राजस्थान निकाय चुनावों के नतीजों पर गरमाई सियासत, भाजपा ने माना जनता का आशीर्वाद तो कांग्रेस बोली आंकड़े कह रहे कुछ औररायपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गणेशोत्सव पर चढ़ाया 1.15 करोड़ का स्वर्ण मुकुटजयपुर निकाय चुनाव: तबेलेनुमा स्कूल विवाद वाले रामपुरा-कंवरपुरा वार्ड में हारी बीजेपी, कांग्रेस के सुरेश मीणा जीतेसमस्तीपुर में बिना परीक्षा शिक्षक बनने का मौका, 16 सितंबर को होगा वॉक-इन इंटरव्यू2026 के अंत से पहले भारत पर चक्रवातों का साया, इसरो ने बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक जारी किया बड़ा अलर्टकच्चे तेल में तेजी और कनाडियन डॉलर की मजबूती से गिरा यूरो, वैश्विक बाजारों में बड़ी हलचलराजस्थान निकाय चुनावों में भाजपा की धमाकेदार जीत पर नरेंद्र मोदी का बड़ा बयानओरेकल ने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों खर्च करते हुए कर्मचारियों की छंटनी तेज कीअमेरिकी यील्ड उछाल से पाउंड दो महीने के निचले स्तर पर, फेड और बीओई बैठकों से पहले दबावगुरुग्राम में तेज रफ्तार कार ने स्पोर्ट्स बाइक सवार महिला राइडर को मारी जोरदार टक्कर, रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो आने के बाद पुलिस ने दर्ज की एफआईआर
अमेरिका के सामने रूस-यूक्रेन संकट और मध्य एशिया का पेच, कूटनीति के मोर्चे पर भारत की भूमिका अहमदुनिया
5 सित॰ 2026, 11:23 am (10 दिन पहले)· 2

अमेरिका के सामने रूस-यूक्रेन संकट और मध्य एशिया का पेच, कूटनीति के मोर्चे पर भारत की भूमिका अहम

डोनाल्ड ट्रंप के सामने रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव ने बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे में भारत ने मॉस्को और कीव दोनों से अपने संबंध बनाए रखते हुए शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा जताई है।

अमेरिकी सत्ता की कमान संभालते ही दुनिया भर में जारी संघर्षों को तुरंत थमाने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप के सामने इस समय दोतरफा कूटनीतिक उलझन खड़ी हो गई है। एक तरफ यूक्रेन के मोर्चे पर रूस के साथ चल रहा टकराव सुलझने का नाम नहीं ले रहा है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बढ़ता खुला तनाव अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए एक और बड़ी मुसीबत बन गया है। शुरुआत में ऐसा प्रतीत होता था कि वाशिंगटन के दबाव और कूटनीतिक पहलों से मॉस्को और कीव के बीच कोई ठोस समाधान निकल आएगा, लेकिन जमीन पर स्थिति वैसी नहीं रही जैसी उम्मीद की गई थी। यूरोपीय देशों की भागीदारी और अपने स्तर पर किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद यह संघर्ष अभी भी एक निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाया है। ऐसे जटिल और तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल के बीच वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण और दिलचस्प होती जा रही है।

भारत का संतुलित दृष्टिकोण और कूटनीतिक पहुंच

इस पूरे घटनाक्रम में नई दिल्ली ने किसी एक खेमे में बंधने के बजाय एक सर्वथा स्वतंत्र और संतुलित रास्ता अपनाया है। भारत ने न तो पारंपरिक मित्र रूस के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों में खटास आने दी है और न ही पश्चिमी देशों के साथ लगातार मजबूत हो रही अपनी साझेदारी को कमजोर किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ सीधी बातचीत में इस संघर्ष के समाधान को लेकर बेहद स्पष्ट संदेश दिया है। किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के इतर हुई इस उच्चस्तरीय मुलाकात में मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि अब अंतहीन युद्ध के दौर से बाहर निकलकर संघर्ष के स्थायी अंत की दिशा में गंभीर प्रयास करने का समय आ चुका है। इस स्पष्ट और मुखर संदेश ने यह साबित कर दिया कि भारत केवल तटस्थ रहने की नीति का पालन नहीं कर रहा, बल्कि शांति की बहाली के लिए सीधे शीर्ष स्तर पर बात करने का माद्दा रखता है.

ये भी पढ़ें

कीव तक फैली कूटनीति और विदेश मंत्री की सक्रियता

केवल रूस के साथ ही नहीं, बल्कि यूक्रेन की राजधानी कीव तक भारत की सक्रिय कूटनीति के तार जुड़े हुए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूक्रेन की यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात कर जमीनी हालातों का जायजा लिया। इस दौरान भारतीय पक्ष की ओर से यह दोहराया गया कि यदि संघर्ष को थमाने या किसी भी प्रकार की मानवीय सहायता पहुंचाने में भारत की कोई भी भूमिका हो सकती है, तो देश इसके लिए पूरी तरह तैयार है। यूक्रेन के नेतृत्व ने भी भारत के इन शांतिपूर्ण प्रयासों और सकारात्मक दृष्टिकोण की खुलकर सराहना की है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि नई दिल्ली दोनों प्रमुख पक्षों के साथ लगातार संपर्क में बनी हुई है और ऐसे व्यावहारिक सुझावों पर काम कर रही है जो इस खूनी संघर्ष की तीव्रता को कम करने या इसे पूरी तरह समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकें.

शांति प्रयासों की जटिलताएं और भावी संभावनाएं

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस भीषण टकराव को चार साल से अधिक का लंबा समय बीत चुका है। इस दौरान अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कठोर प्रतिबंध लगाए और यूक्रेन को भारी सैन्य सहायता मुहैया कराई। इसके बावजूद दोनों देशों के मूल राजनीतिक और सामरिक रुख में कोई बड़ा लचीलापन देखने को नहीं मिला है। रूस अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय मांगों पर पूरी तरह डटा हुआ है, जबकि यूक्रेन किसी भी ऐसी शर्त को मानने से इनकार कर रहा है जो उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो। ऐसे अड़ियल और कठिन हालातों के बीच भारत की स्थिति इसलिए अनूठी है क्योंकि उसके संबंध दोनों पक्षों के साथ सहज और भरोसेमंद बने हुए हैं। हालांकि भारत ने अभी तक खुद को किसी औपचारिक मध्यस्थ के रूप में पेश नहीं किया है, लेकिन जिस तरह से दोनों राजधानियों में उसकी सीधी और निर्बाध पहुंच है, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में शांति वार्ता की किसी भी संभावित जमीन को तैयार करने में भारत की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो सकती है.

सवाल-जवाब

बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात कब हुई थी?
यह उच्चस्तरीय मुलाकात 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के इतर हुई थी।
कीव की यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किन यूक्रेनी नेताओं से चर्चा की थी?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात की थी।
रूस-यूक्रेन युद्ध को अब तक कितना समय बीत चुका है?
यह संघर्ष अब चार साल से अधिक लंबा हो चुका है।
भारत की इस संकट पर क्या आधिकारिक स्थिति है?
भारत दोनों देशों के संपर्क में है और संघर्ष को कम करने तथा शांति स्थापित करने में हरसंभव मदद के लिए तैयार है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Arjun Mehta@arjun-mehta·9 दिन पहले

डोनाल्ड ट्रंप के सामने रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया का संकट एक साथ गहराना अमेरिकी विदेश नीति के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में भारत की स्वतंत्र कूटनीति और मॉस्को-कीव दोनों से संवाद बनाए रखने की क्षमता वैश्विक शांति प्रयासों में निर्णायक साबित हो सकती है।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·9 दिन पहले

अर्जुन के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह देखना होगा कि अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकताओं और पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव के बीच, भारत की यह मध्यस्थता क्षमता वैश्विक राजनीति में नई दिल्ली के बढ़ते वजन को दर्शाती है। यदि भारत मॉस्को और कीव के बीच संवाद सेतु बनने में सफल रहता है, तो यह पारंपरिक पश्चिमी मध्यस्थता के मॉडल को पीछे छोड़ते हुए बहुध्रुवीय कूटनीति का एक नया मानक स्थापित करेगा, जिससे वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादल भी छँट सकते हैं।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR