उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े सर्वे के नतीजे सामने आए हैं, जिसमें राज्य के सभी 75 जिलों से जनता की राय जुटाई गई है। इस महा-सर्वे के दौरान विभिन्न मुद्दों पर मतदाताओं से सीधी बातचीत की गई, जिसमें से एक बेहद संवेदनशील और तीखा सवाल राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं से जुड़ा हुआ था। जब जनता से यह पूछा गया कि इस पूरी स्थिति के लिए मुख्य रूप से किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, तो सर्वे के आंकड़ों ने कई चौंकाने वाले पहलू उजागर किए। इस व्यापक जनमत संग्रह में अलग-अलग आयु वर्ग, धर्म, जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों ने खुलकर अपनी बात रखी और व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर सवाल खड़े किए।
मंदिर ट्रस्ट के अधिकारियों और मिलीभगत पर उठे गंभीर सवाल
सर्वे के दौरान जब राम मंदिर के चंदे में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में पूछा गया, तो जनता की प्रतिक्रिया काफी बंटी हुई नजर आई लेकिन एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर प्रबंधन से जुड़े लोगों पर सवाल उठा रहा था। आंकड़ों के मुताबिक, करीब 31 प्रतिशत लोगों ने सीधे तौर पर मंदिर ट्रस्ट के अधिकारियों को इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार माना है। इसके अलावा, 25 प्रतिशत मतदाताओं का यह स्पष्ट मानना था कि इसमें किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि सभी संबंधित पक्षों की मिलीभगत और संयुक्त जिम्मेदारी है। वहीं दूसरी ओर, 21 प्रतिशत लोगों ने वित्तीय लेन-देन संभालने वाले कर्मचारियों और ठेकेदारों को कटघरे में खड़ा करते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की है, जिससे यह साफ होता है कि जनता धन के प्रबंधन को लेकर बेहद सतर्क और संशय में है।
विशाल सैंपल साइज और सभी जिलों की भागीदारी से तैयार हुआ मेगा सर्वे
यह पूरा ओपिनियन पोल बेहद सुनियोजित तरीके से चलाया गया था, जिसमें उत्तर प्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर बड़े शहरों तक हर वर्ग की नुमाइंदगी सुनिश्चित की गई थी। राज्य के सभी 75 जिलों में कुल 30,925 लोगों से सीधे संवाद कर यह सर्वे तैयार किया गया, जिसकी समय-सीमा 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच तय की गई थी। इस महा-सर्वे में 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को शामिल किया गया था, जिसमें जनसांख्यिकी संतुलन का पूरा ध्यान रखते हुए 76 प्रतिशत पुरुष और 24 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी दर्ज की गई। इसमें किसानों, व्यापारियों, मजदूरों, नौकरीपेशा वर्ग के साथ-साथ युवाओं को भी पर्याप्त जगह दी गई ताकि समाज के हर कोने की आवाज सही रूप में सामने आ सके।
विभिन्न वर्गों और शिक्षा स्तर के आधार पर जुटाए गए आंकड़े
इस जनमत संग्रह को केवल राजनीतिक सीटों के समीकरण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसमें जनता के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को भी गहराई से टटोला गया है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, इसमें अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता और कामकाजी पृष्ठभूमि वाले लोगों की राय को शामिल किया गया ताकि हर तबके का दर्द और नजरिया स्पष्ट हो सके। इसमें गैर-कृषि क्षेत्र में मजदूरी करने वाले 5.5 प्रतिशत लोग शामिल थे, जिनकी आर्थिक स्थिति और विचार भी इस सर्वे का हिस्सा बने। इसके अलावा, उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले यानी ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट वर्ग की इसमें 21.4 प्रतिशत की मजबूत हिस्सेदारी रही, जिन्होंने अपनी तार्किक और समझदारी भरी राय से इस मेगा सर्वे के निष्कर्षों को एक नई गहराई और विश्वसनीयता प्रदान की है।




















