्रुप चैट्स के भीतर होती है, जिन्हें यूज़र्स आपस में 'द ट्रेंचेज' यानी मोर्चे का नाम देते हैं। इन ग्रुप्स में युवा साथी आपस में जानकारी साझा करते हैं, एक साथ दांव लगाते हैं और नुकसान भी एक साथ ही झेलते हैं। पुरुषों में अकेलेपन की बढ़ती समस्या के बीच यह साझा सट्टेबाजी एक अनोखे और दिलचस्प सामाजिक जुड़ाव का जरिया बन चुकी है। प्रेडिक्शन मार्केट्स सिर्फ वित्तीय उपकरण नहीं हैं, बल्कि यह संस्कृति में भागीदारी का एक साधन बन चुके हैं। स्क्रीन पर दिन में 8 घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले यूज़र्स के लिए मुख्य सवाल सिर्फ पैसे कमाना नहीं होता, बल्कि उस ट्रेंड या घटना के करीब पहुंचना होता है। इस वित्तीय माहौल में दांव का नतीजा उतना मायने नहीं रखता, जितना कि बेट लगाने के जरिए मीडिया और ट्रेंड्स के करीब पहुंचने का अहसास मायने रखता है।
एआई का भ्रम और इंसानी बुद्धिमत्ता के अनदेखे पहलू
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जिस तेजी से दुनिया को बदल रहा है, उसे लेकर कई तरह की भविष्यवाणियां की जा रही हैं। लेकिन थेलॉट का मानना है कि 10 साल बाद लोग इन कयामत की आशंकाओं पर हंसेंगे। उनका स्पष्ट कहना है कि AI दुनिया का अंत नहीं करने जा रहा है, क्योंकि दुनिया की असली समस्याएं बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से अटकी हुई नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर अधिकांश संकट बड़े जनसमूहों के बीच सहयोग, समन्वय और साझा लक्ष्यों पर सहमति न बन पाने की वजह से हैं। इसके अलावा जब हम बुद्धिमत्ता को केवल एक संख्या या पैमाने में मापने लगते हैं, तो फिर से गुडहार्ट का नियम लागू हो जाता है।
बुद्धिमत्ता को सबसे शक्तिशाली मानने की सोच ऐतिहासिक रूप से सुजनन विज्ञान (यूजेनिक्स) के जनक सर फ्रांसिस गाल्टन की अवधारणा से मिलती-जुलती है, जिनका मानना था कि दुनिया में कुछ खास लोग ही सबसे ज्यादा बुद्धिमान होते हैं। आज एआई के समर्थक अपनी उसी व्यक्तिगत पसंद को सुपरइंटेलिजेंस पर थोप रहे हैं, जो दार्शनिक रूप से गलत और खतरनाक है। फ्रांसीसी दार्शनिक गिलबर्ट सिमोंडन के सिद्धांतों का हवाला देते हुए थेलॉट बताते हैं कि हर नई तकनीकी प्रगति के साथ कुछ मानवीय मूल्य पीछे छूट जाते हैं। आज केवल तार्किक क्षमता को मापने के चक्कर में हम भावनात्मक बुद्धिमत्ता, शारीरिक समझ और कलात्मक मेधा जैसी विशुद्ध इंसानी क्षमताओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिन्हें मौजूदा डिजिटल सिस्टम माप नहीं सकते।



















