दलहनी फसलों में उड़द की खेती किसानों के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है, बशर्ते वैज्ञानिक तरीकों और सटीक प्रबंधन को अपनाया जाए। मुरादाबाद क्षेत्र के कृषि परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, उड़द की अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए मिट्टी के चयन से लेकर कटाई पूर्व पोषण तक हर चरण में सावधानी बरतना आवश्यक है। सही रणनीति अपनाने से न केवल फसल को रोगों से बचाया जा सकता है, बल्कि प्रति एकड़ उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
उन्नत किस्मों का चुनाव और मिट्टी का चयन
उड़द की सफल खेती की पहली सीढ़ी सही खेत और गुणवत्तापूर्ण बीजों का चुनाव है। किसानों को हमेशा अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि का ही चयन करना चाहिए, जहां पानी का भराव न हो। बुवाई के लिए अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल, उच्च उत्पादन देने वाली और रोग प्रतिरोधी किस्मों के प्रमाणित बीज ही खरीदने चाहिए। इस क्रम में पंत यू-31, पीयू-31, टी-9 और पंत यू-19 जैसी उन्नत किस्में अत्यधिक प्रभावकारी मानी जाती हैं। ये किस्में न केवल प्रतिकूल परिस्थितियों में बेहतर सहनशीलता दर्शाती हैं, बल्कि इनकी पैदावार क्षमता भी बहुत शानदार होती है।
बीज उपचार और राइजोबियम कल्चर का प्रयोग
फसल को शुरुआती दौर में लगने वाले फफूंदजनित रोगों से सुरक्षित रखने के लिए बुवाई से पूर्व बीज उपचार बेहद जरूरी है। इसके लिए रासायनिक विधि के तहत कार्बेंडाजिम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित करें। यदि किसान जैविक माध्यम अपनाना चाहते हैं, तो ट्राइकोडर्मा का उपयोग कर सकते हैं। ध्यान रहे कि दवा की एक समान परत बीजों पर पूरी तरह चढ़ जानी चाहिए। इसके साथ ही, बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना बेहद फायदेमंद रहता है। राइजोबियम जीवाणु पौधों की जड़ों में ग्रंथियां बनाकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को प्राकृतिक रूप से पौधों के लिए सुलभ बनाते हैं। इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और शुरुआती हरी बढ़वार में तेजी आती है।
संतुलित पोषक तत्व और बेसल डोज प्रबंधन
पौधों के सर्वांगीण विकास के लिए बुवाई के समय ही खेत में संतुलित मात्रा में खाद डालना जरूरी होता है। बेसल डोज के रूप में प्रति एकड़ 25 से 30 किलोग्राम डीएपी (DAP) और 15 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। उर्वरक डालते समय यह ध्यान रखें कि खाद सीधे बीजों के संपर्क में न आए, बल्कि उसे कतारों से थोड़ी दूरी पर डाला जाए। यह तरीका शुरुआती अवस्था में पौधों की जड़ों को फास्फोरस और पोटाश की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करता है, जिससे जड़ तंत्र गहरा और मजबूत बनता है।
सिंचाई प्रबंधन और खरपतवार पर नियंत्रण
उड़द की फसल में 20 से 30 दिन का शुरुआती समय खरपतवार नियंत्रण के लिए अति संवेदनशील होता है। इस दौरान खरपतवार धूप, पानी और पोषक तत्वों के लिए मुख्य फसल से होड़ करते हैं। इसलिए निराई-गुड़ाई करके या कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उचित खरपतवारनाशक का सही मात्रा में छिड़काव करके खेत को खरपतवार मुक्त रखें। इसके अलावा, फसल में फूल आने और फलियों में दाना भरने की अवस्था बहुत महत्वपूर्ण होती है। इस समय खेत में नमी की कमी होने पर फूल और छोटी फलियां झड़ने लगती हैं। किसान आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करें, लेकिन पानी को जमने न दें। विशेषकर बारिश के दिनों में खेत से अतिरिक्त पानी निकालने के लिए जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।
सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव और फलियों का विकास
फसल की उत्तरार्द्ध अवस्था में जब फलियां बनने लगें और दाना भर रहा हो, तब पोषक तत्वों का समुचित संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। यदि इस दौरान पौधों में किसी सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी के लक्षण दिखाई दें, तो पत्तियों पर कैल्शियम या अनुशंसित सूक्ष्म पोषक तत्वों का फोलियर स्प्रे (छिड़काव) करना चाहिए। स्थानीय कृषि सलाहकारों के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया गया यह छिड़काव फलियों के समुचित विकास और दानों के वजन तथा चमक को बेहतर बनाने में सकारात्मक भूमिका निभाता है।



















