उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का न्यायिक इतिहास करीब 80 साल पुराना है और इसकी शुरुआत आजादी के बाद 11 मार्च 1956 से मानी जाती है, जब यह जिला फैजाबाद की जजशिप से अलग होकर अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाया। सुल्तानपुर को यह दर्जा कैसे मिला और उससे पहले यहां किस तरह की अदालती व्यवस्था चलती थी, इसे समझने के लिए करीब सवा सौ साल पीछे जाना पड़ता है।
1902 में बंटा था दीवानी मामलों का जिम्मा
सुल्तानपुर गजेटियर 1903 के हवाले से पता चलता है कि 1902 में दीवानी मामलों की सुनवाई के लिए यहां दो मुंसिफ नियुक्त किए गए थे। इनमें मुंसिफ उत्तरी के पास सुल्तानपुर और कादीपुर तहसीलों के मामले आते थे, जबकि मुंसिफ दक्षिणी के जिम्मे अमेठी और मुसाफिरखाना तहसीलों की जिम्मेदारी थी। यानी उस दौर में भी जिले के दीवानी विवादों को भौगोलिक आधार पर दो हिस्सों में बांटकर निपटाया जाता था।
फैजाबाद के जिला जज के अधीन थी अदालत
वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना के मुताबिक, उस समय सुल्तानपुर की जजशिप स्वतंत्र नहीं थी, बल्कि फैजाबाद के जिला जज के अधीन काम करती थी। फैजाबाद के जिला जज खुद यहां आकर समय-समय पर कैंप लगाते और स्थानीय मामलों की सुनवाई करते थे। उनकी मदद के लिए सुल्तानपुर में एक सहायक जज की भी तैनाती की गई थी, जो रोजमर्रा के मामलों को संभालता था। इससे साफ है कि आजादी से पहले सुल्तानपुर की न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह फैजाबाद पर निर्भर थी।
आजादी के बाद अलग हुई जजशिप, ताराचंद्र कपूर बने पहले जिला जज
देश आजाद होने के बाद सुल्तानपुर की जजशिप को फैजाबाद से अलग करने का फैसला लिया गया और यह व्यवस्था 11 मार्च 1956 से सुल्तानपुर में लागू हुई। इसके बाद स्वर्गीय ताराचंद्र कपूर को सुल्तानपुर का पहला जिला जज बनाया गया और उन्होंने 28 जुलाई 1956 को औपचारिक रूप से अपना कार्यभार संभाला। यह तारीख सुल्तानपुर के न्यायिक इतिहास में एक अहम मोड़ मानी जाती है, क्योंकि इसी के साथ जिले को अपनी स्वतंत्र न्यायिक पहचान मिली।
ताल्लुकेदारों को मिला था ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का अधिकार
न्यायिक व्यवस्था सिर्फ सरकारी अदालतों तक सीमित नहीं थी। अंग्रेजों की ओर से राजा कुड़वार, हसनपुर और दियरा के साथ ही शाहगंढ़ और बरौलिया के ताल्लुकेदारों को भी अपनी रियासतों से जुड़े मामलों की सुनवाई और फैसला सुनाने का अधिकार दिया गया था। इन्हें ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का दर्जा हासिल था। इसके अलावा राजा साहब कुड़वार आनरेरी मुंसिफ भी हुआ करते थे और उन्हें परगना मीरानपुर और बरौंसा से जुड़े छोटे सिविल वादों को निपटाने का विशेष अधिकार मिला हुआ था।
पुलिस से लेकर स्कूल तक, यह था प्रशासनिक ढांचा
उस दौर में जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक कामकाज संभालने के लिए कई अन्य सरकारी अधिकारी भी तैनात थे। इनमें पुलिस सुपरिटेंडेंट, जिला सर्वेयर, सिविल सर्जन और दो सहायक सर्जन शामिल थे। इसके साथ ही चार तहसीलदार, नमक कर अधीक्षक, पोस्टमास्टर सहायक, ओपीएम एजेंट और गवर्नमेंट स्कूल के हेडमास्टर भी अपनी जिम्मेदारियां निभाते थे। यह पूरा तंत्र जिले में कानून व्यवस्था बनाए रखने और जनता के हितों की रक्षा के लिए काम करता था।











