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ब्रिक्स के जरिए अमेरिका को संतुलित करने की नई कूटनीति, जानिए डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ रुख के बीच क्यों अहम है भारत का कदमदुनिया
2 सित॰ 2026, 10:37 pm (47 दिन पहले)· 9

ब्रिक्स के जरिए अमेरिका को संतुलित करने की नई कूटनीति, जानिए डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ रुख के बीच क्यों अहम है भारत का कदम

भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालते हुए अमेरिका के साथ बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच संतुलन बनाने में जुटा है। जुलाई 2026 तक द्विपक्षीय व्यापार 150 अरब डॉलर और व्यापार अधिशेष 32 अरब डॉलर से अधिक रहने के बावजूद ट्रंप 2.0 की व्यापार नीतियों और क्वाड में घटती रुचि ने नई दिल्ली को बहु-पक्षीय कूटनीति मजबूत करने पर मजबूर किया है।

भारत इस समय ब्रिक्स संगठन की अध्यक्षता संभाल रहा है, और यह जिम्मेदारी ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर आई है जब संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उसकी भू-राजनीतिक अनिश्चितता काफी तेजी से बढ़ती नजर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा दौर में नई दिल्ली एक बेहद जटिल रणनीतिक विरोधाभास का सामना कर रही है। एक तरफ जहां भारतीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे के लिए वाशिंगटन एक अपरिहार्य साझेदार बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर रहने के जोखिम को भारत अच्छी तरह समझता है। द्विपक्षीय संबंधों में आ रहे उतार-चढ़ाव और ट्रंप 2.0 प्रशासन की अप्रत्याशित नीतियों के बीच, भारत अपनी पारंपरिक कूटनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए नई रणनीति पर काम कर रहा है। इसी सिलसिले में ब्रिक्स का मंच भारत को चीन और रूस जैसी प्रतिस्पर्धी महाशक्तियों के साथ जुड़ने और वैश्विक संतुलन साधने का एक ठोस आधार प्रदान करता है।

ब्रिक्स की अध्यक्षता और भारत की बहु-पक्षीय रणनीति

ग्लोबल साउथ यानी विकासशील और उभरते देशों की मजबूत आवाज बनने का भारत का सपना हमेशा से उसकी विदेश नीति का मुख्य हिस्सा रहा है। ब्रिक्स की अध्यक्षता करते हुए भारत इस मंच का उपयोग केवल क्षेत्रीय सहयोग तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि इसके माध्यम से दुनिया को यह संदेश भी दे रहा है कि आज के दौर में कूटनीति किसी एक देश या गुट पर निर्भर होकर नहीं चलाई जा सकती। समय रहते इस रणनीतिक सच्चाई को स्वीकार करते हुए नई दिल्ली ने अपने बाहरी विकल्पों का विस्तार करना शुरू कर दिया है। जब किसी एक प्रमुख वैश्विक साझेदार के रुख में अनिश्चितता या स्वार्थ हावी होने लगता है, तो दूसरे देश के पास अपने रणनीतिक दायरा बढ़ाने का दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। भारत की मौजूदा कूटनीतिक पैंतरेबाजी इसी वैश्विक वास्तविकता की उपज है।

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भारत और अमेरिका के संबंधों में बढ़ता तनाव और व्यापारिक मतभेद

भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संबंधों का इतिहास लंबा रहा है, जिसमें दोनों पक्षों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हालांकि, वर्तमान स्थिति पूर्व के दौर से काफी भिन्न है क्योंकि अब मतभेद केवल भू-राजनीतिक विचारों तक सीमित नहीं रह गए हैं। ट्रेड, टैरिफ, व्यापारिक अधिशेष, रूसी कच्चे तेल की खरीद और भारतीय प्रवासियों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर दोनों देशों के विचार खुलकर अलग सामने आ रहे हैं। वाशिंगटन को उम्मीद रही है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी प्राथमिकताओं के अनुसार एक अग्रिम साझेदार की भूमिका निभाएगा। इसके विपरीत, भारत का स्पष्ट मानना है कि अमेरिका के साथ सहयोग उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत पर नहीं हो सकता। इस खींचतान के कारण दोनों देशों के संबंध एक ऐसे पड़ाव पर पहुंचते दिख रहे हैं जहां दोनों पक्ष साथ मिलकर काम करने के लिए मजबूर तो हैं, लेकिन रणनीतिक प्राथमिकताओं के तालमेल में लगातार असहजता महसूस कर रहे हैं।

ट्रंप 1.0 बनाम ट्रंप 2.0: बदलता राजनीतिक समीकरण

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भारत और अमेरिका के बीच काफी मजबूत राजनीतिक और रणनीतिक तालमेल देखा गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्यक्तिगत रसायन शास्त्र काफी सार्वजनिक रहा था, जिसके तहत दोनों नेताओं ने कई बड़े कार्यक्रमों में एक साथ मंच साझा किया था। उस दौरान चीन की आक्रामकता को नियंत्रित करने, रक्षा सहयोग बढ़ाने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा दृष्टिकोण पर दोनों देशों के बीच गहरी सहमति बनी थी। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की नीतियां काफी हद तक अप्रत्याशित हो चुकी हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा व्यापार और टैरिफ पर अपनाया गया आक्रामक रुख भारत के लिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बन गया है। अमेरिकी इरादों को लेकर छाई इस अनिश्चितता ने भारत को अपनी विदेश नीति में तेजी से रणनीतिक बदलाव करने पर विवश किया है।

150 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार और 32 अरब डॉलर के सरप्लस की चुनौती

आर्थिक वास्तविकताओं के धरातल पर भारत यह भली-भांति जानता है कि चीन या रूस में से कोई भी देश अमेरिकी बाजार का स्थान नहीं ले सकता। अमेरिका वर्तमान में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए दुनिया का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कंज्यूमर मार्केट बना हुआ है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है, और जुलाई 2026 तक भारत-अमेरिका व्यापार का कुल आंकड़ा लगभग 150 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इस व्यापारिक आंकड़े में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पक्ष में 32 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार अधिशेष यानी ट्रेड सरप्लस मौजूद है। जहां यह सरप्लस भारत के लिए आर्थिक मजबूती का प्रतीक है, वहीं डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस व्यापार घाटे को लेकर लगातार अपनी नाराजगी जाहिर करता रहा है। यदि अमेरिकी प्रशासन इस अधिशेष को जबरन कम करने के लिए कड़े टैरिफ कदम उठाता है, तो भारत के निर्यात क्षेत्र पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। इसी संभावित आर्थिक झटके से बचने के लिए नई दिल्ली पूर्व में ही अपने व्यापारिक और कूटनीतिक विकल्पों को बहु-पक्षीय बना रही है।

रक्षा और व्यापार में रूस और चीन की सीमाएं

रणनीतिक और सैन्य साझेदारी के मामले में भी स्थितियां काफी उलझी हुई हैं। यद्यपि रूस पारंपरिक रूप से भारत का सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन यूक्रेन संघर्ष ने मास्को की क्षमताओं पर भारी दबाव डाल दिया है। युद्ध के कारण रूस के हथियारों का बड़ा भंडार पहले ही समाप्त हो चुका है, जिससे भारत को उन्नत तकनीक और आधुनिक हथियारों की समय पर आपूर्ति पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद मास्को की बीजिंग पर बढ़ती निर्भरता ने भारत के लिए अतिरिक्त कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। रूस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह भारत के हितों की रक्षा के लिए चीन के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों को जोखिम में डालेगा। दूसरी ओर, चीन स्वयं कई आंतरिक आर्थिक चुनौतियों और सुस्ती से जूझ रहा है, जिससे वह भारत से बड़े पैमाने पर वस्तुओं की खरीदारी करने में असमर्थ है। इन सीमाओं के बावजूद, भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखना अत्यंत आवश्यक बना हुआ है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, क्वाड और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति का अनुकूल संतुलन बनाए रखना भारत की सुरक्षा नीति का मुख्य आधार है। वाशिंगटन ने भी लंबे समय से भारत को इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा संरचना का मुख्य स्तंभ माना है। इसी सोच के तहत भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए क्वाड मंच की स्थापना की गई थी। हालांकि, ट्रंप 2.0 प्रशासन के दौरान क्वाड के प्रति अमेरिकी दिलचस्पी में स्पष्ट कमी देखी गई है। इस घटते उत्साह ने भारत को यह संदेश दिया है कि उसे अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी एक गुट पर आश्रित रहने के बजाय ब्रिक्स जैसे बहु-पक्षीय संगठनों में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करनी होगी। भारत अब अपने राष्ट्रीय हितों, रक्षा जरूरतों और आर्थिक संप्रभुता की रक्षा के लिए संतुलन और स्वायत्तता की राह पर मजबूती से आगे बढ़ रहा है।

सवाल-जवाब

ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भारत के लिए मुख्य चुनौती क्या है?
भारत के लिए मुख्य चुनौती अमेरिका के साथ 150 अरब डॉलर के बढ़ते व्यापार संबंधों को बनाए रखते हुए ब्रिक्स के मंच से रूस और चीन के साथ कूटनीतिक संतुलन साधने की है।
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार का आंकड़ा कितना है?
जुलाई 2026 तक भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर लगभग 150 अरब डॉलर हो गया है, जिसमें भारत के पक्ष में 32 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार अधिशेष शामिल है।
डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारत-अमेरिका व्यापार अधिशेष को कैसे देखता है?
ट्रंप प्रशासन 32 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय मानता है और इसे कम करने के लिए कड़े शुल्क कदम उठाने के संकेत देता रहा है।
क्या रूस या चीन रक्षा और व्यापार में अमेरिका का विकल्प बन सकते हैं?
नहीं, चीन अपनी आर्थिक सुस्ती के कारण अमेरिकी कंज्यूमर मार्केट की जगह नहीं ले सकता, और यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की सैन्य क्षमताएं प्रभावित होने के कारण वह पूरी तरह रक्षा विकल्प नहीं बन सकता।
ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत क्वाड मंच की क्या स्थिति है?
ट्रंप 2.0 प्रशासन ने भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड मंच के प्रति कम रुचि दिखाई है, जिसके कारण भारत ब्रिक्स जैसे अन्य बहु-पक्षीय मंचों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
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