तीर्थनगरी हरिद्वार का केंद्र माना जाने वाला अपर रोड आज स्थानीय खरीदारों और दूर-दराज से आने वाले सैलानियों की भारी भीड़ से सराबोर रहता है। दुकानों की लंबी कतारों और चहल-पहल से भरा यह इलाका केवल व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र भर नहीं है, बल्कि इसका अपना एक समृद्ध और गहरा ऐतिहासिक महत्व रहा है। यह वही ऐतिहासिक रास्ता है जो मैदानों को सीधे पहाड़ी क्षेत्रों से जोड़ता था और हरिद्वार से ऋषिकेश जाने का प्राथमिक संपर्क सूत्र हुआ करता था। मौजूदा दौर में अपर रोड से आगे बढ़ते हुए भीमगोड़ा, खड़खड़ी और दूधाधारी चौक तक फैला यह पूरा क्षेत्र बेहद व्यस्त और सघन बाजार की शक्ल ले चुका है।
बीहड़ जंगलों के बीच चारधाम की यात्रा का इकलौता जरिया
जिस इलाके में आज चमचमाते आधुनिक सिक्स लेन हाईवे और सुगम बाईपास दिखाई देते हैं, वहां दशकों पहले बेहद घना और दुर्गम जंगल हुआ करता था। उस दौर में हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग के रूप में पहचानी जाने वाली यह सड़क ही बीहड़ वनों के बीच से गुजरने वाला अकेला रास्ता थी। देश के विभिन्न कोनों से आने वाले तीर्थयात्री चारधाम की अपनी कठिन यात्रा पूरी करने और पहाड़ों की ओर कूच करने के लिए पूरी तरह इसी डगर पर निर्भर थे। खड़खड़ी क्षेत्र के स्थानीय व्यापारी राजीव भट्ट के अनुसार, पुराने समय में यहां केवल एक ही संकरी सड़क हुआ करती थी, जिसे हरिद्वार-रुड़की रोड के नाम से भी पुकारा जाता था। पहाड़ों की ओर जाने के लिए किसी वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था उस समय मौजूद नहीं थी।
लाल सिटी बसें, तांगों की खटपट और पुरानी स्मृतियां
उस गुजरे दौर में आस्था का प्रवाह बेहद अनुशासित और धीमा हुआ करता था। श्रद्धालु पहले हर की पौड़ी के पवित्र घाटों पर गंगा स्नान संपन्न करते थे और फिर इसी मार्ग से होते हुए दूधाधारी चौक पार कर ऋषिकेश और अन्य पावन धामों के दर्शन को निकलते थे। व्यापारी राजीव भट्ट बताते हैं कि इस ऐतिहासिक सड़क पर पहले लाल रंग की सिटी बसें और पारंपरिक घोड़े-तांगे दौड़ा करते थे। जैसे-जैसे वक्त बदला, वैसे-वैसे नई तकनीकों के साथ आधुनिक चौड़े राजमार्ग और बाईपास अस्तित्व में आते गए। नतीजतन, मुख्य यात्रा यातायात नए मार्गों पर स्थानांतरित हो गया और यह पारंपरिक मार्ग धीरे-धीरे एक विशाल बाजार के रूप में ढलता चला गया।
जीरो जोन में तब्दील हुआ पुराना रास्ता
भीमगोड़ा प्रदेश व्यापार मंडल के कोषाध्यक्ष और स्थानीय व्यापारी अजय अरोड़ा बताते हैं कि हर की पौड़ी से आगे निकलने वाले इसी रास्ते को असल हरिद्वार-ऋषिकेश रोड के तौर पर जाना जाता था। उस कालखंड में लाल रंग की सरकारी बसों से लेकर हर तरह का आवागमन इसी एकल मार्ग से होकर गुजरता था, क्योंकि बाहर की ओर जाने या पहाड़ों का रुख करने के लिए कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं। वर्तमान परिस्थितियों में आधुनिक हाईवे काफी बाद में तैयार हुए, जिसके बाद इस पूरे पुराने मार्ग को जीरो जोन घोषित कर दिया गया। अब यहां वाहनों की पार्किंग की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है और यह पूरा इलाका घने बाजार में बदल चुका है। आधुनिकता के इस दौर में भी बुजुर्गों की स्मृतियों में यह पथ वही पावन डगर है, जो श्रद्धालुओं को उनकी आध्यात्मिक यात्रा पर आगे बढ़ाता था।



















