प्रयोगशालाओं में सूक्ष्म जीवाणुओं और वायरसों के आनुवंशिक बदलाव को लेकर दुनिया भर में चल रही वैज्ञानिक बहस अब केवल सैद्धांतिक आशंकाओं तक सीमित नहीं रह गई है। सुरक्षा निगरानी से जुड़ी हालिया पड़ताल में ऐसे पांच अलग मामलों का पता चला था, जहां विदेशी शोधकर्ताओं ने एंथ्रोपिक के कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले सिस्टम क्लाउड के सुरक्षा नियमों को तोड़कर गेन ऑफ फंक्शन से संबंधित संवेदनशील जानकारियां हासिल करने की कोशिश की थी। वैज्ञानिक भाषा में गेन ऑफ फंक्शन का आशय किसी भी रोगाणु के आनुवंशिक ढांचे में ऐसा बदलाव करना है, जिससे उसकी संक्रामकता, घातकता या स्तनधारियों के बीच तेजी से फैलने की क्षमता कई गुना बढ़ जाए। इस तरह की कोशिशों को तुरंत रोककर संबंधित यूजर्स के खाते बंद कर दिए गए थे। हालांकि ऐसी तकनीकों के जरिए वैक्सीन और जीवनरक्षक दवाएं भी बनाई जाती हैं, लेकिन दोहरे उपयोग की यही प्रकृति इन्हें सबसे बड़ा संभावित खतरा बना देती है।
खतरनाक रोगाणुओं पर काम करने वाले अनुसंधानकर्ताओं के बीच एक पुराना चलन रहा है कि जानकारी को छिपाने के बजाय प्रकाशित करना बेहतर समझा जाता है। उनका तर्क रहता है कि इंसानों के लिए खतरा बनने वाले आनुवंशिक लक्षणों को पहले से समझना आवश्यक है। लेकिन ऐसे खतरनाक प्रयोगों के दौरान किसी अनपेक्षित रिसाव या दुर्भावनापूर्ण हमले के जो विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मसलों पर दशकों तक काम करने वाली खोजी लेखक एनी जैकबसन ने अपनी किताब बायोलॉजिकल वॉर: अ सिनेरियो में इसी भयावह हकीकत को रेखांकित किया है। इससे पहले उन्होंने बेस्टसेलर किताब न्यूक्लियर वॉर: अ सिनेरियो लिखी थी। उनके इस नए काम ने रक्षा विशेषज्ञों, सेना के शीर्ष रणनीतिकारों और महामारी नीति निर्माताओं के बीच इस सवाल को फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या जैविक संकट की स्थिति में दुनिया के पास खुद को बचाने का कोई ठोस रास्ता मौजूद है।
परमाणु बम से भी ज्यादा सुलभ और खतरनाक बनता जैविक संकट
अमेरिकी रक्षा विभाग के बड़े हथियारों के खतरे से जुड़े दस्तावेजों में सबसे घातक हथियार के रूप में परमाणु अस्त्रों को शीर्ष पर रखा जाता है, लेकिन विनाशकारी प्रभाव के मामले में जैविक हथियार बिल्कुल उनके करीब खड़े हैं। दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क इनके निर्माण की जटिलता का है। एक परमाणु बम तैयार करने के लिए हथियार बनाने योग्य यूरेनियम या प्लूटोनियम जैसे विखंडनीय पदार्थों की जरूरत होती है। इसके अलावा उन्हें सुरक्षित रखने, मिसाइल प्रणाली में तैनात करने, बी-2 बॉम्बर विमानों या परमाणु पनडुब्बियों के जरिए संचालित करने का पूरा ढांचा खड़ा करना पड़ता है। दुनिया भर में केवल 9 देश ऐसे हैं जिनके पास परमाणु हथियार मौजूद हैं और उनके रखरखाव पर कड़ा नियंत्रण रहता है।
इसके विपरीत जैविक हथियारों की दुनिया में दाखिल होने की सीमा बेहद नीचे है। दुनिया के तमाम कोनों में संभावित महामारी फैलाने वाले संक्रामक घटकों तक पहुंच बनाना तुलनात्मक रूप से काफी आसान हो चुका है। गंदे बम के साथ किसी आतंकवादी समूह का खतरा एक सीमित दायरे में रहता है, लेकिन एक घातक रोगाणु का अनियंत्रित प्रसार पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है। जब बात हवा के जरिए तेजी से फैलने वाले सांस से जुड़े रोगाणुओं की आती है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है क्योंकि आम समाज ऐसे अदृश्य खतरों की वास्तविकता से पूरी तरह अनजान रहता है।
आतंकी हमलों से कहीं अधिक बड़ा खतरा लैब से होने वाले हादसे
जैविक हथियारों के संभावित इस्तेमाल के विश्लेषण से यह बात सामने आती है कि किसी भी जैविक हमले या रिसाव में दुर्घटना की संभावना किसी सोची-समझी आतंकी कार्रवाई की तुलना में गणितीय रूप से बहुत ज्यादा होती है। सीआईए और अन्य अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियां जैविक हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए लगातार काउंटरप्रोलिफरेशन ऑपरेशन चलाती हैं। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण दर्ज हैं जब आतंकी संगठनों के हाथों में जैविक हथियार बनाने के कार्यक्रमों को समय रहते नष्ट किया गया।
किसी भी समुदाय के बीच जानबूझकर जैविक हथियार छोड़ना एक आत्मघाती कदम होता है, क्योंकि उसकी वापसी की मार से हमलावर खुद भी नहीं बच सकता। ऐसा वही समूह कर सकता है जिसे अपने अस्तित्व की कोई चिंता न हो, और ऐसे सिरफिरे संगठनों की संख्या दुनिया में सीमित है। लेकिन दूसरी तरफ उन वैज्ञानिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और देशों की भारी तादाद है जो पैथोजन्स की घातकता और प्रसार क्षमता बढ़ाने के लिए बीएसएल-3 और बीएसएल-4 जैसी उच्च सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में दिन-रात काम कर रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया भर में लगभग 3,600 ऐसी प्रयोगशालाएं सक्रिय हैं। दुनिया में 3,600 आतंकी संगठन भले ही न हों, लेकिन हजारों लैब्स की मौजूदगी मानवीय चूक की आशंका को कई गुना बढ़ा देती है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज प्रयोगशालाओं के भयावह हादसे
उच्चतम सुरक्षा वाली बायोसेफ्टी लेवल 4 यानी बीएसएल-4 लैब में काम करते हुए किसी वैज्ञानिक के हाथ में गलती से संक्रमित सिरिंज का चुभ जाना कोई काल्पनिक बात नहीं है। इंसान होने के नाते घबराहट और इनकार की भावना में कोई भी व्यक्ति चुपचाप अपने घर जा सकता है और अनजाने में एक महामारी का जरिया बन सकता है। सोवियत संघ के दौर में वैज्ञानिक निकोलाई उस्तिनोव के साथ ऐसा ही दर्दनाक हादसा हुआ था। शोध के दौरान उन्हें मारबर्ग वायरस का घातक टीका गलती से लग गया था, जिसका कोई ज्ञात इलाज नहीं था। उन्होंने अपनी संस्था को इस गलती की सूचना दी, जिसके बाद उन्हें सबमरीन लॉक वाले दरवाजों के पीछे एक अलग वार्ड में बंद कर दिया गया, जहां रक्तस्रावी बुखार से उनकी दर्दनाक मौत हो गई।
साल 2001 में अमेरिका में 9/11 के हमलों के तुरंत बाद डाक के जरिए एंथ्रेक्स पाउडर भेजने की घटनाओं ने इस पूरे सुरक्षा परिदृश्य को बदलकर रख दिया था। उस घटना के बाद से जोखिम भरे जैविक अनुसंधानों में अप्रत्याशित तेजी आई। एंथ्रेक्स के मामले में संक्रमित व्यक्ति एक अंतिम वाहक की तरह होता है, यानी सांस के जरिए शरीर में जाने पर वह जान तो ले लेता है लेकिन एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता। वह केवल दहशत फैलाने का जरिया था, महामारी का नहीं। लेकिन जब बात हवा में उड़ने वाले संक्रामक वायरसों की आती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।
जेनेटिक इंजीनियरिंग और उन्नत प्रयोगों का अनियंत्रित दायरा
आज की दुनिया जेनेटिक इंजीनियरिंग, गेन ऑफ फंक्शन और नई प्रयोगशाला तकनीकों के सहारे एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है जहां किसी भी रोगाणु को अपनी मर्जी से बदला जा सकता है। प्रयोगशालाओं में ऐसे प्रयोग हो चुके हैं जहां मौजूदा रोग प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने वाले पैथोजन्स तैयार किए गए, जैसे कि माउसपॉक्स का परीक्षण। इसी तरह एच5एन1 बर्ड फ्लू को फेरेट्स के बीच हवा के जरिए फैलने लायक बनाने वाले प्रयोग भी किए गए। शोधकर्ताओं के एक वर्ग में यह घमंड देखने को मिलता है कि इस तरह के घातक अनुसंधानों के आनुवंशिक अनुक्रमों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना उनका अकादमिक अधिकार है, भले ही इसके परिणाम मानव जाति के लिए कितने भी भयावह क्यों न हों।
आम जनता और नीति निर्माताओं को वैज्ञानिकों के इस अभिजात्य रवैये से लगातार जूझना पड़ता है, जहां यह मान लिया जाता है कि विज्ञान की तकनीकी पेचीदगियों के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के फैसले केवल वही ले सकते हैं। वेटिकन के कार्डिनल्स, संयुक्त राष्ट्र के राजनयिकों और अंतरराष्ट्रीय संधियों का मसौदा तैयार करने वाले विशेषज्ञों के लिए भी इस जटिल तकनीकी संकट को सरल मानवीय भाषा में समझना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
बिना एआई के भी प्रकृति के रोगाणु बन सकते हैं सामूहिक विनाश का जरिया
आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जैविक हथियारों में संभावित दुरुपयोग को लेकर काफी चर्चा हो रही है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आधुनिक एआई की सहायता के बिना भी एक साधारण प्रयोगशाला में कुदरती पैथोजन्स के साथ छेड़छाड़ करके महाविनाशक महामारी खड़ी की जा सकती है। बायोसिक्योरिटी विशेषज्ञ और राष्ट्रपति स्तर के सलाहकार डेविड रेलमैन ने मिरर लाइफ जैसी अत्यंत डरावनी अवधारणाओं का उल्लेख किया है, जिसमें पृथ्वी से समस्त मानव जीवन के समाप्त होने का खतरा रहता है।
मैरीलैंड के फ्रेडरिक स्थित फोर्ट डेट्रिक की बीएसएल-4 लैब के निदेशक डॉ. निकोलस बर्गमैन ने यह स्वीकार किया था कि आम जनता अक्सर इस बात से पूरी तरह अनजान रहती है कि ऐसे अनुसंधान केंद्र किन खतरों पर काम कर रहे हैं। प्रयोगशालाओं में काम करने वाले कर्मचारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी संभावित खतरों के लिए सुरक्षा उपाय और दवाएं खोजना होती है, खतरे की घंटी बजाना उनका रोजमर्रा का काम नहीं होता। यही वजह है कि जब इस तरह की चेतावनियां सार्वजनिक मंचों पर आती हैं, तो दुनिया के सामने उस छुपे हुए सच का खुलासा होता है जिसकी चर्चा अब तक केवल बंद कमरों में होती रही थी।
सैन्य युद्ध अभ्यास और महामारी की काल्पनिक पटकथाएं
अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति के अनुसार जैविक हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध है और तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने दशकों पहले देश के जैविक हथियार कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर समाप्त करने की घोषणा की थी। अमेरिकी विदेश विभाग के मौजूदा और पिछले आकलनों के अनुसार रूस और उत्तर कोरिया के पास अवैध जैविक हथियार कार्यक्रम मौजूद हैं, जबकि चीन और ईरान की जैविक गतिविधियों को चिंताजनक माना गया है।
किसी जैविक संकट के दौरान सरकारी तंत्र कैसे काम करेगा, इसे समझने के लिए पेंटागन और जनस्वास्थ्य अधिकारी कई स्तरों पर युद्ध अभ्यास करते हैं। ऐसा ही एक गोपनीय सिमुलेशन अभ्यास ग्लेड एक्स नाम से जाना जाता है। इस अभ्यास में एक काल्पनिक इको-टेररिस्ट समूह की परिकल्पना की गई थी, जिसने दुनिया की आबादी घटाने के मकसद से निपाह वायरस को आनुवंशिक रूप से बदलकर उसे अत्यधिक संक्रामक बना दिया था। इस परिदृश्य में यह भी देखा गया कि जब महामारी के चलते वेनेजुएला से नावों में सवार होकर भारी संख्या में संक्रमित लोग प्यूर्टो रिको की ओर पलायन करने लगे, तो कैरेबियाई सागर में अमेरिकी नौसेना को उन जहाजों पर गोलीबारी करने जैसी चरम स्थितियों पर विचार करना पड़ा था। इस अभ्यास में कोरोना महामारी के दौरान डायमंड प्रिंसेस क्रूज जहाज पर फैले संक्रमण जैसी वास्तविक घटनाओं के सबक भी जोड़े गए थे, लेकिन उस काल्पनिक परिदृश्य का पैथोजन असल वायरस से कई गुना अधिक जानलेवा था।
जैविक हमले के सामने रक्षा का कोई ठोस विकल्प नहीं
पेंटागन के युद्ध अभ्यास का संचालन करने वाले सेवानिवृत्त वायुसेना कर्नल टॉम एरहार्ड के अनुसार, किसी बड़े पैमाने के जैविक हमले के खिलाफ कोई वास्तविक रक्षा प्रणाली मौजूद ही नहीं है। इंसान केवल अपने संपूर्ण विनाश को धीमा करने या उससे बचने के सीमित उपाय ही कर सकता है। सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली और नागरिकों की संभावित प्रतिक्रिया का जो अध्ययन किया गया है, उससे यह साफ होता है कि महामारी फैलते ही सामाजिक ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है।
चिकित्सीय सुरक्षा उपायों और दवाओं की भारी कमी के कारण समाज में अराजकता फैलना तय माना जाता है। ऐसे हालात में अमेरिका के पूर्व फेमा निदेशक क्रेग फुगेट द्वारा बताए गए डिवोल्यूशन प्लान को लागू किया जा सकता है। यह योजना तब सक्रिय होती है जब अनियंत्रित अराजकता के कारण राष्ट्रपति को इनसरेक्शन एक्ट लागू करना पड़ता है और सरकार की निरंतरता की स्थिति को स्तर एक यानी सीओजीसीओएन 1 पर पहुंचा दिया जाता है। इस योजना के तहत सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों से अलग कुछ पूर्व-निर्धारित लोगों का समूह तुरंत वाशिंगटन डीसी छोड़कर देश के विभिन्न हिस्सों में बने गोपनीय बंकरों में चला जाता है। इन गोपनीय सुरक्षित ठिकानों को हॉट साइट्स, वार्म साइट्स और कोल्ड साइट्स कहा जाता है, जहां ये लोग तबाही थमने तक इंतजार करते हैं ताकि बाद में शासन व्यवस्था को दोबारा शुरू किया जा सके।
प्लेग का काला इतिहास और एंटीबायोटिक दवाओं की बेअसर होती ढाल
जैविक युद्ध के सबसे बड़े जोखिम के रूप में यर्सिनिया पेस्टिस यानी प्लेग के बैक्टीरिया को सबसे घातक माना जाता है। इतिहास में इस महामारी ने लगभग 15 करोड़ लोगों की जान ली थी और यूरोप की आधी आबादी को खत्म कर दिया था। आधुनिक चिकित्सा में एंटीबायोटिक दवाओं की खोज के बाद लोगों को लगने लगा कि प्लेग बीते जमाने की बीमारी बन चुका है। लेकिन जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए यदि किसी जीवाणु को एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बना दिया जाए, तो वह दवा पूरी तरह निष्प्रभावी हो जाती है। न्यूमोनिक प्लेग हवा के जरिए फैलता है और इसका मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक होता है। पूरे जीव जगत में केवल रेबीज वायरस और न्यूमोनिक प्लेग ही ऐसे संक्रमण हैं जिनमें मृत्यु दर शत-प्रतिशत देखी जाती है।
इतिहास में जैविक हथियारों का पहला दर्ज इस्तेमाल 14वीं शताब्दी में हुआ था, जब चंगेज खान के एक वंशज के नेतृत्व वाली सेना ने जेनोआ गणराज्य की दीवारों के पार प्लेग से संक्रमित लाशों को फेंका था। शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ ने अत्यधिक उन्नत सुपर-प्लेग हथियार विकसित करने का एक बड़ा कार्यक्रम चलाया था। सोवियत संघ छोड़कर पश्चिम पहुंचे वैज्ञानिकों के अनुसार, उस हथियार का मुख्य उद्देश्य सभी इंसानों को खत्म करके केवल बुनियादी ढांचे को सुरक्षित छोड़ना था। सोवियत वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग रोगाणुओं को मिलाकर एक काइमेरा भी तैयार किया था। यह आशंका आज भी बनी हुई है कि सोवियत दौर का वह अवैध कार्यक्रम आज भी नए रूपों में जारी हो सकता है। यह संकट दहशत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के सामने मौजूद वास्तविक खतरों को समझकर सुरक्षा मानकों को कड़ा करने के लिए एक गंभीर चेतावनी है।


















