भारत और बांग्लादेश के बीच जारी कूटनीतिक सरगर्मियों के मध्य जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर डॉ. स्वर्ण सिंह ने दोनों पड़ोसी देशों के संबंधों पर एक विस्तृत विश्लेषण पेश किया है। उनके आकलन के मुताबिक बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की 20 और 21 तारीख को भारत आने तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रत्यक्ष द्विपक्षीय बातचीत करने की 50 फीसदी से अधिक संभावना है। प्रोफेसर सिंह का मानना है कि बांग्लादेश के पास भारत के साथ अपने कूटनीतिक और रणनीतिक तालमेल को सुधारने के अलावा अन्य कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। हालांकि इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले ढाका को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के मुद्दे पर संयम और राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देना होगा।
आम तौर पर पड़ोसी देशों में आम चुनावों के बाद नए राष्ट्राध्यक्षों के चुने जाने पर यह परंपरा रही है कि वे अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए भारत का चयन करते हैं। बांग्लादेश का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है, परंतु वर्ष 2024 में वहां हुए भारी राजनीतिक घटनाक्रम के बाद हालात काफी बदल गए। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण दिए जाने के कारण बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक समूहों में भारी नाराजगी देखी गई थी। वहां जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजन पार्टी जैसे संगठनों ने इस विषय को राजनीतिक रूप से काफी तूल दिया। इसके बाद जब एनसीपी की सरकार बनी और तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद संभाला, तब दोनों देशों के बीच संबंधों के नए सिरे से पटरी पर लौटने की उम्मीदें जगीं।
शेख हसीना का मुद्दा और बांग्लादेश की घरेलू राजनीति
बांग्लादेश में निर्वाचित सरकार के गठन के बाद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया था कि उनकी सरकार जनता के हितों को सर्वोपरि रखकर फैसले लेगी और विदेश नीति में संतुलन बनाए रखेगी। इसी सकारात्मक रुख को देखते हुए भारत ने उनके शपथ ग्रहण समारोह में अपना आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल भेजा था और बाद में भारतीय उच्चायुक्त ने भी उनसे मुलाकात की थी। भारत की ओर से तारिक रहमान को दो अलग-अलग मौकों के लिए आधिकारिक निमंत्रण भेजे जा चुके हैं। इनमें पहला निमंत्रण द्विपक्षीय उच्चस्तरीय वार्ता के लिए है, जबकि दूसरा निमंत्रण बिम्सटेक के अध्यक्ष के रूप में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिया गया है।
द्विपक्षीय संबंधों में आए तनाव के मुख्य कारणों पर बात करते हुए विशेषज्ञ बताते हैं कि बांग्लादेश की अंतरिम और वर्तमान व्यवस्था की प्रमुख मांग शेख हसीना के प्रत्यर्पण से जुड़ी रही है। जब तक प्रत्यर्पण की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक बांग्लादेशी पक्ष की यह अपेक्षा है कि शेख हसीना भारत में रहते हुए ऐसा कोई बयान न दें जिससे बांग्लादेश की घरेलू जनता में आक्रोश पैदा हो या देश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बने। इस बीच शेख हसीना ने भी अपनी हालिया बातचीत में स्पष्ट कर दिया है कि वह इस वर्ष दिसंबर तक वापस बांग्लादेश लौट जाएंगी। इस कदम को कूटनीतिक हलकों में एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भारत और बांग्लादेश के बीच जारी खींचतान को कम करने का रास्ता साफ हो सकता है।
भौगोलिक और आर्थिक वास्तविकता: भारत से साझेदारी क्यों जरूरी
प्रोफेसर स्वर्ण सिंह के अनुसार भारत और बांग्लादेश के लिए परस्पर तालमेल बेहतर बनाना कोई ऐच्छिक विषय नहीं, बल्कि दोनों देशों के विकास की अनिवार्य आवश्यकता है। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो बांग्लादेश की 100 फीसदी जमीनी सीमा भारत के साथ जुड़ी हुई है। ऐसे में अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापार को सुचारू रूप से चलाने के लिए ढाका का नई दिल्ली के साथ सहयोग करना बेहद जरूरी हो जाता है। इतिहास गवाह है कि जब शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के रिश्ते अपने चरम पर थे, तब बांग्लादेश को पूरे दक्षिण एशिया में आर्थिक विकास के एक बेहतरीन मॉडल के रूप में देखा जाने लगा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के बीच के व्यक्तिगत संबंधों ने भी कई बड़ी आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति दी थी।
बांग्लादेश के आर्थिक विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन इसके साथ ही बीएनपी और एनसीपी का ऐतिहासिक रुख चीन की तरफ झुकाव वाला माना जाता रहा है। यह राजनीतिक पृष्ठभूमि वर्तमान बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के सामने कई कूटनीतिक सीमाएं खड़ी करती है। इसके बावजूद यदि तारिक रहमान भारत का दौरा करते हैं, तो यह दोनों देशों के द्विपक्षीय इतिहास में एक नए सकारात्मक अध्याय की शुरुआत हो सकता है।
तीस्ता विवाद और गंगा जल समझौते की समीक्षा का समय
दोनों पड़ोसी देशों के बीच जल बंटवारे का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण रहा है। तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर अब तक दोनों पक्षों के बीच कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी है, जिसे सुलझाना नई दिल्ली और ढाका दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी ओर गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर वर्ष 1996 में 30 वर्षों की अवधि के लिए एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय संधि की गई थी। इस संधि के 29 वर्ष इस वर्ष पूरे हो रहे हैं। ऐसे में आगामी वर्ष में इस संधि के नवीनीकरण और समीक्षा पर दोनों देशों को गहन वार्ता शुरू करने की सख्त आवश्यकता होगी।
अंतरिम सरकार का दो साल का दौर और चीन-पाकिस्तान का झुकाव
बांग्लादेश में बीते दो वर्षों का समय काफी उथल-पुथल भरा रहा। डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में गठित अंतरिम सरकार में उन्हें मुख्य सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। उनका प्राथमिक संवैधानिक दायित्व देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति को बहाल करना और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना था। हालांकि अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के तहत बांग्लादेश के पारंपरिक इतिहास और विदेश नीति के रुख को बदलने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंधों को एक अलग दिशा में ले जाने की कोशिश की और चीन के साथ भी नजदीकियां बढ़ाईं।
डॉ. यूनुस के इस दो साल के कार्यकाल के दौरान जमीनी स्तर पर जो राजनीतिक और रणनीतिक माहौल बना, उसे सामान्य स्थिति में वापस लाने में थोड़ा समय लगना स्वाभाविक है। बीएनपी के भीतर भी कुछ ऐसे गुट मौजूद हैं जो भारत के बजाय चीन या पाकिस्तान के साथ अधिक प्रगाढ़ संबंध बनाने के पक्षधर रहे हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अब तक सार्वजनिक रूप से यही कहा है कि उनकी विदेश नीति पूरी तरह संतुलित रहेगी और वे भारत के साथ रिश्तों को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे में यदि 20 और 21 तारीख को उनकी भारत यात्रा साकार होती है, तो यह दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक स्थिरता के लिहाज से एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है।





















