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छोटे पर्दे को कूड़ादान कहे जाने पर बोले चेतन हंसराज, टीवी अभिनेताओं की क्षमता सिनेमाई कलाकारों से किसी मायने में कम नहींटीवी
20 सित॰ 2026, 1:39 am (39 दिन पहले)· 2

छोटे पर्दे को कूड़ादान कहे जाने पर बोले चेतन हंसराज, टीवी अभिनेताओं की क्षमता सिनेमाई कलाकारों से किसी मायने में कम नहीं

टेलीविजन को कमतर माध्यम बताने वाली टिप्पणी पर चेतन हंसराज ने असहमति जताते हुए कहा कि छोटे पर्दे के कलाकारों में अभिनय की जबरदस्त समझ होती है।

टेलीविजन जगत में लंबे समय से सक्रिय अभिनेता चेतन हंसराज ने अपने साथी कलाकार रोहित रॉय की उस टिप्पणी पर स्पष्ट ऐतराज जताया है, जिसमें छोटे पर्दे को एक तरह से कचरा माध्यम करार दिया गया था। बी आर चोपड़ा के पौराणिक धारावाहिक महाभारत में बाल बलराम की भूमिका से पहचान बनाने वाले चेतन ने साफ शब्दों में कहा कि टीवी कलाकारों की अभिनय क्षमता को सिनेमाई कलाकारों के मुकाबले कमतर आंकना पूरी तरह गलत है। हालांकि उन्होंने दोनों के बीच की मित्रता को स्वीकार किया, लेकिन इस बात पर हैरानी जताई कि रोहित के मन में इस तरह का विचार आखिर क्यों आया।

कंटेंट में दोहराव जरूर, पर माध्यम को खारिज करना अनुचित

चेतन हंसराज ने रचनात्मक स्तर पर आ रही दिक्कतों को रेखांकित करते हुए माना कि छोटे पर्दे पर नयापन थम सा गया है। उनके अनुसार विभिन्न धारावाहिकों में बार-बार एक ही तरह के विषय और कहानियां परोसी जा रही हैं, जिससे रचनात्मकता का स्तर पहले जैसा नहीं दिख रहा। इसके बावजूद उनका कहना है कि इस वजह से पूरे माध्यम को निरर्थक या बेकार करार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि आज भी अनगिनत दर्शक धारावाहिकों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं।

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निर्माताओं और चैनलों को नए प्रयोग करने की जरूरत

धारावाहिकों के मौजूदा हाल के लिए चेतन ने सीधे तौर पर टीवी चैनलों और शो निर्माताओं के दृष्टिकोण को जिम्मेदार ठहराया। उनका तर्क है कि दर्शक नई सोच और अलग मिजाज की पटकथाओं को अपनाने के लिए पूरी तरह उत्सुक हैं, लेकिन उन्हें वह विविधता उपलब्ध नहीं कराई जा रही। यदि निर्माता नए विचारों के साथ प्रयोग करने का साहस दिखाएं, तो टीवी के पास आगे बढ़ने और खुद को नए सिरे से स्थापित करने की पूरी संभावना मौजूद है।

गरिमा और शालीनता हर मंच पर व्यक्तिगत चुनाव

रोहित रॉय की ओर से टीवी कलाकारों में शालीनता और स्तर की कमी का मुद्दा उठाए जाने पर भी चेतन ने कड़ा रुख अपनाया। चेतन के मुताबिक हर पेशे में अलग-अलग मिजाज के लोग होते हैं, जहां कुछ कलाकार चर्चा बटोरने के लिए अजीब हरकतें कर सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि पूरे समुदाय को उसी नजरिए से देखा जाए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि छोटे पर्दे पर काम करने वाले अधिकांश कलाकार बेहद गरिमा और मर्यादा के साथ काम करते हैं, और उन्होंने स्वयं भी हमेशा इसी गरिमा को बनाए रखा है।

दबाव में काम करने से निखरती है टीवी कलाकारों की कला

चेतन हंसराज ने टीवी कलाकारों के कौशल का जोरदार बचाव करते हुए कहा कि यदि किसी टीवी अभिनेता और फिल्म अभिनेता को एक जैसी पटकथा दी जाए, तो टीवी कलाकार उसे कहीं अधिक सहजता और गहराई से निभा सकता है। छोटे पर्दे पर कलाकारों को बेहद सीमित समय और लगातार शूटिंग के भारी दबाव में किरदार को जीवंत करना होता है, जो उनकी अभिनय क्षमता को मजबूत बनाता है। इसके अलावा उन्होंने फिल्मों में मिलने वाले व्यापक प्रचार और बड़े बजट की चर्चा करते हुए कहा कि फिल्मी सितारों की चमक के पीछे उनकी बड़ी पीआर मशीनरी का हाथ होता है, जिसे टीवी कलाकारों के वास्तविक हुनर से तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।

आगामी प्रोजेक्ट्स में बड़े कलाकारों के साथ दिखेंगे चेतन

अभिनय के मोर्चे पर चेतन हंसराज आने वाले दिनों में निर्देशक नितेश तिवारी की बहुचर्चित फिल्म रामायण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई देंगे। इस बड़े बजट की पौराणिक फिल्म में रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश जैसे प्रमुख सितारे मुख्य किरदारों में नजर आने वाले हैं।

सवाल-जवाब

रोहित रॉय के बयान पर चेतन हंसराज ने क्या कहा?
चेतन हंसराज ने कहा कि टीवी कोई डस्टबिन माध्यम नहीं है और टीवी कलाकारों की अभिनय क्षमता किसी भी फिल्म कलाकार से कम नहीं होती।
चेतन हंसराज ने टीवी पर रचनात्मकता में कमी का क्या कारण बताया?
उन्होंने इसका जिम्मेदार शो निर्माताओं और चैनलों को बताया, जो दर्शकों को नया कंटेंट देने और प्रयोग करने से बचते हैं।
चेतन हंसराज ने टीवी कलाकारों की तुलना फिल्म स्टार्स से कैसे की?
उन्होंने कहा कि एक जैसी लाइनों पर टीवी कलाकार अधिक दबाव और कम समय में काम करने की आदत के कारण बेहतर परफॉर्मेंस दे सकते हैं।
चेतन हंसराज का अभिनय सफर कहां से शुरू हुआ था?
चेतन हंसराज ने अपने करियर की शुरुआत बी आर चोपड़ा के प्रसिद्ध धारावाहिक महाभारत में बाल बलराम का किरदार निभाकर की थी।
चेतन हंसराज किस आगामी फिल्म में नजर आने वाले हैं?
वह नितेश तिवारी की फिल्म रामायण में दिखाई देंगे, जिसमें रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश मुख्य भूमिकाओं में हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·38 दिन पहले

मनोरंजन उद्योग में सिनेमा और टेलीविजन के बीच की यह बहस रचनात्मक दिशा और आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच गहरे तनाव को उजागर करती है। जिस तरह ऊर्जा बाज़ार में पारंपरिक और उभरते स्रोतों के बीच संतुलन की तलाश होती है, उसी तरह मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं और बजट प्रबंधन के बीच सामंजस्य बिठाना होगा। यदि निर्माता जोखिम उठाकर नए प्रयोग नहीं करेंगे, तो यह माध्यम अपनी प्रासंगिकता और दर्शक वर्ग खो सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

मनोरंजन जगत की यह बहस केवल दो माध्यमों की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सांस्कृतिक बाजारों में दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं और मीडिया उपभोग के तरीकों को भी प्रभावित करती है। जिस प्रकार क्षेत्रीय राजनीति और लोक नीति में जनता के तात्कालिक दबाव और नीतिगत बदलावों के बीच संतुलन ज़रूरी होता है, उसी तरह टेलीविज़न निर्माताओं को भी बिना किसी देरी के अपनी सामग्री में रचनात्मक सुधार करने होंगे। यदि समय रहते दर्शकों की बदलती रुचि और अपेक्षाओं के अनुरूप प्रयोग नहीं किए गए, तो उत्तर प्रदेश और देश के अन्य बड़े दर्शक वर्गों में इस माध्यम की पकड़ तेजी से कमजोर हो सकती है, जिसका सीधा असर मनोरंजन उद्योग की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ेगा।

Ananya Iyer@ananya-iyer·38 दिन पहले

रोहित रॉय और चेतन हंसराज के बीच छिड़ी इस बहस से टेलीविजन बनाम सिनेमा की पुरानी बहस एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। ओटीटी के दौर में जहाँ पारंपरिक टीवी दर्शकों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है, वहीं इस तरह की चर्चाएँ माध्यम के आत्मविश्लेषण की मांग करती हैं। यदि निर्माता दैनिक धारावाहिकों में लीक से हटकर कंटेट पेश नहीं करते हैं, तो वे तेजी से बदलते दर्शकों को खो सकते हैं।

Tanvi Desai@tanvi-desai·38 दिन पहले

अनन्या के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते दबदबे के कारण पारंपरिक टेलीविजन अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। जब इंडस्ट्री के अपने ही सीनियर कलाकार इस माध्यम की कमियों और सीमाओं पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते हैं, तो यह सीधे तौर पर टीवी चैनलों की प्रोग्रामिंग रणनीति पर बड़ा प्रहार है। आज का दर्शक डिजिटल स्पेस में बेबाक और लीक से हटकर कहानियाँ देख रहा है, इसलिए दैनिक धारावाहिकों के निर्माताओं के लिए यह आत्ममंथन का सटीक क्षण है कि वे घिसी-पिटी पटकथाओं से बाहर निकलकर कुछ नया पेश करें, अन्यथा यह अंतर और गहराता जाएगा।

Aisha Khan@aisha-khan·38 दिन पहले

चेतन हंसराज की यह टिप्पणी उस पुरानी बहस को फिर हवा देती है जो अक्सर बड़े और छोटे पर्दे के बीच चलती रहती है। टीवी का दैनिक प्रसारण चक्र कलाकारों को जिस तरह की मानसिक और शारीरिक परीक्षा से गुजारता है, वह उनकी तकनीकी दक्षता को सिनेमाई कलाकारों से अधिक पैना बना देता है। हालांकि, समस्या अब केवल दोहरावदार पटकथाओं की नहीं, बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के उभार के बाद दर्शकों के बदलते स्वाद की है। अगर पारंपरिक चैनल समय रहते अपनी शैली नहीं बदलते, तो केवल कलाकारों के कौशल के भरोसे इस माध्यम का वजूद बचाए रखना निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा।

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