मध्य पूर्व में ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष के चलते अमेरिकी नौसेना पर परिचालन संबंधी दबाव अत्यधिक बढ़ गया है। इस रणनीतिक मजबूरी के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिमी प्रशांत महासागर में तैनात अपने शक्तिशाली एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन को वहां से स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है। यह युद्धपोत अब मध्य पूर्व की ओर रवाना हो रहा है, जहां यह लंबे समय से तैनात यूएसएस एब्राहम लिंकन का स्थान लेगा। एब्राहम लिंकन को मई में ही वापस लौटना था, लेकिन ईरान के साथ जारी तनाव के कारण इसकी तैनाती को लगातार बढ़ाया जा रहा था। इस कदम के कारण पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा रिक्ति बन गई है, जिसका सीधा रणनीतिक लाभ चीन को मिलता दिख रहा है।
पश्चिम प्रशांत में पैदा हुआ सुरक्षा का बड़ा खालीपन
पश्चिमी प्रशांत महासागर से एक प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर को हटाना वाशिंगटन की क्षेत्रीय रक्षा नीति के लिए एक गंभीर चुनौती माना जा रहा है। यद्यपि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह रिक्ति केवल एक अस्थायी व्यवस्था है और जल्द ही किसी अन्य युद्धपोत को इस क्षेत्र में भेजा जाएगा, लेकिन सामरिक विश्लेषक इसे अमेरिका की भू-राजनीतिक लाचारी के रूप में देख रहे हैं। ईरान के साथ लंबा खिंचता जा रहा यह संघर्ष अब अमेरिकी नौसैन्य क्षमताओं पर भारी पड़ रहा है, जिससे जहाजों के मेंटेनेंस और सैनिकों के स्वास्थ्य पर असर देखने को मिल रहा है।
यूएसएस एब्राहम लिंकन पर बढ़ा दबाव और 240 दिनों का रिकॉर्ड
मध्य पूर्व में तैनात यूएसएस एब्राहम लिंकन ने लगातार 240 से अधिक दिन समंदर में बिताए हैं। यह इस युद्धपोत के परिचालन इतिहास में तैनाती की सबसे लंबी अवधि है। बिना किसी व्यापक विराम के महीनों से लगातार ड्यूटी कर रहे नौसैनिकों में मानसिक तनाव और थकान की समस्याएं उभरकर सामने आ रही हैं। निरंतर मोर्चे पर बने रहने के कारण नौसैन्य कर्मियों के मनोबल और कार्यक्षमता पर गंभीर असर पड़ा है।
अमेरिकी संसद में मांग और रसद का गहराता संकट
युद्धपोत पर बिगड़ते हालात को लेकर अमेरिकी कैपिटल हिल में भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने यूएसएस एब्राहम लिंकन पर नौसैनिकों की स्थिति की विस्तृत जांच और संपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की है। इसके अतिरिक्त, लगातार महीनों तक समुद्र में तैनात रहने के कारण बेड़े पर आवश्यक खान-पान सामग्री, रसद और हथियारों की आपूर्ति का संकट भी उत्पन्न हो गया है।
ट्रंप प्रशासन की नीति पर सवाल और सहयोगियों की चिंता
यह सैन्य बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब चीन पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैन्य उपस्थिति और गतिविधियों का तेजी से विस्तार कर रहा है। वाशिंगटन के इस कदम पर सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विशेषज्ञ ग्रेग पोलिंग ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका की आधिकारिक रणनीति के अनुसार प्रशांत महासागर सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है, लेकिन धरातल पर हो रही कार्रवाई इसके ठीक विपरीत है। अमेरिका ने मध्य पूर्व से अपना सैन्य हस्तक्षेप घटाने की बात कही थी, परंतु वर्तमान परिस्थिति में वह वहीं पूरी तरह उलझ गया है।
ग्रेग पोलिंग के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस निर्णय ने एशिया प्रशांत में अमेरिकी सहयोगियों के बीच भारी असुरक्षा पैदा कर दी है। इन देशों को चिंता है कि संकट की घड़ी में वाशिंगटन का ध्यान बंट सकता है। वहीं दूसरी ओर, बीजिंग अमेरिका के इस भटकाव और उसके साझेदार देशों में उत्पन्न घबराहट को अपने अनुकूल अवसर के रूप में देख रहा है।
ताइवान से लेकर फिलीपींस तक चीन का बढ़ता प्रभाव
बीजिंग लंबे समय से पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसैन्य बल की तैनाती को अपनी सुरक्षा के लिए चुनौती और ताइवान पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के मार्ग में मुख्य बाधा मानता रहा है। हडसन इंस्टीट्यूट के रक्षा विश्लेषक ब्रायन क्लार्क का आंकलन है कि अमेरिका के एक एयरक्राफ्ट कैरियर के हटने का यह अर्थ नहीं है कि चीन तुरंत ताइवान पर सैन्य हमला कर देगा। हालांकि, इससे चीन को इस क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने का एक बड़ा कूटनीतिक मौका अवश्य मिल गया है।
चीन इस स्थिति का लाभ उठाकर जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे पड़ोसियों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पश्चिमी प्रशांत में शक्ति संतुलन बदल रहा है। बीजिंग लगातार यह विमर्श फैला रहा है कि अमेरिका अब अपने एशियाई साझेदारों को पूर्ण सुरक्षा गारंटी देने की स्थिति में नहीं है।
दक्षिण चीन सागर और जापानी द्वीप के पास शक्ति प्रदर्शन
हालिया हफ्तों में चीन ने अपनी सैन्य आक्रामकता में बढ़ोतरी की है। चीनी नौसेना ने इंडोनेशिया के साथ संयुक्त अभ्यास आयोजित किया और दक्षिण चीन सागर के विवादित स्कारबोरो शोल के निकट बड़े पैमाने पर सैन्य युद्धाभ्यास पूरा किया, जिस पर फिलीपींस अपना दावा पेश करता है। इसके अतिरिक्त, चीन के एक मिसाइल युद्धपोत ने जापान के सबसे दक्षिणी क्षेत्र ओकिनोटोरी द्वीप के समीप गोला-बारूद और मिसाइलों का परीक्षण कर सीधे तौर पर अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन किया।
सहयोगियों को भरोसा दिलाने पहुंचे अमेरिकी एडमिरल
एशिया में अपनी गिरती साख को संभालने और सहयोगी राष्ट्रों का विश्वास पुनः बहाल करने के लिए वाशिंगटन ने अपने शीर्ष सैन्य कमांडरों को कूटनीतिक मोर्चे पर भेजा है। अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन्स कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली ने हाल ही में मनीला का दौरा किया। उन्होंने फिलीपींस के सैन्य नेतृत्व को आश्वासन दिया कि अमेरिकी विशेष बल संयुक्त सैन्य अभ्यासों का दायरा बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। मनीला के बाद एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली का अगला पड़ाव जापान है।
वहीं, कैटो इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक इवान सैंकी का मानना है कि समुद्र में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की भौतिक मौजूदगी केवल सैन्य बल नहीं होती, बल्कि वह सहयोगियों को एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संबल भी प्रदान करती है। इनकी अनुपस्थिति से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमेरिकी रक्षा तंत्र इस समय मध्य पूर्व के संकटों में गहराई से उलझा हुआ है।
नौसेना के बेड़े पर मेंटेनेंस का भारी संकट
अमेरिकी नौसेना के बेड़े पर परिचालन का दबाव लगातार बढ़ रहा है। युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड 11 महीने की ऐतिहासिक तैनाती के पश्चात मई के मध्य में अपने गृह बंदरगाह वापस लौटा था। वियतनाम युद्ध के बाद से यह किसी भी अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की सबसे लंबी तैनाती दर्ज की गई। ईरान के खिलाफ अभियानों और वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से जुड़े तनावपूर्ण मिशनों के दौरान फोर्ड युद्धपोत को विभिन्न तकनीकी चुनौतियों एवं रखरखाव की जटिलताओं का सामना करना पड़ा है, जो अमेरिकी नौसेना के सामने खड़े गंभीर मेंटेनेंस संकट को उजागर करता है।




















