अमेरिकी सत्ता की कमान संभालते ही दुनिया भर में जारी संघर्षों को तुरंत थमाने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप के सामने इस समय दोतरफा कूटनीतिक उलझन खड़ी हो गई है। एक तरफ यूक्रेन के मोर्चे पर रूस के साथ चल रहा टकराव सुलझने का नाम नहीं ले रहा है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बढ़ता खुला तनाव अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए एक और बड़ी मुसीबत बन गया है। शुरुआत में ऐसा प्रतीत होता था कि वाशिंगटन के दबाव और कूटनीतिक पहलों से मॉस्को और कीव के बीच कोई ठोस समाधान निकल आएगा, लेकिन जमीन पर स्थिति वैसी नहीं रही जैसी उम्मीद की गई थी। यूरोपीय देशों की भागीदारी और अपने स्तर पर किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद यह संघर्ष अभी भी एक निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाया है। ऐसे जटिल और तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल के बीच वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण और दिलचस्प होती जा रही है।
भारत का संतुलित दृष्टिकोण और कूटनीतिक पहुंच
इस पूरे घटनाक्रम में नई दिल्ली ने किसी एक खेमे में बंधने के बजाय एक सर्वथा स्वतंत्र और संतुलित रास्ता अपनाया है। भारत ने न तो पारंपरिक मित्र रूस के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों में खटास आने दी है और न ही पश्चिमी देशों के साथ लगातार मजबूत हो रही अपनी साझेदारी को कमजोर किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ सीधी बातचीत में इस संघर्ष के समाधान को लेकर बेहद स्पष्ट संदेश दिया है। किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के इतर हुई इस उच्चस्तरीय मुलाकात में मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि अब अंतहीन युद्ध के दौर से बाहर निकलकर संघर्ष के स्थायी अंत की दिशा में गंभीर प्रयास करने का समय आ चुका है। इस स्पष्ट और मुखर संदेश ने यह साबित कर दिया कि भारत केवल तटस्थ रहने की नीति का पालन नहीं कर रहा, बल्कि शांति की बहाली के लिए सीधे शीर्ष स्तर पर बात करने का माद्दा रखता है.
कीव तक फैली कूटनीति और विदेश मंत्री की सक्रियता
केवल रूस के साथ ही नहीं, बल्कि यूक्रेन की राजधानी कीव तक भारत की सक्रिय कूटनीति के तार जुड़े हुए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूक्रेन की यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात कर जमीनी हालातों का जायजा लिया। इस दौरान भारतीय पक्ष की ओर से यह दोहराया गया कि यदि संघर्ष को थमाने या किसी भी प्रकार की मानवीय सहायता पहुंचाने में भारत की कोई भी भूमिका हो सकती है, तो देश इसके लिए पूरी तरह तैयार है। यूक्रेन के नेतृत्व ने भी भारत के इन शांतिपूर्ण प्रयासों और सकारात्मक दृष्टिकोण की खुलकर सराहना की है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि नई दिल्ली दोनों प्रमुख पक्षों के साथ लगातार संपर्क में बनी हुई है और ऐसे व्यावहारिक सुझावों पर काम कर रही है जो इस खूनी संघर्ष की तीव्रता को कम करने या इसे पूरी तरह समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकें.
शांति प्रयासों की जटिलताएं और भावी संभावनाएं
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस भीषण टकराव को चार साल से अधिक का लंबा समय बीत चुका है। इस दौरान अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कठोर प्रतिबंध लगाए और यूक्रेन को भारी सैन्य सहायता मुहैया कराई। इसके बावजूद दोनों देशों के मूल राजनीतिक और सामरिक रुख में कोई बड़ा लचीलापन देखने को नहीं मिला है। रूस अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय मांगों पर पूरी तरह डटा हुआ है, जबकि यूक्रेन किसी भी ऐसी शर्त को मानने से इनकार कर रहा है जो उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो। ऐसे अड़ियल और कठिन हालातों के बीच भारत की स्थिति इसलिए अनूठी है क्योंकि उसके संबंध दोनों पक्षों के साथ सहज और भरोसेमंद बने हुए हैं। हालांकि भारत ने अभी तक खुद को किसी औपचारिक मध्यस्थ के रूप में पेश नहीं किया है, लेकिन जिस तरह से दोनों राजधानियों में उसकी सीधी और निर्बाध पहुंच है, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में शांति वार्ता की किसी भी संभावित जमीन को तैयार करने में भारत की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो सकती है.




















