गाजीपुर में मिट्टी की सेहत को बचाने और इंसानी स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष मुहिम की शुरुआत की गई है। 'खेत बचाओ अभियान' के तहत स्थानीय किसानों को पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक खेती अपनाने के बेहतरीन गुर सिखाए जा रहे हैं। रासायनिक खादों और विषैले कीटनाशकों के अत्यधिक तथा अनियंत्रित इस्तेमाल से खेतों की उपजाऊ शक्ति लगातार घट रही है, जिसे रोकने के लिए यह अनूठी पहल की गई है। इस सामूहिक प्रयास में जिले के कई प्रमुख कृषि संस्थान और सरकारी विभाग एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि किसानों को जागरूक किया जा सके।
सस्टेनेबल फार्मिंग के लिए कई विभागों ने मिलाया हाथ
इस बड़े जागरूकता अभियान में कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर, पीजी कॉलेज का कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र आंकुशपुर, उद्यान विभाग और मत्स्य विभाग संयुक्त रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये सभी सरकारी और शैक्षणिक संस्थान मिलकर ग्रामीण इलाकों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इनका उद्देश्य किसानों को ऐसी सरल और स्वदेशी तकनीकें सिखाना है जिससे खेती की लागत कम हो, रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटे और पैदावार की गुणवत्ता में सुधार हो।
फसल चक्र अपनाकर सुधारे मिट्टी की सेहत
कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर के कृषि विशेषज्ञ डॉ. ओमकार सिंह ने बताया कि किसानों को अपने खेतों में फसल चक्र यानी क्रॉप रोटेशन की पद्धति को अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए। इसका सीधा मतलब यह है कि हर सीजन में खेत में एक ही तरह की फसल उगाने के बजाय बदल-बदल कर अलग-अलग प्रजातियों की फसलें बोनी चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी में मौजूद जरूरी पोषक तत्वों का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। साथ ही, फसलों में कीड़े लगने और तरह-तरह की बीमारियों के फैलने का खतरा भी बहुत हद तक कम हो जाता है।
हरी खाद और जैविक तत्वों से यूरिया की जरूरत होगी खत्म
मिट्टी की गुणवत्ता को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखने के लिए हरी खाद और दलहनी फसलें सबसे मददगार साबित होती हैं। डॉ. सिंह के अनुसार, ढैंचा, सनई, उड़द और मूंग जैसी फसलें मिट्टी को प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन प्रदान करने का काम करती हैं। इनके नियमित इस्तेमाल से खेतों में कृत्रिम और महंगे यूरिया की आवश्यकता बेहद कम रह जाती है। इसके अलावा, गोबर की खाद और केंचुए से तैयार की जाने वाली वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा को बढ़ाता है। यह ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी में मौजूद उन अत्यंत लाभकारी सूक्ष्म जीवों को सक्रिय करता है जो जमीन को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाए रखने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।
रसायनों के स्थान पर अपनाएं ये प्राकृतिक कीटनाशक
खतरनाक रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर किसान कई तरह के घरेलू और प्राकृतिक हर्बल विकल्पों का सहारा ले सकते हैं। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए खेतों के आसपास भांग और अरंडी जैसी वनस्पतियों के इस्तेमाल से तैयार नुस्खे बेहद असरदार होते हैं। ये प्राकृतिक उपाय रासायनिक दवाओं पर होने वाले खर्च और उनके दुष्प्रभावों को खत्म करते हैं। इसके अलावा, यदि फसल में शुरुआती दौर में फंगस यानी फफूंद जनित बीमारियों के लक्षण दिखाई देते हैं, तो पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए मट्ठे के घोल का छिड़काव किया जा सकता है। हालांकि, मट्ठे का उपयोग किस मात्रा में और कैसे करना है, इसके लिए किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह जरूर लेनी चाहिए।
उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण को मिलेगा सीधा लाभ
इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक किसानी को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है। जब खेतों में रासायनिक खादों और सिंथेटिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होगा, तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति हमेशा बनी रहेगी और उसमें रहने वाले मित्र कीट और सूक्ष्म जीव भी सुरक्षित रहेंगे। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा आम उपभोक्ताओं को मिलेगा, क्योंकि बाजार में मिलने वाले फल, सब्जियों और अनाजों में हानिकारक रसायनों के अंश नहीं बचेंगे, जिससे लोगों की सेहत बेहतर बनी रहेगी।













