समुद्री जीवों के संवाद के तरीकों को समझने की दिशा में वैज्ञानिक लंबे समय से काम कर रहे हैं। इसी कड़ी में वाइल्ड डॉल्फिन प्रोजेक्ट की संस्थापक और निदेशक डेनिस हर्जिंग अपने लंबे शोध के जरिए नए आयाम स्थापित कर रही हैं। डेनिस हर्जिंग ने सबसे पहले साल 1985 में बहामास की अपनी यात्रा के दौरान अटलांटिक स्पॉटेड डॉल्फिन का अध्ययन करना शुरू किया था। उस समय उन्होंने इन जीवों की तरफ से निकाले जाने वाले विशेष क्लिक और सीटी जैसी आवाजों को सुना था, जिसके बाद उनके मन में इन स्तनधारी जीवों के संवाद करने के तरीके को जानने की जिज्ञासा पैदा हुई थी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सुलभ हुआ शोध
इस दिशा में काम करते हुए लगभग 40 साल का लंबा समय बीत चुका है। डेनिस हर्जिंग ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि आखिरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक उनके काम आ रही है और इसकी मदद से डॉल्फिन की आवाजों और उनके संदेशों को समझने में सफलता मिल रही है। उनके शोध समूह ने पिछले कई वर्षों के दौरान डॉल्फिन के वीडियो और ऑडियो फुटेज का भारी डेटाबेस तैयार किया है। इस डेटा को अर्थपूर्ण बनाने के लिए उनका दल जॉर्जिया टेक के वैज्ञानिकों के साथ-साथ गूगल डीपमाइंड के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि डॉल्फिन की भाषा को एक सुव्यवस्थित ढांचा दिया जा सके, हालांकि अभी तक इसका पूर्ण अनुवाद करना बाकी है।
पैटर्न तलाशने में मददगार बनी नई तकनीक
तकनीक के इस नए इस्तेमाल पर बात करते हुए डेनिस हर्जिंग ने कहा कि एआई की सहायता से अब डेटा के भीतर छिपे पैटर्नों को ढूंढना बहुत आसान हो गया है। उन्होंने इसे एक बेहद ताकतवर नया टूल करार दिया और कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से इस तकनीक के आने का लंबे समय से इंतजार कर रही थीं। शोधकर्ताओं की इस टीम ने अपनी स्टडी के शुरुआती नतीजों का उपयोग करते हुए दोतरफा संवाद यानी टू-वे कम्युनिकेशन स्थापित करने का भी प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने पानी के भीतर इस्तेमाल होने वाला एक पहनने योग्य कंप्यूटर तैयार किया है, जो डॉल्फिन की आवाजें रीप्रोड्यूस कर सकता है।
दोतरफा संवाद स्थापित करने के अनूठे प्रयास
इस विशेष तकनीक में ऐसे साउंड्स का इस्तेमाल किया जाता है जो किसी वस्तु जैसे कि स्कार्फ और उनके प्राकृतिक आवास जैसे कि सरगासुम यानी एक प्रकार के समुद्री शैवाल को दर्शाते हैं। इस प्रयोग के दौरान दो शोधकर्ता मिलकर एक तय व्यवहार का प्रदर्शन करते थे। उदाहरण के लिए, एक रिसर्चर स्कार्फ से जुड़ा साउंड प्ले करता था और दूसरा रिसर्चर उस वस्तु के साथ खेलता था, जिसके बाद यह देखा जाता था कि आसपास मौजूद डॉल्फिन इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया देती हैं।
निकल और नकल में फर्क करना एक बड़ी चुनौती
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह तय करना था कि डॉल्फिन की तरफ से आने वाली आवाजें वाकई किसी बात का संदेश हैं या फिर वे सिर्फ इंसानों या पर्यावरण की नकल मात्र कर रही हैं। डेनिस हर्जिंग का कहना है कि भले ही उनके पास सीटी जैसी आवाजें मौजूद हैं और वे अलग-अलग खिलौनों को पहचान दे रहे हैं, लेकिन किसी बात की नकल करने और उसके असली अर्थ या कार्यप्रणाली को समझने में बहुत बड़ा अंतर होता है। खुले समुद्र या प्राकृतिक माहौल में इस फर्क को स्पष्ट रूप से पहचान पाना बेहद कठिन कार्य है।
सीमित और नियंत्रित वातावरण की जरूरत
शोधकर्ताओं का मानना है कि किसी सुरक्षित अभयारण्य या अधिक नियंत्रित पर्यावरण के भीतर काम करने से उन्हें इन दोनों के बीच का अंतर आसानी से समझ आ सकता है। हालांकि, खुले समुद्र में रहने वाली डॉल्फिन आपस में वास्तव में क्या बातचीत करती हैं, यह रहस्य अभी भी पूरी तरह से अनसुलझा ही बना हुआ है। हर्जिंग की टीम ने पैटर्न तलाशने में भले ही बेहतरीन काम किया है, लेकिन इन जीवों के साथ किसी प्रकार की पूरी बातचीत की शुरुआत होने में अभी काफी समय लगने वाला है।
संस्कृति और सामाजिक पदानुक्रम को समझना बाकी
इस दिशा में अभी और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है क्योंकि इंसानों ने भले ही डॉल्फिन के सामाजिक पदानुक्रम और उनके व्यवहार को काफी हद तक समझ लिया है, लेकिन बातचीत को पूरी तरह संभव बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। डेनिस हर्जिंग ने स्पष्ट किया कि उनके पास डेटा और उसका ढांचा तो हो सकता है, लेकिन डॉल्फिन की अपनी संस्कृति में उस डेटा का क्या मतलब है, यह अपने आप में एक अलग और लंबी खोज का विषय है।
इंसानी दृष्टिकोण और पर्यावरण से जुड़ाव
डॉल्फिन के साथ बात करने में सक्षम होना सुनने में बेहद रोमांचक लग सकता है क्योंकि आखिर कौन ऐसा होगा जिसने फिल्मों या कहानियों की तरह जानवरों से बातें करने का सपना न देखा हो। लेकिन अंततः इन जीवों को समझने के हमारे प्रयास हमें खुद के बारे में और इस ग्रह के साथ हमारे अपने रिश्तों को गहराई से जानने में मदद कर सकते हैं। हर्जिंग ने बताया कि जब वह लोगों से यह सवाल करती हैं कि उनके अनुसार डॉल्फिन इंसानों से क्या कहना चाहेंगी, तो सबसे आम जवाब यही मिलता है कि डॉल्फिन शायद यही कहेंगी कि तुम लोग हमारे समुद्र को क्यों बर्बाद कर रहे हो। उनके अनुसार यह जवाब इस बात को बखूबी बयां करता है कि हम खुद इस दुनिया के बारे में क्या सोचते और महसूस करते हैं।



















