उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी तैयारियों के बीच आरक्षण नीति को लेकर राज्य की जनता का स्पष्ट रुझान सामने आया है। राज्य के सभी 75 जिलों में 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के दौरान 30,925 लोगों से प्रत्यक्ष संवाद के जरिए व्यापक जनमत सर्वेक्षण किया गया। इस प्रक्रिया में आम नागरिकों से पूछा गया कि क्या जाति के आधार पर मिलने वाला आरक्षण जारी रहना चाहिए अथवा इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाना चाहिए। सर्वेक्षण के नतीजों में 55 प्रतिशत बहुसंख्यक प्रतिभागियों ने स्पष्ट तौर पर माना कि जातिगत आरक्षण की व्यवस्था आगे भी जारी रहनी चाहिए। इसके विपरीत 34 प्रतिशत लोगों ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का मत प्रकट किया, जबकि 11 प्रतिशत लोगों ने 'कह नहीं सकते' का विकल्प चुनकर अपनी कोई तय राय जाहिर नहीं की।
सभी 75 जिलों में घर-घर जाकर जुटाया गया जमीनी आंकड़ा
इस सर्वेक्षण की रूपरेखा तैयार करते समय राज्य के सामाजिक और भौगोलिक संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया। सर्वे टीमों ने गांव से लेकर शहर तक हर इलाके को कवर करते हुए 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों से आमने-सामने संवाद किया। कुल 30,925 उत्तरदाताओं में समाज के हर वर्ग, धर्म, जाति और पृष्ठभूमि के लोग शामिल रहे। लैंगिक अनुपात के हिसाब से इसमें 76 प्रतिशत पुरुष और 24 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। आबादी के सटीक गणित और सामाजिक अनुपात को आधार बनाकर यह पड़ताल की गई ताकि राज्य की जमीनी नब्ज को निष्पक्षता से समझा जा सके।
शिक्षा और रोजगार के स्तर पर भागीदारी का गणित
प्रतिभागियों के सामाजिक और आर्थिक स्वरूप को समझने के लिए उनकी पृष्ठभूमि का भी अध्ययन किया गया। आंकड़ों के अनुसार इस प्रक्रिया में शामिल लोगों में 21.4 प्रतिशत नागरिक ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट योग्यता वाले थे। वहीं दूसरी तरफ, गैर-कृषि क्षेत्र में मजदूरी करने वाले श्रमिकों का हिस्सा 5.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। विभिन्न शैक्षणिक और कामकाजी पृष्ठभूमियों के लोगों को जोड़कर यह सुनिश्चित किया गया कि अलग-अलग पेशों से आने वाले नागरिकों का दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर सामने आ सके।
आरक्षण के अलावा छात्र आंदोलन और मंदिर चंदे जैसे मुद्दों की पड़ताल
सर्वेक्षण का दायरा केवल सत्ता के कामकाज के मूल्यांकन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन संवेदनशील और ज्वलंत विषयों पर भी लोगों का रुख दर्ज किया गया जो चर्चा के केंद्र में हैं। आरक्षण नीति की वर्तमान स्थिति और प्रभाव को समझने के अलावा, हाल के दौर में दिखे छात्र आंदोलनों के तेवर को लेकर जनभावनाएं परखी गईं। इसके साथ ही राम मंदिर चंदे जैसे संवेदनशील मामले पर भी नागरिकों की स्वतंत्र राय जानी गई, जिससे यह समझा जा सके कि आगामी चुनावी माहौल में कौन से मुद्दे जनमानस को सबसे अधिक प्रभावित कर रहे हैं।




















