बारिश शुरू होते ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर समेत गन्ना बेल्ट के कई जिलों में किसानों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि खेतों में पोक्का बोइंग नाम की एक खतरनाक फफूंद बीमारी तेजी से पैर पसार रही है. यह बीमारी गन्ने की ऊपरी पत्तियों को सबसे पहले निशाना बनाती है और अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो पूरी फसल की पैदावार और गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर डाल सकती है.
नमी बढ़ते ही तेजी से फैलता है फंगस
शाहजहांपुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन खान के मुताबिक, पोक्का बोइंग एक फफूंद जनित रोग है, जिसका प्रकोप बरसात के मौसम में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. दरअसल इन दिनों हवा में नमी का स्तर बहुत ऊंचा रहता है, और यही नमी फफूंद को पनपने और तेजी से फैलने के लिए सबसे अनुकूल माहौल दे देती है. डॉ. खान का कहना है कि गन्ना किसानों को इस मौसम में अपनी फसल पर पैनी नजर रखनी चाहिए, ताकि बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखते ही समय पर प्रबंधन किया जा सके और फसल को बचाया जा सके.
चूड़ी जैसी मुड़ी पत्तियां और सिरके जैसी गंध, ऐसे पहचानें रोग
इस बीमारी की पहचान बेहद आसान है. शुरुआत में गन्ने की ऊपरी पत्तियों में ऐंठन आने लगती है और वे चूड़ी या घुमावदार आकार में मुड़ जाती हैं. डॉ. खान बताते हैं कि अगर इस स्टेज पर किसान सतर्क नहीं हुए और संक्रमण बढ़ता चला गया, तो प्रभावित पत्तियों से सिरके जैसी तीखी और तेज गंध आने लगती है. यह गंध दरअसल इस बात का संकेत होती है कि बीमारी अब उग्र रूप ले चुकी है और फसल को तुरंत उपचार की जरूरत है.
कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव बना सबसे कारगर उपाय
पोक्का बोइंग रोग से गन्ने की फसल को बचाने के लिए रासायनिक उपचार सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है. डॉ. खान की सलाह है कि किसान कॉपर ऑक्सीक्लोराइड नाम के फंगीसाइड का इस्तेमाल करें. इसके लिए 3 ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी में घोलकर घोल तैयार करना चाहिए और फिर इसे प्रभावित पौधों पर अच्छी तरह छिड़कना चाहिए. यह फंगीसाइड फंगस के आगे बढ़ने की रफ्तार को तुरंत रोक देता है, जिससे स्वस्थ हिस्सों तक बीमारी पहुंचने से पहले ही उस पर लगाम लग जाती है.
संक्रमित हिस्सों को खेत में नहीं, गड्ढे में दबाना जरूरी
डॉ. खान के मुताबिक सिर्फ दवा का छिड़काव कर देना ही काफी नहीं है, खेतों की नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी है. अगर खेत में कुछ गिने-चुने पौधों पर ही पोक्का बोइंग के लक्षण नजर आएं, तो उन पौधों के संक्रमित हिस्सों को नीचे से सावधानी के साथ काट लेना चाहिए. चूंकि यह फफूंद जनित बीमारी है, इसलिए इन कटे हुए हिस्सों को खेत में खुला छोड़ना बड़ी भूल होगी. इसकी बजाय इन्हें एक बड़ी पॉलीथीन थैली में इकट्ठा कर लेना चाहिए, ताकि हवा के जरिए फंगस और उसके बीजाणु आसपास के स्वस्थ पौधों तक न पहुंच पाएं.
इसके बाद इस पॉलीथीन में इकट्ठे किए गए संक्रमित अवशेषों को गन्ने के मुख्य खेत से काफी दूर ले जाना चाहिए. वहां करीब दो से तीन फीट गहरा गड्ढा खोदकर इन्हें उसमें दबा देना चाहिए. डॉ. खान बताते हैं कि गड्ढे को मिट्टी से भरने से पहले उसमें थोड़ा कार्बेन्डाजिम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड फंगीसाइड जरूर छिड़क देना चाहिए. ऐसा करने से गड्ढे में मौजूद फंगस के स्पोर्स और मायसैलियम पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, जिससे यह बीमारी दोबारा खेत में सिर नहीं उठा पाती.
समय रहते कदम उठाना ही सबसे बड़ा बचाव
डॉ. खान का साफ कहना है कि पोक्का बोइंग रोग को नजरअंदाज करना गन्ना किसानों को भारी नुकसान में डाल सकता है, क्योंकि यह बीमारी न सिर्फ पैदावार घटाती है, बल्कि गन्ने की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है. इसलिए बरसात के मौसम में खेतों का लगातार निरीक्षण, लक्षण दिखते ही कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव और संक्रमित हिस्सों का सही तरीके से निपटान, ये तीनों कदम मिलकर ही किसानों को इस बीमारी से फसल को सुरक्षित रखने में मदद कर सकते हैं.



















