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डोनाल्ड ट्रंप ने की मक्का डिफेंस पैक्ट की तारीफ, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के समझौते को बताया साहसिक कदमदुनिया
17 अग॰ 2026, 7:57 pm (28 दिन पहले)· 0

डोनाल्ड ट्रंप ने की मक्का डिफेंस पैक्ट की तारीफ, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के समझौते को बताया साहसिक कदम

डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का समर्थन करते हुए इसे एक बड़ा और जरूरी कदम करार दिया है। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा, जिस पर भारत की भी नजर है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में संपन्न हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट की खुलकर सराहना की है। इस रणनीतिक समझौते में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। इस विकास क्रम को लेकर अमेरिकी नेतृत्व ने इसे एक साहसिक और आवश्यक शुरुआती कदम करार दिया है। जेद्दा में हुए इस रक्षा समझौते को लेकर वैश्विक स्तर पर खासी चर्चा हो रही है, क्योंकि इसके प्रावधानों की समानता उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन के सामूहिक सुरक्षा ढांचे से की जा रही है।

ट्रुथ सोशल पर साझा किए गए विचार

अपनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के जरिए डोनाल्ड ट्रंप ने इस त्रिपक्षीय समझौते पर अपनी मुहर लगाई। उन्होंने उल्लेख किया कि यह इस बात का प्रमाण है कि मध्य पूर्व के देश किस प्रकार एकजुट हो रहे हैं और अपनी सुरक्षा को अधिक प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह देखकर बहुत खुशी हुई कि सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने हाल ही में, और आखिरकार, मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन कर दिया है।” ट्रंप ने तीनों राष्ट्रों के शीर्ष नेतृत्व को बधाई देते हुए इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उल्लेखनीय है कि इस ऐतिहासिक समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए हैं।

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क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच यह महत्वपूर्ण समझौता 7 अगस्त को जेद्दा में साइन किया गया था। इस पैक्ट का सबसे चर्चित और गंभीर पहलू इसका सामूहिक रक्षा प्रावधान है, जिसके तहत यदि अनुबंधित देशों में से किसी एक पर भी कोई बाहरी आक्रमण होता है, तो उसे तीनों राष्ट्रों पर हुआ हमला माना जाएगा। इसी क्लॉज की वजह से अंतरराष्ट्रीय गलियारों में इस गठबंधन को अनौपचारिक रूप से इस्लामिक नाटो की संज्ञा दी जा रही है। समझौते का मुख्य उद्देश्य सैन्य सहयोग को गहरा करना, साझा सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना और सामरिक समन्वय को बेहतर बनाना है। इसके अलावा, खुफिया तंत्र से जुड़ी जानकारियां भी साझा किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

समझौते के दायरे से जुड़े अनसुलझे पहलू

उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह समझौता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 पर आधारित है, जो संप्रभु राष्ट्रों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से आत्मरक्षा का वैधानिक अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, इस पूरे समझौते का विस्तृत आधिकारिक दस्तावेज अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस वजह से कई तकनीकी और सामरिक सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। उदाहरण के लिए, सैन्य सहायता की वास्तविक सीमा क्या होगी, यह किस विशिष्ट भौगोलिक दायरे में लागू होगा, और कौन सी परिस्थितियां संयुक्त सैन्य प्रतिक्रिया को ट्रिगर करेंगी, यह स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा, सार्वजनिक की गई जानकारी में परमाणु हथियारों या परमाणु क्षमताओं की साझेदारी से संबंधित किसी भी प्रावधान का उल्लेख नहीं मिलता है।

भारत की प्रतिक्रिया और कूटनीति

इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के सामरिक निहितार्थों को लेकर भारत पूरी तरह सतर्क और गंभीर है। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत इस घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 11 अगस्त को मीडिया के सामने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति पर इसके संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने यह भी दोहराया कि देश के रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

सवाल-जवाब

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर किन देशों ने हस्ताक्षर किए हैं?
इस समझौते पर सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने हस्ताक्षर किए हैं।
यह समझौता कब और कहां साइन किया गया था?
यह समझौता 7 अगस्त को जेद्दा में साइन किया गया था।
इस समझौते की मुख्य शर्त क्या है?
इसकी मुख्य शर्त यह है कि यदि तीनों में से किसी एक देश पर भी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को क्या कहा है?
डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक बड़ा, बोल्ड और जरूरी पहला कदम बताया है।
भारत ने इस समझौते पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत इस समझौते के राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·27 दिन पहले

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ यह समझौता दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के रणनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव ला सकता है। 'इस्लामिक नाटो' कहे जाने वाले इस गठबंधन में अनुच्छेद 51 के तहत सामूहिक रक्षा का प्रावधान है। हालांकि इसका पूरा दस्तावेज सार्वजनिक न होने से सैन्य सहायता और भौगोलिक दायरे जैसे कई तकनीकी सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं, जिस पर भारत की पैनी नजर रहना स्वाभाविक है।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·27 दिन पहले

वाशिंगटन के गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि इस त्रिपक्षीय समझौते से अमेरिकी कूटनीति पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे स्थिरता की दिशा में साहसिक कदम बताया है, लेकिन व्हाइट हाउस और पेंटागन में इस बात को लेकर मंथन जारी है कि इस अनौपचारिक गठबंधन से पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में हमारे रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय सहयोगियों, विशेषकर भारत के साथ संबंधों पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं।

Sophie Laurent@sophie-laurent·27 दिन पहले

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच यह त्रिपक्षीय रक्षा समझौता वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव है। अनुच्छेद 51 के तहत सामूहिक सुरक्षा का यह ढांचा मध्य एशिया से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। चूँकि इस पैक्ट का विस्तृत दस्तावेज अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसके रणनीतिक दायरे और सैन्य प्रतिक्रिया के पैमानों पर यूरोपीय राजधानियों की पैनी नजर बनी हुई है, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति में नए तनाव या संतुलन उभर सकते हैं।

Li Wei@li-wei·27 दिन पहले

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच यह त्रिपक्षीय सैन्य समझौता वैश्विक भू-राजनीति में एक नया समीकरण पैदा कर रहा है। नाटो की तर्ज पर सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का संदर्भ यह संकेत देता है कि मध्य और दक्षिण एशिया के बीच रणनीतिक गठजोड़ गहरे हो रहे हैं। हालांकि, समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक न होने और परमाणु हथियारों की स्थिति स्पष्ट न होने से क्षेत्रीय स्थिरता पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव और भारत की सुरक्षा चुनौतियों का आकलन करना अभी बाकी है, जो बीजिंग की सामरिक निगरानी का भी विषय है।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·27 दिन पहले

यह त्रिपक्षीय गठबंधन केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा गलियारों और मध्य पूर्व की वित्तीय प्राथमिकताओं को भी प्रभावित कर सकता है। रियाद का यह कदम पारंपरिक पश्चिमी सुरक्षा छाता से परे जाकर स्वतंत्र रणनीतिक विकल्प तलाशने की उसकी दीर्घकालिक नीति का हिस्सा है। जैसे-जैसे इस पैक्ट का क्रियान्वयन आगे बढ़ेगा, यह देखना अहम होगा कि तेल आपूर्ति मार्गों और क्षेत्रीय आर्थिक निवेशों पर इसके क्या सामरिक परिणाम सामने आते हैं।

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